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इरफान खान: मुसलमानो, चुप न बैठो, मज़हब को बदनाम न होने दो

बांग्लादेश नरसंहार पर इरफान ने टिप्पणी की है. हाल में उन्होंने इस्लाम में कुर्बानी की व्याख्या की तो लोग पिल पड़े थे.

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इरफान खान.

एक सर्व उत्कृष्ट मुसलमान वो होता है जिसके पड़ोसी को पता न चले कि उसके करीब कोई मुसलमान रहता है. एक सर्व उत्कृष्ट हिंदू वो है जिसके पड़ोसी को पता न चले कि उसके पड़ोस में कोई हिंदू रहता है. जो-जो अपने धर्मों को आस्तीन चढ़ाए हैं, ललाटों पर लगाए हैं, सिर धरे हैं उन्होंने अपने पालनहार तक पहुंचने और उसे समझने की यात्रा कब की तज दी है.

उसी का परिणाम है कि 1993, 2002 सिर्फ साल नहीं हैं, बल्कि वो चीरे हैं जो हमारी सभ्यता के शरीर पर लगा दिए गए हैं. एक शनिवार को बांग्लादेश में भी लगा. जब धर्म की चरम व्याख्या करने वाले कुछ मानवों ने राजधानी ढाका के होली आर्टीसन कैफे में 20 विदेशियों को क़त्ल कर दिया. कथित तौर पर उन्होंने बंधकों को पहले कुरान की आयतें सुनाने को कहा, जो नहीं सुना पाए, उन्हें मार दिया गया. इस पर इरफान खान ने टिप्पणी की है. [facebook_embedded_post href=" https://www.facebook.com/IrrfanKhan/posts/1745426592368888:0"]   उन्होंने कहा है:

बचपन में, मज़हब के बारे में कहा गया था कि आपका पड़ोसी भूखा हो तो आपको उसे शामिल किए बिना अकेले खाना नहीं खाना चाहिए. बांग्लादेश की खबर सुनकर अंदर अजीब वहशत का सन्नाटा है.

क़ुरान की आयतें न जानने की वजह से रमज़ान के महीने में लोगों को क़त्ल कर दिया गया. हादसा एक जगह होता है, बदनाम इस्लाम और पूरी दुनिया का मुसलमान होता है. वो इस्लाम जिसकी बुनियाद ही अमन, रहम और दूसरों के दर्द को महसूस करना है.

ऐसे में क्या मुसलमान चुप बैठा रहे और मज़हब को बदनाम होने दे? या वो ख़ुद इस्लाम के सही मायने को समझे और दूसरों को बताए, कि ज़ुल्म और क़त्ल-ओ-ग़ैरत (नरसंहार) करना इस्लाम नहीं है. ये एक सवाल है!

इरफान जैसे समझदार लोगों के यूं सामने आने और धर्मों की आधुनिक व्याख्या करने की बहुत जरूरत है. उन्होंने हाल ही में ईद-उल-जुहा यानी बकरीद पर भी बेबाकी से अपने विचार रखे थे. वे जयपुर में अपनी फिल्म मदारी के प्रमोशन के लिए एक प्रेस वार्ता में मौजूद थे. उन्होंने कहा:
जितने भी रीति-रिवाज और त्यौहार हैं हम उनका असली मतलब भूल गए हैं. हमने उन का तमाशा बना कर रख दिया है. कुर्बानी एक अहम मौका है. इसका मतलब है बलिदान करना. लेकिन किसी दूसरे की जान कुर्बान करके हम कौन सा बलिदान कर रहे हैं? जिस वक्त में ये रस्म शुरू हुई होगी उस वक्त भेड़ और बकरे भोजन के मुख्य स्रोत थे. बहुत लोग थे जिन्हें खाने को नहीं मिलता था. उस वक्त भेड़ और बकरियों की कुर्बानी करना मतलब अपने प्रिय पशु/चीज़ को कुर्बान करना और उसे दूसरों में बांटने से था. आज आप बाजार से दो बकरे खरीद लाते हो तो उसमें आपने क्या कुर्बान किया? हर आदमी अपने आप से पूछे कि किसी दूसरे की जान लेने से उसे कैसे सवाब/पुण्य मिल जाएगा?
इरफान के कहे पर कुछ खुश थे. कि उन्होंने ऐसी बात कही जिसकी जरूरत इस दौर में बहुत है. लेकिन बहुत से नाराज हुए. जाहिर है उन्हें धार्मिक डायनोसॉरों की श्रेणी में रखेंगे. उन्होंने धर्म की व्याख्या ऐसी कर रखी है जो त्रुटिपूर्ण है. आमतौर पर सेलेब्रिटी लोग, कमजोर रीढ़ विकसित किए हुए हैं जो किसी भी गंभीर विषय पर बोलने से डरते हैं जहां चीजें दांव पर लगी हों, ऐसे में इरफान ने डटकर अपनी बात को फिर रखा. उन्होंने जवाब में लिखा:

प्लीज भाइयो, जो भी मेरे बयान से नाराज हैं. या तो आप आत्मविश्लेषण के लिए तैयार नहीं हैं, या फिर आपको निष्कर्ष तक पहुंचने की जल्दी है. मेरे लिए धर्म का मतलब है निजी आत्मविश्लेषण. धर्म दरअसल करुणा, ज्ञान और संयम का स्रोत है. इसका मतलब रूढ़िवादिता और चरमपंथ नहीं है. मौलवी लोग मुझे नहीं डराते!! थैंक गॉड, मैं धार्मिक ठेकेदारों द्वारा प्रशासित मुल्क में नहीं रहता हूं. #आज़ादी.

उन्होंने ये भी कहा कि जो फतवा देने वाले लोग हैं उन्हें इस्लाम का नाम बदनाम करने वालों के खिलाफ फतवा देना चाहिए. उनके खिलाफ जो आतंकवाद की दुकान चला रहे हैं. जिन्होंने आतंक के बिजनेस खोल रखे हैं.
इरफान ये सब बातें ऐसे दौर में दे रहे हैं जहां धर्म के खिलाफ बोलने या उसे लेकर अपनी व्याख्या करने वालों के सिर में लौह उतार दिया जाता है. जून में मशहूर कव्वाल और सूफी गायक अमजद साबरी की हत्या कर दी गई. पाकिस्तान के समाज में पढ़े-लिखे लोगों ने, मीडिया ने उनके खिलाफ ईश-निंदा के मामले को खड़ा किया. उन्होंने 2014 में जियो टीवी पर अली के साथ है जोहरा की शादी कव्वाली गाई थी. प्रदर्शन हुए. इसे blasphemy/ईश-निंदा की संज्ञा दी गई. उनके खिलाफ लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया. एफआईआर दर्ज हुई. इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने साबरी, शायर अक़ील मोहसिन नक़वी और अन्य को नोटिस भेजे.
फिर मीडिया ने इस सर्कस को अनावश्यक रूप से चलाया. इमरान खान जैसे उदारवादी चेहरों ने भी इस आग में घी डाला. तालिबान के लिए इतना बहुत था. उन्हें मार दिया गया. साबरी गाया करते थे, भर दो झोली मेरी या मोहम्मद, लौट कर मैं न जाऊंगा खाली. https://www.youtube.com/watch?v=JD1k4_d0S1Y पिछले साल बांग्लादेश में चार ब्लॉगर्स की हत्या धार्मिक कट्टरपंथियों ने कर दी. इन घटनाओं के संदर्भ में इरफान की टिप्पणियां बहादुरी का काम हैं. लेकिन इस बहादुरी में उन्हें सुलझी मानसिकता वाले लोगों का पूरा समर्थन मिलना चाहिए. हम अभी जो कर रहे हैं उसी से हमारा भावी समाज निर्मित हो रहा है. हर धर्म जो हजारों-लाखों लोगों की हत्या का जिम्मेदार है उससे ऐसे लोगों को आगे आना चाहिए. ISIS जैसे संगठनों के उदय और उनके हिंसक कर्मों में निरंतर वृद्धि हो रही है. ऐसे संगठनों को बनाने के लिए जिम्मेदार पश्चिमी मुल्कों का हस्तक्षेप एशिया के इस्लामी मुल्कों में अभी भी कम नहीं हुआ है. पश्चिमी हथियार कंपनियों का वार्षिक उत्पादन इस्लामी मुल्कों में खपाया जा रहा और नया उत्पादन जारी है. हम IS की नृशंसता की बात करते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके मोहरे चलने वालों की नहीं. हम सिर्फ परिणाम की ओर जा रहे हैं. ऐसे नरसंहार के लिए परिस्थितियों का निर्माण जिन पश्चिमी हत्यारों ने किया उस बारे में कभी बात नहीं करते. अगर ये नहीं किया तो फिर बांग्लादेश में शनिवार को हुए नरसंहारों जैसी घटनाओं पर रोने या छाती पीटने की कोई जरूरत नहीं.

इरफान ने इस्लाम पर बोल दिया, लेकिन हिंदू धर्म की फर्जी व्याख्या करने वाले दंगाइयों पर कोई हिंदू अभिनेता तो कभी कोई नहीं बोलता. वैलेंटाइंस डे पर पार्कों में प्रेमी जोड़ों को पीटने वाले रूढ़िवादियों और गुंडों-गुंडियों पर अमिताभ, अक्षय, ऋतिक ने तो कभी कोई टिप्पणी नहीं की. अक्षय अपनी फिल्मों से हमेशा राष्ट्रवाद बेचते रहते हैं. उन्हें पता भी न होगा कि इस राष्ट्रवाद ने लाखों लोगों का क़त्ल-ए-आम करवाया है. इस पर भी व्यापक रूप से सोचें.

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