
जम्मू-कश्मीर में पिछले दो दिनों से बंद बुलाया गया है. जगह-जगह हड़ताल हो रही है, प्रदर्शन हो रहे हैं और अमरनाथ यात्रा रोक दी गई है.
इस मुद्दे पर अलग-अलग दलों की अलग-अलग राय है. हुर्रियत नेता बिलाल वार ने कहा है कि 35 A के कारण कश्मीर एक है. अगर इसे हटाया गया तो जंग छिड़ जाएगी. वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता जावेद राणा ने कहा है कि बंद के दौरान अगर कोई तिरंगा उठाता है तो ऐसा करने पर अंजाम बुरा होगा. चूंकि राज्य में राज्यपाल शासन है, तो खुफिया विभाग ने राज्यपाल प्रशासन से कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट 35 A के खिलाफ फैसला देता है, तो राज्य की पुलिस में ही विद्रोह हो सकता है. वहीं आईएएस अफसर शाह फैसल ने ट्वीट कर कहा है-
"मैं अनुच्छेद 35 A की तुलना शादी-निकाहनामे से करना चाहता हूं. आप इसे रद्द करेंगे और रिश्ता खत्म हो जाएगा. बाद में बातों के लिए कुछ नहीं बचेगा.''
“नागरिकता का सवाल उठना जायज़ है. महाराजा हरि सिंह के वक्त में लंबे समय तक नियम था कि कोई भी बाहरी आदमी कश्मीर में न तो ज़मीन खरीद सकता है और न ही वहां का नागरिक बन सकता है. पुराने दिनों में महाराजा को इस बात का डर था कि बहुत सारे अंग्रेज वहां आएंगे और जमीन खरीदकर वहां बस जाएंगे, क्योंकि वहां का मौसम उनके अनुकूल होता था. इसलिए अंग्रेजी शासनकाल में भी महाराजा ने ये नियम बना रखा था कि कश्मीर में कोई भी ज़मीन नहीं खरीद सकता है, जो अब भी जारी है. इसलिए अब भी जम्मू-कश्मीर में जो सरकार है, वो भी इस बात से डरी हुई है कि बाहरी लोगों के आ जाने से जम्मू-कश्मीर के लोगों के पास पैसे के अलावा कुछ नहीं बचेगा. ये डर मुझे भी है. इसलिए हम इस बात पर सहमत हैं कि राज्य की विधानसभा को इस बात का अधिकार होगा कि वो स्थायी नागरिकता, ज़मीन-जायदाद खरीदने का मुद्दा और नौकरियों के मुद्दे को अपने हिसाब से परिभाषित कर सके.”

शेख अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू के बीच 1952 में दिल्ली समझौता हुआ था.
इस दिल्ली समझौते के तहत संविधान के अनुच्छेद 370 (1) (D) के तहत भारत के राष्ट्रपति को जम्मू और कश्मीर के ‘राज्य विषयों’ के लाभ के लिए संविधान में “अपवाद और संशोधन” करने की ताकत देता है. इसका इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई 1954 को एक आदेश के जरिए 35 A को लागू किया. ये अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर की सरकार और वहां की विधानसभा को जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देता है. इसी अनुच्छेद के आधार पर 1956 में जम्मू कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी, जो अब सबसे बड़ी विवाद की जड़ है.

कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद अखबार में छपी खबर का अंश.
क्या कहता है आर्टिकल 35 A #अनुच्छेद 35A के मुताबिक जम्मू कश्मीर सरकार उन लोगों को स्थाई निवासी मानती है जो 14 मई 1954 के पहले कश्मीर में बसे थे. #ऐसे स्थाई निवासियों को जमीन खरीदने, रोजगार पाने और सरकारी योजनाओं में विशेष अधिकार मिले हैं. #देश के किसी दूसरे राज्य का निवासी जम्मू-कश्मीर में जाकर स्थाई निवासी के तौर पर नहीं बस सकता. #दूसरे राज्यों के निवासी ना कश्मीर में जमीन खरीद सकते हैं, ना राज्य सरकार उन्हें नौकरी दे सकती है. आर्टिकल 35 A के मुताबिक राज्य का नागरिक वो है, जो 14 मई 1954 से पहले 10 साल तक जम्मू-कश्मीर में रहा हो और उसके पास जम्मू-कश्मीर में संपत्ति हो. इस नियम के तहत दूसरे राज्यों में भारतीय नागरिकों को जो मूल अधिकार मिल रहे हैं, उनके उल्लंघन को लेकर याचिका भी दाखिल नहीं की जा सकती है. यानी यह आर्टिकल दूसरे राज्यों के जैसे नागरिक अधिकार हासिल करने पर पूरी तरह से रोक देता है. गैर कश्मीरी से शादी करने पर छिन जाएंगे लड़कियों के अधिकार
"attachment_95314" align="alignnone" width="600"

कश्मीर विवाद को शांत करने के लिए देश-विदेश में भी आवाज़ उठती रहती है.
एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे, जिनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. इसके अलावा गोरखा समुदाय के भी लोग हैं, जिन्हें राज्य के नागरिक होने का कोई अधिकार हासिल नहीं है. वहीं 1957 में जम्मू-कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने एक फैसला लिया था. इसके तहत वाल्मीकि समुदाय के 200 परिवारों को विशेष सफाई कर्मचारी के तौर पर बुलाया गया था. पिछले 60 साल से ये लोग जम्मू में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे हैं, जिन्हें जम्मू-कश्मीर के निवासी का दर्जा हासिल नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में दी गई है चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में आर्टिकल 35 A को लेकर चार अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई हैं.
आर्टिकल 35 A को चार अलग-अलग याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इसके पीछे ये तर्क दिया गया है कि इस अनुच्छेद को राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया था, इसलिए इसकी वैधानिकता संदिग्ध है. अलग-अलग याचिकाओं में कहा गया है कि संविधान में प्रावधान बनाने, हटाने या जोड़ने का अधिकार संसद को है और इसके लिए भी संविधान संशोधन करना पड़ता है. ऐसे में इस अनुच्छेद की वैधानिकता नहीं है और सुप्रीम कोर्ट को इस अनुच्छेद को हटा देना चाहिए. कोर्ट में आरएसएस से जुड़े ‘वी द सिटीजन्स’ नामक एनजीओ के अलावा चारू वली खन्ना ने इस अनुच्छेद के खिलाफ अपील दाखिल की है.

जम्मू-कश्मीर की राजनैतिक पार्टियों के अलावा वहां के नागरिक भी 35 A को कायम रखना चाहते हैं.
इसके अलावा इससे जुड़ी दो अन्य याचिकाएं कोर्ट के पास हैं. इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक बेंच बनाई है, जिसके सामने केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ने अपने-अपने पक्ष रख दिए हैं. 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में जो सुनवाई हो रही है, वो ''वी द सिटीजन्स'' की याचिका पर हो रही है. जानकारों के भी हैं अपने-अपने तर्क संविधान के जानकारों के मुताबिक संविधान में 35 (A) का जिक्र है, जो जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ नहीं है. राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा जो आदेश दिया है, वो आर्टिकल 35 (A) है. वहीं संविधान में जब-जब संशोधन किया जाता है, उसका जिक्र संविधान की किताब में किया जाता है. अब तक के हुए संशोधनों में आर्टिकल 35 (A) का जिक्र नहीं है. हालांकि इस अनुच्छेद को संविधान के परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है. अनुच्छेद 35 A को समझने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं
ये भी पढ़ें: क्या है धारा 35 (A), जिसका जिक्र होते ही कश्मीरी भभक उठते हैं
कौन हैं दिनेश्वर शर्मा, जिन्हें सरकार ने मसला-ए-कश्मीर हल करने चुना है?
कभी भारतीय लोकतंत्र के कसीदे पढ़ने वाला, कैसे बना सबसे बड़ा अलगाववादी
मौलवी ने बच्चों का रेप किया, लेकिन उसकी सजा के लिए कश्मीर में कायदे का कानून नहीं
जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार गिरने के पीछे मेहबूबा मुफ़्ती की ज़िद थी?






















