ये पहली बार नहीं है. कि सिक्योरिटी को धुप्पल देकर एडवेंचरबाजों ने नाम के साथ कांड किया हो. डैनी फाइनगुड नाम के आदमी ने पहली जनवरी सन 1976 को भी ऐसा किया था. गांजे के ऊपर लदे नियम कानून बदलने की डिमांड के साथ. लेकिन वो ठहरे अमेरिकी. पाश्चात्य सभ्यता वाला देश. उनको बड़ा गुमान है कि वो 200 साल पुरानी डेमोक्रेसी हैं. लेकिन ढक्कन पैदा करने में उस देश का कोई मुकाबला नहीं. ये मानते हैं कि हॉलीवुड बदलना डेयरिंग वाला काम था. लेकिन ऐसे काम तो यहां रोज होते हैं यार. पड़ोसी के घर की बेल बजाकर भागने वाले बच्चे की जिंदगी के साथ भी यही रिस्क होता है.
लिखने पढ़ने की बात है तो यहां के किसी भी मंदिर पर चले जाओ. अंदर इतनी लिखापढ़ी मिलेगी कि लगेगा मंदिर नहीं, क्लर्क का दफ्तर है. ट्रेन के टॉयलेट से हर दरोदीवार तमाम सूक्तियों से भरी मिलती है. यही हाल पार्क के पेड़ों का होता है. किसी का प्रेम तब तक सर्टिफाइड नहीं होता जब तक उनके सिग्नेचर किसी अच्छे पेड़ के तने पर न हों. कार के धूल चढ़े शीशों पर कलाकारी करने वाले कम डेयरिंग बाज नहीं होते.अपनी कार को कबाड़ बताना भी अमेरिकियों के बस का नहीं है.
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