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याचिका आई- कमिश्नर ऑफिस में गैर हिंदुओं को काम करने से रोको, कोर्ट ने रगेद दिया

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- देश को 100 साल पीछे धकेलने वाली याचिका.

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसमें किसी गैर हिंदू के कमिश्नर दफ्तर में भर्ती करने पर रोक की मांग की गई थी.
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 14 दिसंबर को एक याचिका खारिज की. याचिका में क्या था? मांग की गई थी कि कमिश्नर ऑफिस में किसी भी गैर हिंदू को काम करने की इजाज़त न दी जाए. इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी याचिका पर सुनवाई करना भी देश को 100 साल पीछे धकेलना होगा.
चीफ जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस विश्वजीत शेट्टी के बेंच के सामने जब ये याचिका आई तो चीफ जस्टिस ने कहा,
हिंदू धर्म कभी भी इतना संकीर्ण नहीं था. हिंदू धर्म में ऐसे लोग कभी नहीं थे जो इतने संकीर्ण सोच के हों.
दो और याचिकाएं लगाई गई थीं
याचिका में कर्नाटक हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एंड चेरिटेबल एंडोमेंट एक्ट के सेक्शन 7 का हवाला दिया गया था. याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सिर्फ हिंदू धर्म का पालन करने वाले को ही कमिश्नर ऑफिस में नौकरी पर रखा जा सकता है. इसके अलावा दो और याचिकाएं लगाई गई थीं. एक में महालिंगेश्वर मंदिर के सालाना जलसे के निमंत्रण पत्र में डिप्टी कमिश्नर एबी अब्राहम का नाम लिखवाने पर आपत्ति जताई गई थी, साथ ही उनके मंदिर में प्रवेश पर रोक की मांग की गई थी. वहीं दूसरी याचिका में भारत पुनरुत्थान ट्रस्ट ने मोहम्मद देशव अलीखान के कमिश्नर ऑफिस में सुप्रिटेंडेंट नियुक्त किए जाने पर आपत्ति जताई थी. इन्हें कानून के खिलाफ बताया था.
चीफ जस्टिस ने कहा,
कौन सा आसमान गिर जाएगा अगर डिप्टी कमिश्नर हिंदू मंदिर में व्यवस्थाओं की देखरेख के लिए अंदर चला जाएगा. हिंदू धर्म तो कभी इतना संकीर्ण नहीं था.
कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा
देश भर में ऐसे दृष्टांत मिलेंगे जब हिंदू धर्म के त्योहारों की तैयारियों की देखभाल एक सरकारी अधिकारी के तौर पर हिंदू धर्म से इतर धर्म को मानने वालों ने की है. जब से संविधान लागू हुआ है, हमने कभी भी ऐसी याचिका को नहीं सुना है. एक चीज होती है संविधान, और एक चीज होती है जिसे संवैधानिक दर्शन कहते हैं. हम ऐसी याचिका की सुनवाई नहीं करेंगे जो हमें 100 साल पीछे ले जाती हो.
 
जज ने न्यायप्रणाली पर सवाल उठाए और खुद को गोली मार ली. प्रतीकात्मक फोटो
कोर्ट ने कहा कि कानून लागू करते वक्त संविधान के दर्शन को भी समझना चाहिए . प्रतीकात्मक फोटो

क्या कहता है कर्नाटक हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट एक्ट
इस कानून की धारा 7 के अनुसार कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर या असिसटेंट कमिश्नर और वहां काम करने वाला हर व्यक्ति अपनी कार्य क्षमता के आधार पर नियुक्ति किया जाएगा. उस शख्स को हिंदू धर्म को मानने वाला होना चाहिए, वह तब तक ही पद पर रह सकता है जब तक हिंदू धर्म माने.
बेंच ने इस कानून की व्याख्या करते हुए बताया
अगर आप सतही तौर पर सेक्शन 7 को पढ़ें तो कहीं भी यह नहीं लगता कि किसी को भी इस कमिश्नर ऑफिस में काम करने से रोका जा रहा है. पात्रता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस काम के लिए नियुक्त किया गया है.
कोर्ट ने इसके लिए दो उदाहरण भी दिए
अगर कमिश्नर के ऑफिस में कोई कंप्यूटर प्रोग्रामर डेटा एंट्री के लिए भर्ती होगा तो उसे एंट्री के काम के लिए भर्ती माना जाएगा. न कि एक्ट की धारा 7 के पालन के लिए भर्ती. इसी तरह अगर किसी को साफ-सफाई के लिए भर्ती किया जाएगा तो उसे अपने काम के लिए भर्ती किया जाएगा न कि कानून की धारा को पूरा करने के लिए. इसलिए अगर कानून के सेक्शन 7 की अवहेलना होने का सवाल है तो काम की प्रकृति को भी देखना होगा. देखना होगा कि भर्ती किस काम के लिए हो रही है.
बेंच ने अपने फैसले के आखिर में कहा
न्यायिक मूल्यांकन में एक बात का ध्यान रखना होगा कि सरकारी अधिकारी, पुलिस अधिकारी, चाहे उनकी धार्मिक आस्था और विश्वास कुछ भी हो, इसके बावजूद सभी धर्मों को उनके संबंधित धार्मिक त्योहारों को मनाने में सहायता करें. वास्तव में यही संवैधानिक दर्शन और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का हिस्सा है.

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