हम तीन पीढ़ियां हैं. तीनों की पसंद अलग है. ये स्वाद की विविधता है. वैसी ही वैरायटी, जैसी हिंदुस्तान के लोगों में है. एकदम अलग-अलग. कोई कुछ सोचता है, कोई कुछ. एकराय मुश्किल ही बनती है. मगर पिछले हफ्ते-दस दिन से देश में एक आदमी को लेकर बड़ी आम सी राय बनी है. उसके बारे में लोगों ने कहा- वो मिसाल है. कि पुलिसवाला हो, तो ऐसा हो. बस कुछ तस्वीरें और एक विडियो निहारकर ही वो सबको सगा लगने लगा. कइयों ने अपनी प्रोफाइल फोटो में उसे टांक लिया. न्यूज चैनल के प्राइम टाइम तक पर उसका जिक्र छिड़ने लगा. रातोरात देश का कलेक्टिव यूफोरिया बन गया वो. वो, माने गगनदीप. गगनदीप सिंह. उत्तराखंड पुलिस के वो सब-इंस्पेक्टर, जिन्हें अक्खा इंडिया जानता है.

सोशल मीडिया पर गगनदीप की सारी तस्वीरें ऐसी ही घूम रही हैं, जिसमें उन्होंने वर्दी पहनी हुई है. इसीलिए हमने उनसे ऐसी फोटो मांगी, जिसमें वो सिविल कपड़ों में हों. और हाथ आई ये तस्वीर.
क्या गगनदीप को परेशान किया जा रहा है?
खुशमिजाज. शर्मीला. और ईमानदार.
गगनदीप से बात करके हमें ऐसा ही लगा. पहले वॉट्सऐप पर मेसेज से बात हुई. फिर फोन पर. 15 मिनट, 27 सेकेंड चली वो बात, जिसके दरमियां कम से कम 50 बार तो उस बंदे ने कहा ही. कि मैंने तो बस अपनी ड्यूटी की. जो किया, उसमें कुछ भी बड़प्पन वाली बात नहीं थी. वो उधमसिंह नगर के अपने घर में. और मैं गाजियाबाद के अपने घर में. कान से चिपके मेरे मोबाइल को गगनदीप की सिंसियेरिटी सुकूं दे रही थी. मैंने उन्हें बताया. कि मैंने कई बार उनकी वो तस्वीर निहारी है. जिसमें वो उस मुस्लिम युवक (शायद बबलू नाम था) को सीने से चिपटाए भीड़ से निपट रहे हैं. गगनदीप हंस दिए. वो शर्मीलेपन की हंसी थी. वैसी हंसी, जो थोड़ा अच्छा इंसान अपनी तारीफ सुनकर झेंपने के बाद हंसता है. असहज हो जाता है. मेरे सुनने में आया था. कि गगनदीप को तंग किया जा रहा है. कि डिपार्टमेंट, खासकर राज्य की बीजेपी सरकार उनकी डेयरिंग से खुश नहीं हुई. क्योंकि ये बीजेपी के 'लव जिहाद' वाले अजेंडे पर फबता नहीं है. इसी वजह से उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है. सुने का असर था कि बात शुरू होने के दूसरे ही मिनट मैंने गगनदीप से ये सवाल कर लिया. पूछा- आप ठीक हैं? जवाब मिला, हां जी. बिल्कुल खैरियत. आप कैसी हैं?
यह पुलिस ऑफिसर गगनदीप सिंह जिन्होंने एक मुस्लिम युवक को बेकाबू भीड़ से बचाया बड़े ही शर्म की बात है कि उनको छुट्टी पर...
Posted by Manraj Singh Mokha
on Friday, June 1, 2018
ना जी ना, बिल्कुल नहीं. मेरे तो घर से लेकर थाने वाले, रिश्तेदार, कप्तान साहब (सीनियर अधिकारी) भी बहुत खुश हैं. सबने पीठ थपथपाई मेरी. पूरा डिपार्टमेंट खुश है मुझसे.मैंने पूछा, आपको पता था कि जिसे आप बचा रहे हैं वो मुसलमान है? उन्होंने कहा- हां. पता था. मगर इससे क्या फर्क पड़ता है. उसकी जगह कोई भी और होता, किसी भी धर्म या जाति का, तो मैं यही करता. पुलिस की वर्दी पहनकर जब आप ड्यूटी पर होते हैं, तब आप किसी धर्म के नहीं होते. न ही आपको इस बात से फर्क पड़ना चाहिए कि सामने वाले का धर्म क्या है.

कुछ जगहों पर आया कि लोग भले ही गगनदीप की तारीफ कर रहे हों, लेकिन राज्य सरकार उनसे नाराज है.
सरकार के प्रेशर में गगनदीप को छुट्टी पर भेज दिया गया? फिर मैंने पूछ लिया- 'ऊपर' से नाराजगी जताई गई है क्या? कोई प्रेशर? गगनदीप ने साफ इनकार किया. उनका टोन भी टटोलने की कोशिश की मैंने. उसमें सब सामान्य था. शक करने की कोई वजह नहीं थी. तब तो बिल्कुल नहीं, जब कि डिपार्टमेंट गगनदीप को इनाम देने जा रहा है. मैंने फिर भी गगनदीप से सवाल किया- फिर छुट्टी पर क्यों भेज दिया गया है आपको? उन्होंने कहा-
छुट्टी तो पहले से अप्रूव थी मेरी. फैमिली में कुछ काम था. पहले से तय था कि इन तारीखों को आना है. वो तो बीच में ये घटना हो गई. वरना तो जिंदगी नॉर्मल ही थी.मैंने पूछा- अब नॉर्मल नहीं है क्या? उन्होंने कहा-
आपको पता है. 22 मई (जिस दिन ये घटना हुई) की रात मैं रोज की ही तरह सोया था. ड्यूटी करके लौटा था. तब हर चीज रोज की तरह थी. अगले दिन फेसबुक पर मुझे अपनी कुछ तस्वीरें नजर आईं. कुछ लोगों ने लिखा हुआ था मेरे बारे में. और मंदिर की घटना के बारे में. मुझे ताज्जुब हुआ कि इन लोगों को कैसे पता चला? फिर तो ये बात फैलती ही चली गई. मीडिया में आ गया. मुझे नहीं पता कि कब और किसने उस घटना का विडियो बनाया.मुझे समझ आ गया. कि गगनदीप जिस 'नॉर्मल' की बात कर रहे हैं, उसका मतलब आदत से है. कि उन्हें इतने अटेंशन की आदत नहीं है. मैंने उनसे ट्रोल्स के बारे में भी पूछा. जो हिंदू-मुस्लिम ऐंगल लेकर गगनदीप को कोस रहे थे. इस पर उन्होंने कहा कि लोगों ने जितनी दुआएं दी हैं, जितनी तारीफें की हैं, जितना प्यार दिया है, वो कहीं ज्यादा हैं. इतनी ज्यादा कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. फिर मुझे याद आया कि खबरें ये भी चल रही हैं कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं. जान से मारने की. कि कुछ कट्टर हिंदूवादी संगठन उन्हें धमका रहे हैं. उन्होंने कहा- नहीं, मुझे सीधे से कोई धमकी नहीं मिली है.

सोशल मीडिया पर ऐसे मेसेज भी खूब चल रहे हैं.

लोग ये भी लिख रहे हैं कि ऊपरी दबाव के कारण गगनदीप को छुट्टी पर भेज दिया गया है.

शहीद उधम सिंह क्रांतिकारी थे. अंग्रेजों के देश में, उनके लंदन में घुसकर उन्हीं के बीच उन्होंने माइकल ओ डायर के सीने में दो गोलियां दाग दीं. और इस तरह उन्होंने जालियांवाला बाग के होने के 21 साल बाद उस हत्याकांड का बदला ले लिया.
शहीद उधम सिंह के साथ गगनदीप का कनेक्शन 13 अप्रैल, 1919. पंजाब का अमृतसर शहर. वैशाखी के दिन जालियांवाला बाग में निहत्थे लोग शांति से विरोध करने जुटे. अमृतसर प्रशासन की बागडोर थी लेफ्टिनेंट जनरल माइकल ओ डायर के हाथ में. उसने एक जनरल डायर को कई दर्जन जवानों के साथ वहां भेजा. डायर ने निर्दोषों पर गोलियां चलाईं. हजारों मारे गए. उस दिन वहां एक 20 साल का जवान भी मौजूद था. घायलों को पानी पिलाता रहा. 21 साल बाद इस जवान ने ब्रिटेन की राजधानी लंदन के कैक्सटन हॉल में सबके सामने माइकल ओ डायर पर गोली चलाई. डायर मारा गया. जिस क्रांतिकारी उधम सिंह ने जालियांवाला बाग का ये बदला लिया था, उन्हीं के नाम पर उत्तराखंड में एक जिले का नाम पड़ा. उधमसिंह नगर. यहीं के रहने वाले हैं गगनदीप. तराई में बसा हुआ है ये जिला. गगनदीप की ड्यूटी पड़ोस के जिले नैनीताल में लगी है.रामनगर शहर में. पहले उधमसिंह नगर भी नैनीताल जिले का ही हिस्सा था. ये उत्तर प्रदेश के बंटवारे से पहले की बात है.

कई सुपरस्टार्स और सिलेब्रिटीज ने भी इस तस्वीर पर पोस्ट लिखी. गगनदीप की तारीफ की. इस तस्वीर ने पुलिस की छवि को जो बूस्ट दिया है, वो शानदार है. फिर वही बात है. काम बोलता है. बाकी इंसानियत और इंसान वाली बात तो है ही. और सबसे बड़ी इंसानियत ही है.
'सोशल मीडिया देखकर अमेरिका वाले ताऊजी ने फोन किया' 16 जुलाई, 1990 की पैदाइश है गगनदीप की. 28 के हैं. परिवार में एक छोटी बहन है. वो अमृतसर रहती हैं. डॉक्टर हैं. घर पर मां ही रहती हैं. क्योंकि उनके पिता की मौत एक एक्सीडेंट में तब हो गई थी, जब गगनदीप 5 साल के थे. इस जॉइंट परिवार के बाकी लोग, माने गगनदीप के ताऊ जी और उनका परिवार अमेरिका में रहता है. गिरिजा मंदिर वाली बात सात समंदर पार ताऊ जी तक भी पहुंची. उन्होंने सोशल मीडिया पर देखा. फटाफट गगनदीप को फोन घुमाया. ताऊ जी बोले- शाबाश, सीना चौड़ा हो गया मेरा. मां ने क्या कहा, ये पूछने पर गगनदीप बोले- बहुत गर्व हुआ उनको. बोलीं, बहुत अच्छा काम किया तूने. ऐसे ही अच्छा काम करते रहना. फोन तो सारे रिश्तेदारों के आए. ऐसा नहीं कि किसी को फोन करके बताया गया हो. सोशल मीडिया के रास्ते खुद ही सबके पास खबर पहुंची.

ये विडियो बहुत वायरल हुआ. इतना पॉपुलर हुआ कि विदेशों तक पहुंच गया. हर जगह उनकी तारीफ हो रही थी.
मैंने पूछा, इस पूरी बात में सबसे ज्यादा खुशी किस बात पर हुई. बोले-
पुलिसवालों को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है. मुझे खुशी है कि मेरी वजह से पुलिस के बारे में लोगों ने अच्छी बातें कीं. पुलिस के अच्छे काम के बारे में लोगों को मालूम चला. हो सकता है कि इस घटना की वजह से पुलिस को लेकर बनी लोगों की गलतफहमियां दूर हों. उनको मालूम चले कि पूरा पुलिस सिस्टम करप्ट और नकारा नहीं है. बाकी अच्छे और बुरे लोग कहां नहीं हैं? अच्छे हमेशा ज्यादा होते हैं. तभी सिस्टम चलता है.घटना वाले दिन क्या हुआ था? उस दिन, यानी 22 मई को क्या हुआ था, ये भी पूछा मैंने. बोले-
मैं वहां मंदिर के पास ड्यूटी पर था. तभी ये हो-हल्ला सुनाई दिया. टेंशन हो गई थी वहां. मैं वहां पहुंचा, तो कुछ लोग उस मुस्लिम लड़के को मारने पर तुले थे. ऐसा नहीं कि वहां जमा सारी भीड़ ही ये चाहती हो. या इस तरह की हो. लेकिन कुछ लोग थे, जो माहौल खराब कर रहे थे. मेरा पूरा ध्यान इस बात पर था कि कैसे उस लड़के को और उसके दोस्त को बचाऊं. कैसे उन्हें सही-सलामत वहां से ले जाऊं.

कई लोगों ने अपनी प्रोफाइल फोटो बदल दी. अपनी जगह गगनदीप की तस्वीर लगा दी.
जब भीड़ ने घेरा, तब क्या डर लग रहा था गगनदीप को? मैंने पूछा फिर कि क्या उन्हें (गगनदीप को) डर लग रहा था उस वक्त. बोले, नहीं. मुझे अपने लिए डर नहीं लग रहा था. मैं जानता था कि पुलिसवाले पर हमला नहीं करेंगे लोग. सारी चिंता उस लड़के की थी. मंदिर के अंदर कपल्स के आने पर वो कुछ कहेंगे, मैंने पूछा. गगनदीप ने जवाब दिया-
आने का मतलब ये तो नहीं कि उन्हें पीट देंगे. या जान से मार देंगे. कोई भी किसी के भी साथ मार-पीट तो नहीं ही कर सकता है. ये हक तो कानून किसी को नहीं देता. मेरा काम है कानून मानना. कानून मनवाना. नियम से रहना और नियम से चलवाना. बाकी किसी बात से मुझे कोई लेना-देना नहीं. सही और गलत तय करने के लिए वैसे भी अदालतें हैं देश में. ये उनका ही काम है. भीड़ का काम नहीं है कि वो सही और गलत तय करे.

मैं नहीं चाहती थी कि सारे गंभीर सवाल ही पूछूं. सो मैंने पूछा- लव मैरिज करनी है कि अरेंज्ड. गगनदीप शर्माते हुए बोले. बोले, घरवाले करेंगे जो करेंगे.
गगनदीप के लिए रिश्ता खोज रहे हैं घरवाले मुझे कुछ भी फाउल प्ले नहीं लगा. कुछ नेताओं के बयान जरूर आए हैं. लव जिहाद टाइप. मगर इस मुल्क में कई लोगों का मुंह बहुत बड़ा है. जिसके जो मन आता है, बोल देता है. जब तक पुलिस कायदे-कानून से चल रही है और प्रशासन सही का साथ दे रहा है, तब तक सब दुरुस्त है. और फिलहाल तो रामनगर के इस केस में प्रशासन की ओर से कुछ गलत होता नहीं दिख रहा है. उत्तराखंड पुलिस खुश है. कि उनके बीच का एक शख्स अच्छे कारणों की वजह से खबरों में है. गगनदीप सिंह की भी जिंदगी दुरुस्त चल रही है. डिपार्टमेंट और सरकार की नाराजगी जैसी बातें फिलहाल तो सही नहीं लगतीं. बाकी जहां तक जिंदगी की बात है, तो गगनदीप के परिवारवाले वैसे ही नॉर्मल काम कर रहे हैं जैसे आम हिंदुस्तानी परिवार करते हैं. कि बच्चा जवान हो जाए, तो उसका रिश्ता खोजने में दिन-रात एक करते हैं. वही यहां भी हो रहा है. जाते-जाते एक आखिरी बात. मैंने गगनदीप से पूछा. कि लोग उन्हें पहचानने लगे होंगे अब तो. बोले-
हां. 24 मई को मैं ऑफिस के काम से दिल्ली गया था. वहां कुछ लोगों ने मुझे देखा और बोलने लगे. कि अरे, ये तो वही पुलिसवाला है. फिर मैंने सोचा कि शायद इस वजह से पहचाना हो कि मैंने वर्दी पहनी हुई थी.अच्छा काम करने वाले की तारीफ हो, तो भरोसा रहता है. कि अच्छाई अब भी अच्छी ही समझी जाती है. कि लोगों को सही और गलत की समझ है. कुछ और भी बातें हुईं. फिर फोन रखते हुए जब मैंने बाय कहा, तो बाय कहते-कहते भी गगनदीप बोले-
मैंने तो जी बस अपनी ड्यूटी की थी.मैंने मन ही मन गिनती जोड़ी. एक दो तीन चार... सच कह रही हूं- पचासवीं बार तो पक्का कहा होगा उन्होंने ये.
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