कुंवर लाल से हमने बात की तो वो ये बोले - साहब टॉयलेट बनवाना तो चाहते हैं, पर पैसा कहां है. मजदूरी करके इतना ही कमा पाते हैं कि परिवार की रोटी चलती रहे. सरकार 12,000 रुपए देती है, पर इतने में कहां बनता है टॉयलेट. फिर पैसा मिलता भी है तो टॉयलेट बनने के बाद. उसमें भी अधिकारियों का भरोसा नहीं कि कब पैसा मिले. टैंक बनवाने में ही 8000 रुपए की ईंट लग गई है. अब पैसा नहीं है. कहीं से उधार लेकर आगे का काम करवाएंगे.

गांवो में टॉयलेट बनाने को सरकार दे रही है 12000 रुपए.
हमने पता लगाया तो एक सामान्य 4X6 का टॉयलेट बनवाने में इतना खर्च आता है -
2,000 ईंट- 8,000 रुपए 6 बोरी सीमेंट- 4000 रुपए टॉयलेट सीट- 1000 रुपए पाइप, नल- 3000 रुपए दरवाजा- 1500 रुपए टंकी- 3000 रुपए गिट्टी- 2000 रुपए मिस्त्री- 3 दिन के 1800 रुपए दो लेबर- 3 दिन के 1800 रुपए 20 किलो लोहा- 900 रुपए अन्य खर्चे- 1000 रुपए कुल- 28,000 रुपए
अब बताइये 12 हजार मिलते हैं और टॉयलेट बनेगा कम से कम 28 हजार का, तो गरीब आदमी का परेशान होना तो लाजमी है. इसके साथ ही योजना में और कमियां ये हैं-
1. पैसा टॉयलेट बनवाने के बाद क्यों?
केंद्र सरकार 12000 रुपए देती तो है मगर टॉयलेट बनने के बाद. अब हमको कोई भला आदमी ये बताए कि जिस आदमी के पास खाने के पैसे के लाले हैं. वो टॉयलेट का शुभारंभ कैसे करवाए. अब सबके रिश्तेदार बिल्डिंग मैटेरियल वाले तो होते नहीं हैं कि 'कल पैसा दे देंगे' बोलकर ईंट-मौरंग उठा लाए. फिर ग्रामीण इलाकों में तो हालात और बुरे हैं. ऐसे में किसान-मजदूर किसी ना किसी से उधार लेकर टॉयलेट बनवाए तो बनवाए.

ग्राम पंचायत का कहना है- लाख समझाने पर भी नहीं माने तो दिया नोटिस.
2. सबके पास जमीन नहीं होती
गांवों में अब सभी लोग तो जमींदार होते नहीं हैं. न ही सबके पास जमीन होती है. ज्यादातर तो दूसरे के खेतों पर काम करते हैं या मजदूरी करके काम चलाते हैं. ऐसे लोगों के घर भी छोटे-मोटे होते हैं. ऐसे में टॉयलेट के लिए जगह कहां से लाएं. लोगों को तो खाली टॉयलेट का ऊपरी स्ट्रक्चर दिखता है. इसके लिए जो टैंक बनवाना पड़ता है, उसके लिए तो अच्छी खासी जगह चाहिए होती है, जो कि सबके पास होती नहीं. अब ऐसे लोग टॉयलेट बनवाएं तो बनवाएं कहां.
3. टॉयलेट बनने के बाद पैसा देने में भी आनाकानी
कई बार ऐसी खबरें आ चुकी हैं कि ग्राम पंचायत ने दबाव बनवा के टॉयलेट तो बनवा दिया, मगर बाद में किसानों को पैसा देने में काफी आनाकानी की. ऐसे में अगर किसी गरीब आदमी ने कहीं से उधार लेकर टॉयलेट बनवा दिया तो उसे पैसे चुकाने में नानी याद आ जाती हैं. कई लोग तो इसी डर से नहीं बनवाते हैं टॉयलेट.

शहरों की तरह गांवों में भी बन सकते हैं सामुदायिक शौचालय.
बेहतर होगा सामुदायिक शौचालय बनवाए जाएं
दिक्कतें तो ऊपर बता ही दीं. इसका सीधा-सपाट हल है सामुदायिक शौचालय. जब शहरों में इन्हें बनवाया जा सकता है तो गांवों में क्यों नहीं. ग्राम पंचायत के पास अपनी जमीन होती ही है. वहां पर पुरुषों के लिए अलग और महिलाओं के लिए अलग शौचालय बनवा देने चाहिए. ना जगह की किचकिच होगी, पैसा सरकार दे ही रही है. बवाल ही खत्म. रही बात साफ-सफाई की तो इतना तो करना ही चाहिए पंचायत को अपने फंड से. या खाली भौकाल ही टाइट करने के लिए प्रधान बनना होता है.
57 परिवारों को सौंपा गया है जुर्माने का नोटिस
बैतूल के रम्भाखेड़ी गांव में कुंवर लाल साहू अकेले नहीं हैं. करीब 57 परिवारों पर खुले में शौच जाने के लिए जुर्माना ठोका गया है. प्रधान रामरती बाई का कहना है कि पिछले एक साल से लोगों को समझा रहे हैं कि घर में टॉयलेट बनवा लो, पर कुछ लोगों पर असर नहीं हुआ. इसलिए 250 रुपए के हिसाब से जुर्माना लगाया है. कार्रवाई के डर से कुछ परिवारों ने टॉयलेट बनाना शुरू कर दिया है.
योजना भी समझ लेते हैं

2014 में शुरू हुआ था स्वच्छ भारत अभियान.
पीएम मोदी ने 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) नाम की योजना शुरू की थी. इसका लक्ष्य 02 अक्टूबर, 2019 तक स्वच्छ एवं खुले में शौच मुक्त भारत बनाना है. इसके तहत केंद्र टॉयलेट बनवाने के लिए प्रोत्साहन राशि के रूप में 12,000 रुपए देता है. जो कि सीधा लाभार्थी के खाते में जाता है.
ये है पात्रता- सभी बी.पी.एल. परिवार, गरीबी रेखा से ऊपर वाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, लघु एवं सीमान्त किसान, वास भूमिवाले, भूमिहीन श्रमिक, शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तिय और महिला मुखिया परिवार इसके पात्र हैं.
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