अप्रैल 2017 में भी भारतीय सेना के एक मेजर ने एक कश्मीरी को जीप के आगे बांधकर ह्युमन शील्ड बनाया था. इसकी बहुत आलोचना हुई थी. इसे मानवाधिकार उल्लंघन कहा गया था. अब इस विडियो आया है. जिसमें सेना के जवानों ने चार युवकों को अपनी गाड़ी के आगे बिठाया हुआ है. विडियो में आपको एक कच्ची सड़क सी दिखती है. उसके ऊपर पत्थर पड़े हुए हैं. ऐसा लगता है कि विडियो बनाए जाने से पहले वहां पत्थरबाजी हो रही थी. इसके ही जवाब में सेना ने चारों युवकों को ह्युमन शील्ड बनाया. ये युवक भी पत्थरबाजी कर रहे लड़कों के साथ थे या नहीं, ये अभी नहीं मालूम चला है (फोटो: यूट्यूब)
कश्मीर में सेना ने दूसरी बार ह्यूमन शील्ड का इस्तेमाल किया है. एक विडियो सामने आया है. सेना ने अपनी गाड़ी के सामने चार युवकों को बैठा दिया. ह्यूमन शील्ड बनाकर. ये सोचकर कि उन युवकों की वजह से पत्थरबाज सेना पर पत्थर नहीं फेंकेंगे. विडियो में सेना के 12-13 जवान खड़े दिख रहे हैं. उन्होंने चार युवकों को पकड़कर अपनी गाड़ी के सामने बिठा रखा है. थोड़ी दूरी पर कुछ लोकल लड़के खड़े हैं. दोनों पक्षों के बीच तेज आवाज में बहस भी हो रही है. बातचीत साफ नहीं है. कुछ नारेबाजी भी हो रही है. 'हम तुम्हारे साथ हैं' टाइप कुछ. ये किसी गांव का कच्चा रास्ता लग रहा है. रोड पर पत्थर पड़े हैं. देखकर लगता है कि विडियो बनाए जाने से पहले वहां पत्थरबाजी हो रही थी. जिन लड़कों को ह्यूमन शील्ड बनाया गया, वो पत्थरबाजी करने वालों के साथ था या अलग, अभी ये नहीं मालूम. देखने से मालूम होता है कि दूसरी तरफ खड़े लड़कों में से ही कोई ये विडियो बना रहा है. विडियो देखते हुए पीछे से उसकी आवाज आती है-
इन्होंने हमारे साथियों को आगे लगा रखा है. ताकि कोई पत्थर न मारे.

विडियो में सेना एक तरफ खड़ी है. दूसरी तरफ लोकल लड़के हैं. बीच में जो सड़क है, उसके ऊपर ये पत्थर पड़े हैं. देखकर लगता है कि यहां पत्थरबाजी हुई होगी (फोटो: यूट्यूब)
सेना सर्च ऑपरेशन के लिए गई थी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले की घटना है. ये विडियो कुछ दिन पुराना है. यहां सेना ने एक सर्च ऑपरेशन चलाया था. खबर थी कि इस इलाके में आतंकी छुपे हुए हैं. सेना उनको ही तलाश रही थी. इस दौरान कुछ लोकल लड़के जमा होकर पत्थरबाजी करने लगे. पत्थरबाजी रोकने के लिए सेना ने चार लड़कों को पकड़कर अपनी गाड़ी के आगे बिठा दिया. जम्मू-कश्मीर पुलिस फिलहाल इस विडियो की तफ्तीश कर रही है. ताकि पता लगाया जा सके कि पूरा मामला क्या था. कब का था, कहां का था, क्या हुआ. पूरी असलियत मालूम करने के बाद पुलिस इस बारे में आधिकारिक तौर पर कोई बयान देगी. सेना और पुलिस का बयान नहीं आया है. लेकिन ट्विटर पर कुछ लोग बहुत खुश हैं. वो सेना की पीठ थपथपा रहे हैं.
मेजर गोगोई ने भी ऐसे ही ह्यूमन शील्ड बनाया था
9 अप्रैल, 2017. श्रीनगर संसदीय सीट का उपचुनाव था. पूरी घाटी में एक ही लोकसभा सीट है. सो पूरी घाटी में वोटिंग हो रही थी. बड़गाम जिले की बात है. वहां पेशे से शॉल बनाने वाला एक बुनकर वोट डालकर पोलिंग बूथ से बाहर निकला. घर जा रहा था. कि भारतीय सेना की 53वीं राष्ट्रीय रायफल्स के एक मेजर लीतुल गोगोई ने उस आदमी को उठा लिया. उसे अपनी जीप के आगे बांध दिया. मेजर गोगोई उसे यूं ही बांधकर बड़ी देर तक जीप घुमाते रहे. इसलिए ताकि पत्थरबाज उनकी जीप पर पत्थर न फेंके. कि कोई उनकी जीप को, यानी सेना की गाड़ी को निशाना न बनाए. मेजर गोगोई की जीप पर बंधे उस शख्स का नाम फार्रूख डार था. जीप पर बंधे फार्रूख की तस्वीर दुनिया ने देखी. भारत की आलोचना भी हुई. इसे मानवाधिकार उल्लंघन माना गया. लेकिन भारतीय सेना ने मेजर गोगोई को उनकी 'बहादुरी' के लिए इनाम दिया.
जीप पर बांधे जाने के बाद फार्रूख की जिंदगी बदल गई
सुनने में आया कि इस घटना की वजह से फार्रूख डार आज भी दहशत में रहते हैं. डिप्रेशन में चले गए हैं. इस घटना से पहले फार्रूख एक वर्कशॉप चलाते थे. खुद तो शॉल की बुनाई करते ही थे. इसके अलावा करीब 15 लोग उनके यहां काम करते थे. लोकल युवाओं में से भी कुछ उनके पास काम सीखने आते थे. मगर जीप के आगे बांधे जाने के बाद फार्रूख का ये वर्कशॉप बंद हो गया. उनका कहना है कि अब न तो उनके पास कोई काम है. न ही कोई उन्हें डर के मारे कोई काम देता है. ऐसा नहीं कि लोगों ने उनका बायकॉट कर रखा हो. बल्कि उन्हें लगता है कि फार्रूख की मौजूदगी से बेमतलब का अटेंशन मिलेगा. इसी डर की वजह से लोग उन्हें काम नहीं देते. अब फार्रूख के पास खेती का सहारा है. एक घटना ने उनकी जिंदगी सिर के बल उलट दी. अगर ये विडियो में दिख रही चीजें सच हैं, तो मतलब इस बार सेना ने चार युवकों को ह्युमन शील्ड बनाया है. अगर ऐसा हुआ है, तो क्या उनकी जिंदगी में भी कोई नेगेटिव बदलाव आएगा?

मेजर गोगोई को बाद में भारतीय सेना ने इनाम दिया. कुछ दिनों पहले वो खबरों में आए थे. श्रीनगर के एक होटल में वो एक लड़की के साथ मिले थे. इसे लेकर भी काफी विवाद हुआ था.
जब पत्थरों की बारिश होती है...कुछ दिनों पहले कश्मीर में सीआरपीएफ की गाड़ी से एक बाइक टकरा गई. उसके बाद उस गाड़ी पर पथराव का ये वीडियो है:
मानवाधिकार कानून
ह्यूमन शील्ड की हर घटना पर बहुत से लोग मानवाधिकार कानून की बात करते हैं. इसकी बात करते ही याद आता है जिनिवा कन्वेंशन. दूसरे विश्व युद्ध की बुरी यादों से सबक लेते हुए एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधि जैसा कुछ करने की सोची गई. इसी सोच से आगे बढ़े, तो चार जिनिवा कन्वेंशन हुए. इनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार से जुड़े कुछ नियम तय हुए. ये नियम हथियारबंद संघर्ष की स्थिति में मानवाधिकार सुनिश्चित करते हैं. मसलन, आम नागरिकों के मानवाधिकार. घायलों के मानवाधिकार. बच्चों-बुजुर्गों के मानवाधिकार. आप पूछेंगे कि मानवाधिकार क्या होते हैं? हर इंसान के पास इंसान होने के नाते कुछ बुनियादी हक होते हैं. ऐसे हक, जो उनसे नहीं छीने जा सकते. मानवाधिकार कानून तय करते हैं कि चाहे कितनी भी बदतर स्थिति हो, चाहे हिंसक संघर्ष और युद्ध ही क्यों न हो रहा हो, तब भी कुछ चीजें सेक्रोसेंट रहें.
भारत जिनिवा कन्वेंशन को मानता है, मगर उसके दो हिस्से नहीं मानता
भारत जिनिवा कन्वेंशन को मानता है. उसके ऊपर दस्तखत कर चुका है. 1977 में इस जिनिवा कन्वेंशन के अंदर दो और प्रोटोकॉल्स जोड़े गए थे. एक, अडिशन प्रोटोकॉल I. दूसरा, अडिशनल प्रोटोकॉल II. शॉर्ट में API. और APII. API कहता है कि अगर किसी जगह के लोग आजादी चाहते हैं और इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो उनका मूवमेंट अंतरराष्ट्रीय संघर्ष माना जाएगा. मतलब कि वो अंतरराष्ट्रीय मुद्दा होगा. APII में गैर-अंतरराष्ट्रीय हथियारबंद संघर्ष की स्थिति में क्या नियम होंगे, ये तय करता है. मतलब कि किसी सदस्य देश के अंदर अगर घरेलू स्तर पर कोई संघर्ष चल रहा है, तो वो भी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों की जद में आएगा. भारत ने इन दोनों प्रोटोकॉल्स पर दस्तखत नहीं किया. क्यों? क्योंकि ऐसे में कश्मीर और नक्सल संघर्ष के मामले में भी भारत को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का पालन करना होगा. ये चीजें भी इंटरनैशनल ह्यूमन राइट्स की जद में आ जाएंगी.
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