बच्चों को अंगूठा मुंह में डाले देखते हैं. तो हम तुरंत उनके मुंह से अंगूठा खींच लेते हैं. जितनी बार बच्चा मुंह में अंगूठा घुसाता है, उतनी बार खींच-खींच के निकालते हैं. ऐसा लगता है हम बच्चे से भिड़ गए हों. ये तब तक यूं ही चलता रहता है जब तक बच्चा चिल्ला-चिल्ला के रोने न लगे. पर अब इसकी जरूरत नहीं है. नई स्टडी आई है. जिसके हिसाब से जो बच्चे नाखून चबाते या अंगूठा चूसते हैं, उनको धूल-मिट्टी से होने वाली एलर्जी होने के चांसेज कम होते हैं. न्यूजीलैंड में 1000 से ज्यादा बच्चों पर यह रिसर्च किया गया. जन्म से बड़े होने तक 5, 7, 9 और 11 की उम्र में उन पर नजर रखी गई और देखा गया कि उनकी ये नाखून चबाने और अंगूठा चूसने की आदतें बनी हुई हैं या नहीं. और स्किन-प्रिक टेस्ट के जरिये 13 और 32 की उम्र में देखा गया कि इसका उन पर क्या इफेक्ट आ रहा है?
क्या होता है स्किन-प्रिक टेस्ट
ये एक ऐसा टेस्ट है जिसमें कुछ बैक्टीरिया स्किन के अंदर डाले जाते हैं और देखा जाता है कि स्किन पर कुछ असर हो रहा है या नहीं यानी इन्फेक्शन हो रहा है या नहीं.
नाखून चबाने वाले बच्चों को नहीं हुआ इंफेक्शन
स्किन-प्रिक टेस्ट जब 13 साल की उम्र में कराया गया तो एक आदत वाले 40 फीसदी बच्चों को एलर्जी हुई. जिनको दोनों आदतें थीं ऐसे केवल 31 फीसदी बच्चों को इन्फेक्शन हुआ. रिसर्च करने वालों का कहना है -
अक्सर इन आदतों को हम बच्चों की बुरी आदतें मानते हैं. लेकिन इन आदतों की वजह से वे घर की गंदगी, बिल्लियों, कुत्तों और फंगस वगैरह से होने वाले इंफेक्शन से बचे रह सकते हैं.
रिसर्चर्स ये भी मानते हैं कि अगर ये आदतें बच्चे के बड़े हो जाने पर भी बनी रहती हैं, तो आगे भी वो ऐसी एलर्जी से बचे रहेंगे.