मुद्दा कैसे उठा?
इस मुद्दे पर बहस काफी समय से चल रही है. पिछले साल ऑक्टोबर में सुप्रीम कोर्ट में लॉयर अशोक पांडे ने जनहित याचिका दायर की थी. मांग की थी कि लड़कों की शादी की उम्र घटाकर 21 से 18 साल कर दी जाए. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई ने मामले को न सिर्फ खारिज कर दिया बल्कि इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक़ अशोक पांडे पर फाइन भी लगाया. कहा कि इंतज़ार करिए, जिस दिन कोई 18 साल का लड़का शादी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास याचिका लेकर आएगा, तब देखेंगे. अगस्त 2018 में ही एक मामला सामने आया था दिल्ली हाई कोर्ट में. लड़का और लड़की दोनों ही 19 साल के थे. उन्होंने कहा था कि वो शादी करना चाहते हैं लेकिन घरवालों से उन्हें ख़तरा है. वो ये शादी नहीं होने देना चाहते. उनकी याचिका में कहा गया कि पुरुषों की शादी की उम्र भी घटा देनी चाहिए. दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों को सुरक्षा तो दी, लेकिन उम्र वाले मामले पर सुनवाई नहीं की. अब हालिया मामले में पुरुषों की उम्र कम करने के बजाए लड़कियों की उम्र बढ़ाने की बात कही गई है.

सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
पेटीशन क्या कह रही है?
बार एंड बेंच के मुताबिक़ पेटीशन डाली है एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय ने. सुनवाई हुई चीफ जस्टिस डी एन पटेल और जस्टिस सी हरि शंकर के सामने. इस पेटीशन में अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इंडियन, क्रिश्चियन, पारसी, स्पेशल, और हिंदू- सभी मैरिज एक्ट्स में शादी की उम्र को लेकर जो प्रावधान हैं, उनको चुनौती दी है. इस पेटीशन में कहा गया है कि पुरुषों को 21 साल की उम्र में शादी की इजाज़त मिलती है, लेकिन महिलाओं को 18 साल की ही उम्र में शादी करने के लायक मान लिया जाता है. ये भेदभावपूर्ण है. पेटीशन में ये भी कहा गया है कि न्यूनतम उम्र अगर बढ़ा दी जाएगी तो महिलाओं की हर मायने में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. पेटीशन के अनुसार,
“ये अंतर पितृसत्तात्मक स्टीरियोटाइप्स पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. ये सिद्धांतों में और असलियत में महिलाओं के खिलाफ गैर-बराबरी को बढ़ाता है, और पूरी दुनिया में जो ट्रेंड चल रहा है उसके खिलाफ जाता है. महिलाओं को 18 साल की उम्र में स्कूल ख़त्म करने के बाद पढ़ाई या नौकरी करने की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है. लेकिन समाज का सच ये है कि शादी के फ़ौरन बाद महिलाओं को बच्चे करने के लिए दबाव झेलना पड़ता है. उन्हें घर के कामों को करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, परिवार के अपने स्टीरियोटाइप वाले रोल के कारण. ये उनके शैक्षणिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्रभावित करता है, और उनकी गर्भधारण करने की स्वतंत्रता पर भी.”

शादी में लड़की को अक्सर एक एडिशन के तौर पर देखा जाता है लड़के के परिवार में. उसकी अपनी पहचान से लोग कोई लेना-देना नहीं रखते. सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
कानून के हिसाब से क्या उम्र है?
इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872, पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट 1936, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, और हिन्दू मैरिज एक्ट 1955, सभी के अनुसार शादी करने के लिए लड़के की उम्र 21 वर्ष और लड़की की 18 वर्ष होनी चाहिए. इसमें धर्म के हिसाब से कोई बदलाव या छूट नहीं दी गई है. फिलहाल बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू है. जिसके मुताबिक़ 21 और 18 से पहले की शादी को बाल विवाह माना जाएगा. ऐसा करने और करवाने पर 2 साल की जेल और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है. 31 अगस्त 2018 को लॉ कमीशन ने 'परिवार क़ानून में सुधार' के मुद्दे पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया था. जिसमें कहा गया कि 'अगर वोट डालने की एक उम्र मतलब 18 साल तय कर दी गई है. जिसमें नागरिक अपनी सरकार चुन सकते हैं. तो उसी उम्र को शादी की उम्र भी मान लेना चाहिए'. हवाला दिया गया, Indian Majority Act, 1875 का. जिसमें बालिग़ होने की उम्र 18 साल मानी गई है. साथ में ये बात भी कही गई कि 'पति-पत्नी की उम्र के अंतर का कोई कानूनी आधार नहीं है. लड़के की उम्र ज़्यादा रखना दकियानूसी है. शादी कर रहे दोनों लोग हर तरह से बराबर होते हैं. उम्र भी बराबर हो सकती है, क्योंकि साझेदारी (जिसका यहां मतलब शादी है) बराबरी वालों के बीच होनी चाहिए.' बेसिकली लॉ कमीशन ये कह रहा था कि शादी में न कोई किसी से छोटा है, न कोई बड़ा.

शादी में कोई छोटा न हो कोई बड़ा न हो, ये आइडियल सिचुएशन है. लेकिन आइडियल ही है, रियल नहीं. सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
पहले भी यही उम्र थी, या पहले अलग था?
साल 1929 में एक बिल पास हुआ. नाम था चाइल्ड मैरिज रीस्ट्रेंट एक्ट. इसे ही शारदा एक्ट कहा गया. क्योंकि 1927 में इसे इंट्रोड्यूस कराने वाले व्यक्ति थे राय साहिब हरबिलास शारदा. एक्ट में पहले लड़की की शादी के लिए न्यूनतम आयु 14 वर्ष रखी गई. और लड़कों के लिए 18 वर्ष. उसके बाद इसे बदल कर क्रमशः 18 और 21 वर्ष किया गया. इस बिल के लिए हिन्दू और मुस्लिम महिलाओं ने मिलकर प्रदर्शन किए. इसे पास कराने की मांग की. बिल पास तो हुआ, लेकिन ब्रिटिश भारत में इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा. इसके पीछे तर्क ये दिए जाते हैं कि ब्रिटिश सरकार उस वक़्त सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ नहीं जाना चाहती थी. इस वजह से ही इस बिल के पास होने के बाद भी बालविवाहों में कोई कमी नहीं देखी गई.
तब का क्या कहें, आज का ही देख लीजिए. आज भी आखातीज के मौके पर राजस्थान में कई बालविवाह होते हैं. इनकी खबरें अक्सर अखबार में पढ़ने को मिलती रहती हैं. इससे भी थोड़ा पीछे जाकर देखें तो मिलता है एज ऑफ कंसेंट एक्ट, जो 1891 में पास हुआ था. इसमें शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए लड़कियों की सहमति की उम्र (यानी एज ऑफ कंसेंट) को बारह साल कर दिया गया था. इसके पीछे की कहानी भी बेहद झकझोर देने वाली है. ब्रिटिश सरकार ने इस मामले में हस्तक्षेप करके कानून तब बनवाया जब तकरीबन 10 साल की फूलमणि दासी की मौत हो गई. फूलमणि की शादी 30 साल के हरिमोहन मैती से कर दी गई थी. उसने उसका बलात्कार किया, और उसकी वजह से फूलमणि की मौत हो गई. लेकिन हरिमोहन मैती पर रेप के चार्जेज नहीं लगे.
इस तरह के मामले पहले भी सामने आए थे जिनमें बेहद कम उम्र की लड़कियों की शादी दुहाजुओं के साथ कर दी गई थी. लेकिन फूलमणि मामले ने कानून बनाने की प्रक्रिया तेज़ कर दी. पंडिता रमाबाई, आनंदी गोपाल जोशी जैसी उस समय की क्रांतिकारी महिलाओं ने इसका समर्थन किया था. बाल गंगाधर तिलक ने इस कानून का विरोध करते हुए ये कहा था कि ये हमारी संस्कृति में दखल है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा,

शादी अगर कम उम्र में हो जाए तो लड़की के पास आत्मनिर्भर बनने के मौके नहीं बचते. सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
लड़की की कम उम्र होने को लेकर डॉक्टर्स का क्या कहना है?
डॉक्टर शिवानी चतुर्वेदी गाइनकॉलजिस्ट हैं. पिछले 20 सालों से भी ज्यादा समय से प्रैक्टिस कर रही हैं. उन्होंने कहा कि 18 साल की उम्र में लड़की भले ही शारीरिक रूप से तैयार हो मां बनने के लिए, लेकिन मानसिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक तरीके से बिलकुल तैयार नहीं होती है. उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐसी पेशेंट्स भी देखी हैं जो बमुश्किल अठारह साल की हैं, और उनके क्लिनिक में आई हैं. एक ने कहा कि शादी के तीन महीने हो गए लेकिन प्रेग्नेंसी नहीं हुई. शादी के चक्कर में बोर्ड एग्जाम से पहले ही पढ़ाई छूट गई. वो लड़की बारहवीं तक की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाई. डॉक्टर शिवानी का कहना है कि ये एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था है. इसमें महिला को दबाए रखने, और उसे आगे बढ़ने का कोई भी मौका न देने की प्रवृत्ति शामिल है. अगर लड़की की उम्र 18 वर्ष से 21 वर्ष की जाती है तो पॉपुलेशन पर भी कंट्रोल बढ़ेगा क्योंकि 18 से 21 के बीच में आम तौर पर एक से दो बच्चे हो जाते हैं.
लोगों की क्या राय है?
सरवत फातिमा एक मीडिया हाउस में काम करती हैं. औरतों के मुद्दों और उनकी सेहत पर लिखती रहती हैं. उनका मानना है कि अगर लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम आयु अगर 21 कर दी जाती है तो उनकी मेंटल ग्रोथ ज्यादा होगी. उनमें अपने-आप को लेकर समझ बेहतर होगी. अपनी ज़िन्दगी बेहतर तरीके से जी पाएंगी, फैसले ज्यादा बेहतर ले पाएंगी. किसी भी सिचुएशन से बेहतर तरीके से निपट पाएंगी.
वहीं कुछ लोगों का ये भी कहना है कि लड़का हो या लड़की, दोनों की शादी की उम्र न्यूनतम 25 कर देनी चाहिए. दोनों का नौकरी में होना, आत्मनिर्भर होना, बेसिक ज़रूरी बातें होनी चाहिए. कुछ लोग अतिवादी कह सकते हैं इसे लेकिन सुझाव ये भी दिया गया कि शादी से पहले लड़का और लड़की को कम से कम एक साल साथ रहकर ये भी देख लेना चाहिए कि वो एक दूसरे के साथ रह पाते हैं या नहीं.
स्वाति मिश्रा हमारी साथी हैं. उन्होंने कहा कि पहले 18 साल इसलिए उम्र निर्धारित की गई क्योंकि लोग केवल लड़की के शारीरिक रूप से शादी के लिए और मां बनने के लिए तैयार होने का इंतजार करते थे. वो आगे क्या करना चाहती है या बनना चाहती है इसका कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि ये उनकी चिंताएं ही नहीं थीं. उनका मानना है कि 21 ही नहीं बल्कि उम्र और बढ़ा दी जानी चाहिए लड़का और लड़की दोनों के लिए. क्या ही समझ होती है इतनी कम उम्र में.
तर्क इधर भी हैं, तर्क उधर भी हैं. लेकिन अधिकतर लोगों का मानना यही दिख पड़ता है कि लड़की की उम्र शादी के लिए इतनी कम रखने का कोई मतलब नहीं है. शादी एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है. उसे निभाने के लिए लोगों का मन से तैयार होना ज़रूरी है. लायक होना ज़रूरी है. उसके पॉजिटिव और नेगेटिव पहलुओं को समझने की काबिलियत होनी ज़रूरी है. जो इतनी कम उम्र में हर किसी के पास नहीं होती. अपना समय लेना, सोच-समझ कर साथी चुनना, बच्चा प्लैन करना- ये सारी बातें आपको स्वार्थी नहीं बनातीं. एक जिम्मेदार इंसान बनाती हैं.
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