ईरान और अमेरिका के बीच एक महीने से ज्यादा समय से चल रहे सैन्य संघर्ष की ‘शांति वार्ता’ फेल हो गई. अमेरिका और ईरान का डेलिगेशन इसी के लिए शनिवार 11 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचा था. लेकिन दोनों देशों में बात नहीं बनी. पाकिस्तान की ‘मध्यस्थ’ बनने की कोशिश भी ‘फ्लॉप’ हो गई. अब सवाल है कि तकरीबन 21 घंटे तक चलने वाली इस बातचीत में क्या पेच फंस गया कि समझौता नहीं हो पाया?
ईरान-अमेरिका के बीच 5 बड़े पेच जो नहीं सुलझे, फेल हो गई 21 घंटे की 'पीस टॉक'
Iran -US का डेलिगेशन शनिवार, 11 अप्रैल को Pakistan की राजधानी Islamabad में ‘शांति वार्ता’ के लिए पहुंचा था. लेकिन दोनों ही देशों में बात नहीं बनी. और पाकिस्तान का देशों के बीच ‘मध्यस्थ’ बनने की कोशिश भी नाकाम हो गई.


ईरान का यह आरोप है कि अमेरिका अपनी जिन बातों को जंग के जरिए नहीं मनवा पाया, उसे इस ‘पीस टॉक’ के जरिए मनवाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका-इजरायल ईरान को न्यूक्लियर पावर देश नहीं बनने देना चाहते हैं. इसी वजह से दोनों देशों ने मिलकर 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमला किया था.
1. शांति के लिए बातचीत में पहला पेच जो फंसा, वो ये था कि अमेरिका लगातार इस बात पर अड़ा रहा कि ईरान किसी भी तरह न्यूक्लियर हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा. इसके लिए उसे अमेरिका को पक्की गारंटी देनी पड़ेगी. अमेरिका ने ईरान के यूरेनियम एनरिचमेंट से जुड़े उपकरणों पर भी कड़ी पाबंदी लगाने पर जोर दिया लेकिन ईरान ने इससे साफ इनकार कर दिया. उसने इस शर्त को ईरान की संप्रभुता और उसके अधिकारों के खिलाफ बताया.
2. दूसरी बात जिस पर दोनों पक्ष सहमत नहीं हो पाए वो अमेरिका की जब्ती में मौजूद ईरानी संपत्तियों से जुड़ी थी. ईरान ने अमेरिका के सामने मांग रखी कि विदेशों में उसकी जो जब्त प्रॉपर्टीज हैं, उसे छोड़ दिया जाए. इस मांग में वो पैसे भी शामिल हैं, जो कतर समेत अन्य देशों में जमा हैं लेकिन अमेरिका ने ईरान की ये शर्त मानने से मना कर दिया.
3. ईरान-अमेरिका जंग के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. शांति वार्ता में ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग पर पूरी तरह से अपने कब्जे की मांग की. इसमें यहां से गुजरने वाले जहाजों से वसूले जाने वाला ‘ट्रांजिट फीस’ भी शामिल था. अमेरिका इस पर सहमत नहीं हुआ. उसने इस रास्ते की स्वतंत्रता बनाए रखने की वकालत की. क्योंकि, दुनियाभर में करीब 20% से ज्यादा तेल-गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है.
बता दें कि ईरान ने अमेरिका-इजरायल के साथ जंग में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को एक हथियार के तौर इस्तेमाल किया. होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल होने और उसकी राह बाधित होने की वजह से भारत समेत दुनियाभर के कई देशों में तेल-गैस संकट बना रहा.

4. ईरान ने अमेरिका के सामने जंग का हर्जाना और लेबनान में सीजफायर की बात रखी लेकिन अमेरिका ने इस बात को तवज्जो नहीं दिया. अमेरिका का जोर न्यूक्लियर हथियारों के बनाने पर रोक और समुद्री मार्ग की सुरक्षा पर ही रहा. इसकी वजह से दोनों देश इस मांग पर भी तालमेल बैठाने में फेल हो गए.
5. शांति वार्ता में बातचीत के दौरान भी ईरान और अमेरिका के बीच तनाव देखने को मिला. दोनों देशों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं था और भरोसे की ये कमी मीटिंग में साफ देखी जा सकती थी. बातचीत के दौरान कई बार ऐसा हुआ, जब दोनों ओर के लोगों का मिजाज गर्म हो गया. इसकी वजह से ईरान-अमेरिका दोनों ही एक-दूसरे पर अड़ियल बने रहने का आरोप लगाते रहे.
अब ईरान-अमेरिका समझौते पर एकमत तो नहीं हुए, लेकिन ईरान ने कहा कि ‘कुछ मतभेद होने के बाद भी बातचीत जारी रहेगी.’ यानी अभी भी बातचीत के जरिए समाधान की थोड़ी गुंजाइश बची है.अब देखना ये है कि आने वाले दिनों में ईरान-अमेरिका की बातचीत की दिशा क्या होती है. दोनों देशों के बीच 2 हफ्ते का नाजुक सीजफायर अब भी लागू है, लेकिन वो कब तक टिक पाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
वीडियो: रात भर चले Islamabad Talks की पूरी कहानी






















