
जून में नारायणन पर एसिड अटैक किया गया था.
बीजू पर इससे पहले एक हमला इसी साल जून में हुआ था. उन पर किसी ने एसिड फेंक दिया था. वो तब मंदिर जा रहे थे. शरीर का करीब 18% हिस्सा जल गया था. खुन्नस बीजू की वैदिक क्लास से थी, जिसमें वो बच्चों को वेद पढ़ाते थे. उन्हें क्लास बंद करने के लिए कई बार धमकाया भी जा चुका था.
बीजू को कुछ दिन पहले भी धमकी मिली थी. इसलिए क्योंकि वो एक महायज्ञ की तैयारी कर रहे थे. दलित पुजारियों के साथ महायज्ञ. ये बात शायद कुछ लोगों को नागवार गुजरी. क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि पूजा-पाठ-यज्ञ करना या कराना किसी ख़ास जाति की बपौती है.
बीजू पहले दलित हैं, जिन्होंने तंत्र विद्या की पढ़ाई की
केरल का एक शहर है पलक्कड़. यहां एक जगह विलायूर है, जहां के वेट्टाकोरुमकन मंदिर में बीजू नारायणन पुजारी भी हैं. वेट्टाकोरुमकन को भगवान शिव का पुत्र माना जाता है. भगवान शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र नाम का एक हथियार देने के लिए शिकारी का रूप धरा था. उनके साथ देवी पार्वती भी थीं. कहते हैं इसी दौरान वेट्टाकोरुमकन का जन्म हुआ था.
केरल में पहाड़ियों के बीच है सबरीमाला मंदिर.
बीजू पहले दलित हैं, जिन्होंने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड में होने वाली तांत्रिक की पढ़ाई के लिए क्वॉलिफाई किया. उन्होंने यहीं चारों वेदों का अध्ययन किया, जिसके बाद ही वो पुजारी बन सके. त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ही वो संस्था है, जो केरल के सभी 1248 मंदिरों की देखरेख करती है. केरल का मशहूर सबरीमाला मंदिर का प्रशासन भी यही संस्था संभालती है.
केरल में मंदिर प्रवेश का रहा है लंबा इतिहास
आजादी से पहले 1924–25 की बात है. मंदिरों में केवल सवर्णों को ही जाने की छूट थी. अवर्णों यानि 'निचली' जाति के लोगों को मंदिर के पास की सड़कों पर चलने तक की अनुमति नहीं थी. इसके खिलाफ केरल में एक आंदोलन चला. नाम था वायकोम सत्याग्रह. वायकोम नाम इसलिए क्योंकि त्रावणकोर के वायकोम नाम के गांव से ही ये आंदोलन शुरू हुआ. गांव के एक मंदिर में 30 मार्च, 1924 को केरल कांग्रेसियों के एक दल ने, जिसमें सवर्ण और अवर्ण दोनों थे, मंदिर में प्रवेश किया. इस कदम को काफी समर्थन मिला. हालांकि बाद में इन लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया. इनके समर्थन में फिर पूरे देश से स्वयंसेवक वायकोम पहुंचने लगे.
गांधीजी ने भी दिया था आंदोलन को समर्थन.
महात्मा गांधी भी इसके समर्थन में वायकोम पहुंचे. गांधीजी ने यहां की महारानी से मुलाकात की. नतीजा ये निकला कि मंदिर के पास की सड़कों पर चलने की अनुमति निचली जातियों को दे दी गई. आंदोलन यहीं नहीं खत्म हुआ. नतीजा ये निकला कि 1936 में हरिजनों और दलितों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति भी दे दी गई.
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