साल 2023 की पहली तारीख़ को जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में तीन जगहों पर आतंकी हमलों की ख़बर आई. इन हमलों में कुल 6 लोगों की मौत की पुष्टि की गई है. ऐसे हमलों के दौरान आमजन क्या कमाल कर जाते हैं, इसका बयाना 42 साल के बालकृष्ण के उदाहरण से समझिए. बालकृष्ण ने अपनी पास पड़ी राइफल से आतंकियों का सामना किया. घर बचाया, मोहल्ले को बचाया. बहुत सारे लोगों को घायल होने से बचाया और घायलों को बचाने में मदद मिल सकी.
आतंकी गोली चला रहे थे, बालकृष्ण ने अपनी राइफल निकाली, फिर सबका दिल जीत लिया!
कश्मीर के राजौरी हमलों के 'हीरो' की कहानी.


इस कहानी पर रिपोर्ट किया इंडियन एक्सप्रेस ने.
बालकृष्ण पहले ग्राम रक्षा समिति (VDC) के सदस्य थे. अब राजौरी शहर के पास एक गांव डांगरी के चौक पर कपड़े की दुकान चलाते हैं.
राजौरी में मिलिटैंट्स बंदूक़ ले कर घूम रहे थे. कम से कम चार घरों को निशाना बनाया था, जिसमें चार लोग मारे गए थे. छह और लोग घायल हो गए थे. कथित तौर पर ये हिन्दू परिवारों पर किया गया हमला था. हमले के वक़्त बालकृष्ण दुकान से घर लौटे रहे थे. अचानक गोलियों की आवाज़ सुनी, तो तुरंत घर में घुस गए. अपनी राइफ़ल निकाली. ग़ैर-लाइसेंसी 303 राइफ़ल. इसके बाद बालकृष्ण ने बताया,
"मैंने अपनी राइफ़ल उठाई और बाहर निकला. मैंने दो हमलावरों को पड़ोस में घूमते देखा. दोनों मेरे घर के बहुत क़रीब थे. मैंने दो राउंड फायरिंग की. वो घबरा गए और जंगलों की तरफ़ भाग गए."
ऊपरी डांगरी पंचायत के सरपंच दर्शन शर्मा ने बताया कि अगर बालकृष्ण मौक़े पर न होते, तो मौतों की संख्या कहीं ज़्यादा होती. बालकृष्ण की फ़ायरिंग के बाद गांव वाले घरों से बाहर निकले और घायलों को बचाया गया.
बालकृष्ण ने इंडियन एक्सप्रेस के अरुण शर्मा को बताया कि उन्होंने ये राइफ़ल केवल दो बार इस्तेमाल की है. पहली बार 1998-99 में, जब सेना ने उन्हें बंदूक़ चलाने की ट्रेनिंग दी थी. फिर सीधे अब: 1 जनवरी 2023 को. उन्होंने बताया,
"तब हर व्यक्ति को 100 राउंड कारतूस दिए गए थे. आर्मी ट्रेनिंग कैंप में हमने 10 राउंड इस्तेमाल किए. तब से अब तक मेरे पास 90 गोलियां बची थीं. लाइसेंस था नहीं और इसके इस्तेमाल होने संभावना भी बहुत नहीं थी, तो ये राइफ़ल घर में 'डंडे' जैसी इस्तेमाल होती थी. 24 सालों में कभी भी इसका काम नहीं पड़ा."
1990 के दशक में - जब जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद अपने चरम पर था - जम्मू के 10 ज़िलों में सेना के सपोर्ट के लिए VDC बनाए गए थे. लेकिन फिर उनपर आरोप लगने लगे कि वो हथियारों का दुरुपयोग करते हैं. आने वाली सरकारों के साथ VDC ने अपना वर्चस्व खो दिया. प्रशासन ने VDC के पूर्व सदस्यों को अपने हथियार लौटाने का आग्रह किया. डांगरी में भी ज़िला प्रशासन ने 60 साल से ज़्यादा उम्र वाले VDC सदस्यों से बंदूक़ लौटाने के लिए कहा. लेकिन चूंकि बालकृष्ण 42 के ही हैं, सो उन्होंने राइफ़ल रखी रही. पुलिस ने उन्हें राजौरी पुलिस स्टेशन में एक पासपोर्ट फोटोग्राफ़ जमा करने के लिए कहा, ताकि बंदूक़ के लिए लाइसेंस जारी किया जा सके.
हालांकि, 2 जनवरी को DGP दिलबाग़ सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में VDC को फिर से गठित किया जाएगा. और उसी दिन, डांगरी चौक पर बालकृष्ण मातम मनाने वालों के साथ बैठे थे. तब उनका परिचय लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा से करवाया गया. LG ने उनकी भूमिका की प्रशंसा की.
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