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जिस ब्रिटेन ने हमारा देश बांटा, उसके अपने घर में भी एक कश्मीर है

दोनों का इतिहास हिंसा और खून-खराबे से भरा हुआ है. अच्छी बात ये है कि दशकों तक चली हिंसा से वहां लोग उकता गए. पीस अग्रीमेंट कर लिया. जाने हमारे कश्मीर में कब शांति आएगी.

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अगर मैं कहूं कि हिंदुस्तान से हजारों किलोमीटर दूर, बहुत दूर, अंग्रेजों के घर में भी एक कश्मीर है, तो? तो शायद आप चौंक जाएंगे. मगर मैं जो किस्सा आपको सुनाने जा रहा हूं, वो यही है. किस्सा-ए-यूरोपियन कश्मीर. यूनाइटेड किंगडम. मतलब साझा साम्राज्य. इसमें चार देश हैं. इंग्लैंड, नॉदर्न आयरलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स. मेरे इस आर्टिकल का मेन किरदार है नॉदर्न आयरलैंड. ब्रिटेन के पश्चिम की तरफ बसा एक छोटा सा द्वीपनुमा हिस्सा. वैसे देखें, तो आयरलैंड एक भरा-पूरा द्वीप है. मगर इसके दो हिस्से हैं. एक रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड. दूसरा ये नॉदर्न आयरलैंड. रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड एक आजाद देश है. जबकि नॉदर्न आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम का पार्ट है. माने, ब्रिटेन का एक भाई. आयरलैंड का ये उत्तरी हिस्सा एक तरह से यूरोप का कश्मीर है.

ये यूनाइटेड किंगडम
ये यूनाइटेड किंगडम का नक्शा देखिए. इस साम्राज्य के चार हिस्से हैं. ब्रिटेन, नॉदर्न आयरलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स. नॉदर्न आयरलैंड, आयरलैंड का एक हिस्सा है. मगर राजनैतिक तौर पर आयरलैंड रिपब्लिक अलग है और ये नॉदर्न आयरलैंड अलग.

नॉदर्न आयरलैंड: हर गली जंग का मैदान थी
नॉदर्न आयरलैंड. ब्रिटेन के आधीन एक विवादित इलाका है. लगभग 18 लाख की आबादी. कुदरत की बेमिसाल खूबसूरती. हरे-नीले पानी के बीच. हरी-भरी फिजा. फूलों की वादियां. और इसके ऊपर लोगों के मुस्कुराते चेहरे. मगर मगर इतिहास उतना ही हिंसक. खून-खराबे से भरा. यहां आकर आपको शायद कभी एहसास ही न हो कि एक जमाने में यहां दिन-दहाड़े गोलियां चलती थीं. लगता था हर गली जंग का मैदान हो. लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे थे.

ईसाई धर्म के दो धड़े हैं. कैथलिक और प्रोटेस्टेंट. कैथलिक सबसे पुराना है. ज्यादा परंपरावादी, ज्यादा कट्टर.
ईसाई धर्म के दो धड़े हैं. कैथलिक और प्रोटेस्टेंट. कैथलिक सबसे पुराना है. ज्यादा परंपरावादी, ज्यादा कट्टर. यूरोप में कैथलिक बनाम प्रोटेस्टेंट की लड़ाई बहुत लंबी है. बहुत खूनी इतिहास रहा है दोनों धड़ों के बीच. नॉदर्न आयरलैंड में जो सांप्रदायिक ऐंगल है, वो दो धर्मों के बीच नहीं है. एक ही धर्म के दो धड़ों के बीच है (फोटो: रॉयटर्स)

कैथलिक बनाम प्रोटेस्टेंट: मैं बड़ा कि तू बड़ा
इस इतिहास की कहानी 17वीं सदी से शुरू होती है. जब इंग्लैंड के एक प्रोटेस्टेंट राजा ने आयरलैंड के कैथलिक राजा को हरा कर पूरे आयरलैंड पर कब्ज़ा कर लिया. इस राजा को किंग विलियम ऑफ़ ऑरेंज कहते थे. ये नाम इसलिए कि उसकी सेना भगवा रंग का झंडा लेकर साथ चलती थी. जीत के बाद विलियम की सेना ने पूरे आयरलैंड में मार्च किया. इस भगवा की वजह से आज भी जुलाई महीने में उत्तरी आयरलैंड में बहुत तना-तनी रहती है. जब प्रोटोस्टेंट लोग किंग विलियम की याद में ये मार्च निकालते हैं. सनद रहे कि इसका हमारे भगवा से कोई लेना-देना नहीं है. वैसे तो आयरलैंड का रंग हरा है, लेकिन इससका इस्लाम से कोई सरोकार नहीं.

आजादी का संघर्ष
कहानी को आगे बढ़ाते हैं. 19वीं और 20वीं सदी में आयरलैंड, भारत की तरह ही ब्रिटैन का उपनिवेश बना रहा. उपनिवेश, माने कॉलोनी. गुलाम. ये वो दौर था, जब लाखों आयरिश काम-धंधे की तलाश में अमेरिका चले गए. इनकी तादाद इतनी थी कि अंदाजन आज हर दस में से एक अमेरिकन अपने आपको आयरिश मूल का कहता है.

भारत की तरह ही आयरलैंड की आजादी की लड़ाई लंबे समय तक चली. उस दौर में दोनों देशों को एक-दूसरे से हमदर्दी भी थी. भारत के चौथे राष्ट्रपति वराह वेंकट गिरी ने डबलिन में रहकर पढ़ाई की थी. उन दिनों वो आयरलैंड की आजादी में भागीदारी किया करते थे. कांग्रेस के शुरुआती दिनों में ऐनी बेसेंट का बड़ा रोल था. वो एक आयरिश महिला थीं. जब उन्होंने 1914 में ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की, तो उस पर आयरिश स्वतंत्रता आंदोलन का स्पष्ट प्रभाव था. ये बात इसलिए बता रहा हूं, ताकि आप दोनों देशों की आजादी के सफर की मिलती-जुलती बातें जान सकें. एक और मजे की बात बताऊं. आयरलैंड के झंडे में भी भारत के झंडे की तरह तीन रंग हैं. इसे भी तिरंगा ही कहते हैं. दोनों झंडों में अंतर बस इतना है कि आयरलैंड के झंडे में रंग ऊपर से नीचे हैं. और हां, उसमें अशोक चक्र भी नहीं है.

आयरलैंड
प्रोटेस्टेंट धड़े के लोग कैथलिक आयरलैंड का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे. ये आयरलैंड में शुरू हुए फसाद की जड़ बना.

जैसे हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ, वैसा ही आयरलैंड में भी हुआ
अब बारी है आयरलैंड की आज़ादी पर बात करने की. ये वो पॉइंट है, जहां से मौजूदा उत्तरी आयरलैंड की समस्या शुरू हुई. साल 1920 में आयरलैंड आजाद. तब इसे दो भागों में बांट दिया गया. एक उत्तरी आयरलैंड. दूसरा दक्षिणी आयरलैंड. दक्षिणी आयरलैंड में ‘रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड’ नाम के एक देश ने सिर उठाया. जबकि उत्तरी आयरलैंड को एक अलग स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया. ये उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन के आधीन था. ऐसा इसलिए कि उत्तरी आयरलैंड में बड़ी आबादी किंग विलियम के द्वारा बसाये गए प्रोटेस्टेंट धड़े के लोगों की थी. और वो लोग कैथलिक आयरलैंड का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे. यहीं से उस फसाद की शुरुआत होती है, जो आज तक जारी है. उत्तरी आयरलैंड में आज भी यूनियननिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी है. यूनियननिस्ट ब्रिटेन के लिए वफादार है. जबकि रिपब्लिकन उत्तरी आयरलैंड को बाकी आयरलैंड में मिलाने की मांग करते हैं. इन दोनों के बीच का झगड़ा सांप्रदायिक और और, दोनों है. ज्यादातर लोग अपने समुदाय के लिए ही वोट करते हैं. कैथलिक और प्रोटेस्टेंट बच्चों के स्कूल अलग बनाए गए. उनके रहने के मुहल्ले अलग बसाए गए. यहां तक कि उनके चर्च भी अलग हैं.

हिंसा के दौर की शुरुआत
1960 के दशक में एक बुरा दौर शुरू हुआ. वो दौर, जिसको इतिहास ‘काला दौर’ कहता है. यहां के लोग इसे ‘द ट्रबल्स’ कहते हैं. वो इसे एक मुसीबत की तरह याद करते हैं. इस दौर को देखने से एक बात और पता चलती है. कि किस तरह एक सिसासी समस्या का समाधान तलाशते-तलाशते बात खुंरेजी पर पहुंच जाती है. दोनों गुटों की ओर से दर्जनों पैरामिलिटरी ग्रुप बनाए गए. ये सभी हथियार बंद लड़ाके थे और तमाम गैर-कानूनी कामों में भी शामिल थे. एक तरफ था खूंखार IRA. यानी आयरिश रिपब्लिकन आर्मी. दूसरी तरफ थी ब्रिटिश सेना और पुलिस के सिपाही. IRA के पास आयरिश कैथलिक का जबर्दस्त सपोर्ट था. मगर उनके खिलाफ थी ब्रितानी सरकार और उस सरकार की समूची ताकत. इन दोनों की लड़ाई में ये जगह किसी सैनिक छावनी में तब्दील हो गई. चप्पे-चप्पे पर सेना के चेकपॉइंट. निगरानी रखने के लिए वॉच टावर. इस संघर्ष में सरकार की तरफ से नागरिक अधिकारों का भी उल्लंघन किया गया.

IRA का पूरा नाम है आयरिश रिपब्लिकन आर्मी. इसकी हिंसक गतिविधियों के कारण ब्रिटेन
IRA का पूरा नाम है आयरिश रिपब्लिकन आर्मी. इसकी हिंसक गतिविधियों के कारण ब्रिटेन ने इसे आतंकवादी संगठन करार दिया. ये IRA के गुरिल्ला लड़ाकों की एक शवयात्रा का जुलूस है.

एक तरफ IRA, दूसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत
दूसरे किनारे पर लड़ रही IRA ने भी हिंसा का कोई मौका नहीं छोड़ा. हर गली-नुक्कड़ को गुरिल्ला युद्ध का मैदान बना दिया. ये लोग औचक हमला करने में, छापामार स्टाइल लड़ाई में बड़े सधे हुए थे. इन्होंने ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया. दोनों तरफ से बहुत खून-खराबा हुआ. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर निर्दोष नागरिकों को मारने के आरोप लगाए. खूब बम फटे. गोले दगे. गोलियों की तो कोई गिनती ही नहीं. लगभग 3,600 जाने गईं. IRA ने न सिर्फ उत्तरी आयरलैंड, बल्कि इंग्लैंड में भी बम विस्फोट किए. इनसे इंग्लैंड के कई हिस्सों में काफी दहशत फैल गई. IRA चाहता था कि लड़ाई बस आयरलैंड में न सिमटी रहे. ब्रिटेन के अंदर, उसके दिल तक पहुंचे. वहां रहने वालों को एहसास हो कि आयरलैंड में क्या हो रहा है. उन्हें IRA की मांगों का, उसका पक्ष का पता चले. IRA अपनी रणनीति में कामयाब भी हुआ.

ये माउंटबेटन की हत्या के बाद अखबार में छपी खबर
ये माउंटबेटन की हत्या के बाद अखबार में छपी खबर की तस्वीर है. डेली मेल ब्रिटेन का एक बड़ा अखबार है. माउंटबेटन को लॉर्ड की उपाधि दी गई थी. लुइस तो उनका नाम ही था. इस तस्वीर के अंदर एक तस्वीर है. माउंटबेटन का शव किनारे लाया गया है. लोग उसे नाव से उतार रहे हैं. इस धमाके की जिम्मेदारी IRA ने ली थी (फोटो: डेली मेल)

IRA ने धमाका किया, माउंटबेटन मारे गए
इस संघर्ष का एक भारतीय कनेक्शन भी है. भारत के अंतिम वायसराय और पहले गवर्नर जनरल थे माउंटबेटन. वो रिश्ते में ब्रिटेन की मौजूदा महारानी के चाचा थे. वो महारानी को प्यार से ‘लिलीबट’ कहकर पुकारते थे. माउंटबेटन को उत्तरी आयरलैंड का एक शहर ‘वॉरेन पॉइंट’ बहुत पसंद था. ये शहर आयरिश सी (समंदर) के मुहाने पर बसा एक बंदरगाह वाला शहर है. माउंटबेटन अपनी छुट्टियां बिताने यहां आया करते थे. इन छुट्टियों के दौरान ज्यादातर समय वो अपनी नाव में घुमते थे. 27 अगस्त, 1979. माउंटबेट उस दिन भी अपनी नाव लेकर निकले थे. मगर ये दिन अलग निकला. एक जोरदार बम धमाका हुआ और इसकी चपेट में आकर वो मारे गए. इस घटना की जिम्मेदारी IRA ने ली. IRA ने माउंटबेटन को मोहरा बनाकर ब्रिटेन के शाही परिवार पर चोट की थी.

मारग्रेट थैचर
मारग्रेट थैचर एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए उस होटेल में ठहरी हुई थीं. हमले में वो तो बच गईं, लेकिन पांच लोगों की जान गई.

और जब IRA ने ब्रिटिश PM को मारने की कोशिश की
ऐसी ही एक और सनसीखेज घटना हुई. IRA ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर को मारने की सजिश की. 12 अक्टूबर, 1984 . इस दिन IRA के एक धड़े ने दक्षिण इंग्लैंड के शहर ब्राइटन में एक होटेल के अंदर बम फोड़ा. इसी होटेल में थैचर अपनी पूरी कैबिनेट के साथ ठहरी थीं. वहां एक सम्मेलन होना था. थैचर तो बाल-बाल बच गईं, लेकिन ब्रिटिश सांसद समेत 5 लोगों की मौत हो गई.

1998 का गुड फ्राइडे शांति समझौता
लंबे समय तक चले खून-खराबे से दोनों पक्षों को घाव मिला था. दोनों ही थक गए थे. इसी थकान का नतीजा था कि नब्बे के दशक में दोनों पक्ष बातचीत के लिए राजी हो गए. शांति वार्ताओं का दौर चला. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, जो खुद को एक आयरिश अमेरिकन मानते हैं, ने भी दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की काफी कोशिश की. इसी बीच 1998 का अप्रैल आया. ब्रितानी और आयरिश सरकारों ने उत्तरी आयरलैंड की राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर ऐतिहासिक ‘गुड फ्राइडे’ समझौते पर दस्तखत किए. इसके बाद हिंसा थमी. समझौते की एक शर्त के मुताबिक, कनाडा के एक जनरल जॉन दे चास्तेलाइन ने IRA के हथियार ले लिए. ताकि उन्हें निशस्त्र किया जा सके. ये प्रक्रिया एक दिन में नहीं खत्म हुई. 2005 में पूरी हुई. चीजें काफी बेहतर हुईं, मगर बिल्कुल ठीक नहीं हुईं. रियल IRA और कुछ पैरामिलिटरी ग्रुप अभी भी सक्रिय हैं. वो हिंसा करते रहते हैं. छिटपुट घटनाएं अक्सर सुनाई देती रहती हैं. खास तौर पर जुलाई के महीने में. जब ऑरेंज मार्चिंग का समय होता है. तब ये संगठन ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं.

1998 में
1998 में हुआ ‘गुड फ्राइडे’ समझौता बहुत बड़ी कामयाबी थी. न केवल ब्रिटिश सरकार के लिए, बल्कि आयरलैंड के लोगों के लिए भी. खून-खराबे ने बरसों तक उनका नुकसान किया. इस हिस्से की जितनी तरक्की हो सकती थी, उतनी नहीं हुई.

कुछ ऐसे नाम, जिन्हें हमेशा याद रखा जाना चाहिए
इतिहास में जब भी कोई तारीख दर्ज होती है, तो उसको याद रखने की, उसका जिक्र करने की एक वजह होती है. उसके साथ कुछ नाम जुड़े होते हैं. इस ‘गुड फ्राइडे’ समझौते से जुड़े कुछ किरदार ऐसे हैं, जिनकी बात किए बिना ये जिक्र अधूरा रह जाएगा.

मो मोलम
गुड फ्राइडे अग्रीमेंट में मो मोलम का बड़ा हाथ रहा. उत्तरी आयरलैंड की सेक्रटरी ऑफ स्टेट रहते हुए उन्होंने वहां इस समझौते की पक्ष में स्थितियां बनाने में काफी मेहनत की. बहुत इज्जत होती थी उनकी.

1. इस लिस्ट में सबसे बड़ा नाम है, मो मोलम का. मई 1997 से अक्टूबर 1999. इस दौरान मोलम उत्तरी आयरलैंड की सेक्रटरी ऑफ स्टेट रहीं. वो टोनी ब्लेयर सरकार की नुमाइंदगी कर रही थीं. सेक्रटरी ऑफ स्टेट का पद समझिए कि हमारे यहां के राज्यपाल की तरह होता है. इस पद पर रहते हुए मोलम ने बेहतरीन काम किया. ऐसा माहौल बनाया, जिसने जनता को हिंसा से आगे बढ़कर शांति के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया. हॉलिवुड में उनके ऊपर एक ‘मो’ नाम की फिल्म भी बनी. बहुत देखी गई ये फिल्म. एक बार टोनी ब्लेयर लेबर पार्टी की कॉफ्रेंस में भाषण दे रहे थे. उन्होंने मोलम का जिक्र करते हुए कहा था-

ऐसा पहली बार हुआ है की किसी नेता की स्पीच के दौरान उससे ज्यादा तालियां दूसरी नेता के लिए बज रही हैं. और वो दर्शकों के बीच बैठी है.

इयान पैस्ली यूनियनिस्ट पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी शख्सियतों में से थे. नॉदर्न आयरलैंड के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते हैं वो. कट्टर कैथलिक विरोधी नेता थे वो. एक बार उन्होंने पोप के सामने कह दिया था. कि तुम ईसा मसीह के दुश्मन हो. 
इयान पैस्ली यूनियनिस्ट पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी शख्सियतों में से थे. नॉदर्न आयरलैंड के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते हैं वो. कट्टर कैथलिक विरोधी नेता थे वो. एक बार उन्होंने पोप के सामने कह दिया था. कि तुम ईसा मसीह के दुश्मन हो.

2. इस लिस्ट का दूसरा नाम है ईयन पैस्ली. पैस्ली की बड़ी तूती बोलती थी स्थानीय राजनीति में. पैस्ली का परिवार बड़ा धार्मिक था. उनके पिता एक पादरी थे. पचीस साल की उम्र में वे प्रोटेस्टेंट इवैंजेलिकल पादरी बने. इसके बाद अगले 57 सालों तक वो इस चर्च के निर्विविवाद धार्मिक लीडर बने रहे. साल 1959 में वो यूनियननिस्ट राजनीति में घुसे. अगले छह दशकों तक पूरी प्रोटेस्टेंट यूनियननिस्ट राजनीति उनकी छत्रछाया में ही चली. उत्तरी आयरलैंड की राजनीति में धर्म और राजनीति, दोनों घुले-मिले हैं. इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है. ईयन पैस्ली के राजनीतिक करियर में भी आपको ये चीज दिखेगी. उनकी छवि एक फायर ब्रैंड कैथलिक विरोधी नेता की रही. ऐसा नेता, जो हर समझौते की मेज पर हाथ ठोककर कहता रहा- नेवर. यानी कभी नहीं. कभी भी नहीं.

एक बार यूरोपियन संसद में पोप जॉन पॉल द्वितीय के भाषण के दौरान उन्होंने चिल्लाते हुए कहा था

मैं ऐलान करता हूं. तुम ईसा मसीह के दुश्मन हो. 

पोप का विरोध वह धुरी थी, जिस पर वो पूरे प्रोटेस्टेंट समुदाय को जमा कर सकते थे. जितना प्रोटेस्टेंट यूनियननिस्ट उनका सम्मान करते थे, कैथलिक रिपब्लिकन उनसे उतनी ही नफरत करते थे. अपने समुदाय पर इनकी सियासी पकड़ जबरदस्त थी. तभी कहते हैं कि ये अकेले इंसान थे, जो पूरे शांति समझौते को एक झटके में खत्म कर सकते थे. ये उनकी सूझ-बूझ ही कही जाएगी कि उन्होंने मौके की जरूरत को समझा. विरोध की वजह से गुड फ्राइडे समझौते पर दस्तखत तो नहीं किए , पर उसमें रोड़ा भी नहीं अटकाया. बाद में अपने धुर-विरोधी रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिली-जुली सरकार बनाई और प्रांत के मुखिया बने. 2014 में 88 साल की उम्र में वो गुजर गए.

मॉर्टिन और पैस्ली धुर विरोधी थे. जीवन भर के राजनैतिक विरोध के बाद मॉर्टिन और पैस्ली की गाढ़ी दोस्ती हुई. इनकी अक्सर तस्वीरें आती थीं. साथ ठहाके लगाते हुए. 
मॉर्टिन और पैस्ली धुर विरोधी थे. जीवन भर के राजनैतिक विरोध के बाद मॉर्टिन और पैस्ली की गाढ़ी दोस्ती हुई. इनकी अक्सर तस्वीरें आती थीं. साथ ठहाके लगाते हुए.

3. रिपब्लिकन की पूरी लीडरशिप ही IRA से निकलकर आई थी. इनमें एक थे मॉर्टिन मैक्गिव्निस. ये अपने शुरुआती दिनों में हथियारबंद छापामार लड़ाके थे. उनकी छापामार शैली का ऐसा खौफ था कि उनके नाम से ब्रिटिश आर्मी के जवान डरते थे. 1970 के दशक में वे रिपब्लिकन राजनीतिक पार्टी ‘सिन फेन’ में शामिल होकर इसके मुख्य नेता बनकर उभरे. ‘सिन फेन’ एक गेलिक भाषा का शब्द है. इसका मतलब होता है- हम अकेले. गेलिक आयरलैंड की प्राचीन भाषा है. इसमें संस्कृत का भी थोड़ा असर दिखेगा आपको. जैसे अंग्रेज भारत में अंग्रेजी लेकर आए, वैसे ही आयरलैंड में भी वो ही अंग्रेजी लेकर गए. मॉर्टिन सिन फेन पार्टी के शीर्ष तक पहुंचे. गुड फ्राइडे समझौते की मेज पर वो रिपब्लिकन की तरफ से मुख्य वार्ताकार रहे. सरकार बनने पर वह उप मुख्यमंत्री बने. लगभग दस साल तक वो इस पद पर बने रहे. उनकी अपने धुर विरोधी ईयन पैस्ली के साथ कुछ ऐसी जमी कि दोनों हमेशा हंसते दिखते थे. यहां तक कि स्थानीय प्रेस उन्हें ‘ठहाका मित्र’ कहकर बुलाता था. जिंदगी भर के राजनीतिक विरोध के बाद भी उन दोनों को एक-दूसरे के साथ इतना सहज देखना कइयों को भाया नहीं. मगर ये बदलते उत्तरी आयरलैंड की एक खूबसूरत तस्वीर थी. दुनिया भर के अमन पसंद लोगों ने इसे सराहा.

ये गुड फ्राइडे अग्रीमेंट
ये गुड फ्राइडे अग्रीमेंट की 20वीं सालगिरह की तस्वीर है. बेलफास्ट में हुए खास प्रोग्राम में शरीक होने के लिए बिल क्लिंटन और टोनी ब्लेयर को भी बुलाया गया. क्लिंटन अमेरिकी हैं. मगर उनका मूल आयरिश ही है. उनका परिवार आयरलैंड से अमेरिका गया और वहां जाकर बस गया. इस नाते भी क्लिंटन ने ये मसला सुलझाने, सुलह कराने में काफी जोर लगाया.

इस समझौते से जुड़े दो लोकल नेताओं- जॉन हुम और डेविड ट्रिंबल को 1998 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया. अभी पिछले दिनों गुड फ्राइडे शांति समझौते की २०वीं सालगिरह बेलफास्ट में मनाई गई. इसमें क्लिंटन, टोनी ब्लेयर और बहुत सारे गणमान्य लोग शामिल हुए.

आज का उत्तरी आयरलैंड
गुड़ फ्राइडे समझौते के बाद हिंसा का दौर थमा. यूरोपियन यूनियन, अमेरिका और ब्रिटेन का निवेश काम आया. बहुतेरे नए काम-काज के रास्ते खुले. आज का बेलफास्ट, जो कि उत्तरी आयरलैंड की राजधानी है, किसी भी यूरोपियन देश की राजधानी जैसा ही दिखता है. चमचमाती कारें, ऊंची इमारतें, होटल, रेस्तरां, शॉपिंग मॉल. यहां सब कुछ मिलेगा. बेलफास्ट का सबसे बड़ा पर्यटन आकर्षण हैं- टाइटैनिक म्यूजियम. वो जो मशहूर टाइटैनिक जहाज था, वो बेलफ़ास्ट में ही बनाया गया था. बहुत कम लोगों को पता है कि हरलैंड ऐंड वुल्फ नाम की जिस कंपनी ने टाइटैनिक जहाज बनाया था, उसने ही तब ओलिंपिक नाम का जहाज भी बनाया था. 1912 में टाइटैनिक का इंग्लैंड के साउथ हैम्पटन से न्यू यॉर्क का फर्स्ट क्लास टिकट आज के 65 लाख रुपये के बराबर था. जहाज डूबने के बहुत दिनों बाद तक बेलफास्ट में लोग इतने शर्मिंदा थे कि उसका नाम भी नहीं लेते थे. ऐसा इसलिए कि बेलफास्ट में उस वक्त सबसे बड़ा उद्योग जहाज बनाने का ही था. उन्हें अपने यहां बनाए जहाजों पर बहुत गर्व था.

शहर की दीवारों पर अब भी उस दौर की ग्रैफिटी बनी दिखती है.
शहर की दीवारों पर अब भी उस दौर की ग्रैफिटी बनी दिखती है. अब भी कैथलिक और प्रोटेस्टेंट अलग-अलग मुहल्लों में रहते हैं. अब भी उनके बच्चे अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं. समझौता जरूर हो गया, लेकिन बंटवारा अब भी ज्यों का त्यों बना हुआ है.

समझौता हुआ, मगर बंटवारा अब भी है
वो लकीर जिसने 1920 में आयरलैंड के अंदर दिलों का बंटवारा किया, वो अब भी यहां देखी जा सकती है. सतह पर सब सामान्य है, पर थोड़ा खुरचो तो अंतर दिखने लगता है. कैथलिक और प्रोटेस्टेंट बच्चों के स्कूल अभी भी अलग हैं. रहने के मुहल्ले भी अलग ही हैं. चर्च भी अलग हैं. उत्तरी आयरलैंड के भविष्य को लेकर उनका सपना भी अलग है. पुराने दौर की याद के तौर पर आज भी यहां आपको कई निशानियां मिल जाएंगी. धमकी और नफरत में डूबी तस्वीरें दीवारों पर पड़ी हैं. पसरी हैं. जुलाई में ये टेंशन अपने चरम पर होती है. तब, जब ऑरेंज ऑर्डर के लोग अपना सालाना मार्च निकालते हैं.

ये 1969 में हुए दंगे
ये 1969 में हुए दंगे की याद में बनी ग्रैफिटी है. इसमें देखिए. आस-पास हिंसा के निशान दिखाई देंगे. ये कहानियां लोग पीढ़ियों तक गुनते रहते हैं. और ऐसी ही यादें बंटवारा बनाए रखती हैं. एका नहीं होने देतीं.

ब्रेग्जिट की वजह से फिर दांव पर है शांति-सुकून
शांति समझौते की राह में हाल फिलहाल सबसे बड़ा कांटा ‘ब्रेग्जिट’ है. ब्रेग्जिट, यानी ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से एक्जिट. इसके बाद ब्रिटेन EU से अलग हो जाएगा. ब्रेक्जिट के कारण उत्तरी आयरलैंड और रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के बीच एक बॉर्डर बनाना पड़ सकता है. कैथलिक इसको कतई मंजूर नहीं करेंगे. क्योंकि इससे यूनाइटेड आयरलैंड का उनका सपना टूट जाएगा. वहीं बिना बॉर्डर खींचे ब्रिटेन का ब्रेक्जिट भी पूरा नहीं होता. फिलहाल ये एक ऐसी समस्या है, जिसकी वजह से 10 डाउनिंग स्ट्रीट (ब्रिटिश प्रधानमंत्री का निवास) और ब्रसेल्स (जहां यूरोपियन यूनियन का हेड ऑफिस है), दोनों परेशान हैं. संयोग से आयरलैंड के टीशक लियो वराडकर भारतीय मूल के हैं. गोलिक भाषा में प्रधानमंत्री के लिए टीशक शब्द इस्तेमाल होता है. शायद उनके भारतीय डॉक्टर पिता ने उन्हें कश्मीर के बारे में कुछ बताया हो. वो आयरलैंड के इतिहास में सबसे कम उम्र के टीशक हैं. उत्तरी आयरलैंड को इस संकट से निकालने का कुछ दारोमदार उनके कंधों पर भी है.

ये दीवार पर लिख गया है कोई.
ये दीवार पर लिख गया है कोई. कि जंग अभी बाकी है. IRA के कुछ धड़े अब भी सक्रिय हैं. समय-समय पर छिटपुट हिंसा करते रहते हैं.

कितना कुछ है, जो हमारे कश्मीर जैसा है
अब आपको पता चला कि मैंने इसे यूरोप का कश्मीर क्यों कहा. कश्मीर की तरह ही यहां बंटवारे की राजनीति हैं. कश्मीर की ही तरह यहां धर्म का बंटवारा है. कश्मीर की ही तरह यहां भी सियासी दिक्कत का समाधान मांगते-मांगते लोग हिंसा की तरफ मुड़ गए. खूब हिंसा हुई. एक तरफ सरकार और दूसरी तरफ हिंसक गुट. ये जगह अपने फ्लेवर में भी एकदम कश्मीर जैसी है. आंखों के लिए इतनी खूबसूरत. लेकिन फिर भी चप्पे-चप्पे पर हिंसा पसरी हुई. फिलहाल ब्रेग्जिट पर ब्रिटेन और EU के बीच बातचीत चल रही है. अलग होने के बाद की चीजें, पूरा सिस्टम तय किया जा रहा है. जैसे-जैसे अलगाव की तारीख पास आती जाएगी, आयरलैंड पर लोगों की नजर जमने लगेगी. फिलहाल ये जगह शांत है. मगर आने वाला वक्त ही बताएगा कि यूरोप के इस कश्मीर में शांति कब तक ठहरेगी.

समकालीन फिल्म और मीडिया
पश्चिमी यूरोप के करीब होने की वजह से आयरलैंड का ये मुद्दा लाइमलाइट में रहा. फिल्मों में, टीवी पर, अख़बारों और किताबों में इसे खूब जगह मिली. 1992 में एक फिल्म आई थी. इन द नेम ऑफ द फादर. ये एक सच्ची घटना पर बनी है. ये उन आयरिश नौजवानों की कहानी है, जिन्हें गलत तरीके से इंग्लैंड की एक शहर में बम धमाके का दोषी करार दिया जाता है. इन नौजवानों को छुड़ाने के लिए बहुत सालों तक आंदोलन हुआ. अच्छा ये हुआ कि इतनी कोशिशों के बाद ये रिहा कर दिए गए. इस फिल्म को बहुत पुरस्कार मिले.

टाइटैनिक भी यहां बेलफास्ट
टाइटैनिक भी यहां बेलफास्ट में ही बना था. अपने वक्त का सबसे महंगा, सबसे तेज और सबसे सुरक्षित पानी का जहाज कहकर प्रचारित किया गया था टाइटैनिक को. लेकिन वो अपने पहले ही सफर में डूब गया.

एक और फिल्म है. ’71. यही नाम है उसका. ये एक ब्रिटिश जवान की कहानी है. बेलफास्ट में भयानक दंगे हो रहे होते हैं. इसी बीच ये जवान अपनी यूनिट से बिछड़ जाता है. उसके लिए ये पहचानना मुश्किल हो जाता है कि किसे दोस्त माने, किसे दुश्मन समझे. ये तय करने में उसे बड़ी मुश्किल होती है. एक और फिल्म है. द विंड दैट शेक्स द बार्ली. ये फिल्म 2006 में आई थी. ये कहानी है दो ऐसे भाइयों की, जो ब्रिटेन से लड़ने के लिए IRA में शामिल हो जाते हैं. इस फिल्म का टाइटल गाना बहुत पॉपुलर हुआ था.

आयरलैंड के इस संघर्ष पर कई किताबें भी लिखी गई हैं. एक का नाम याद आ रहा है मुझे. लॉस्ट लाइव्स. इसे पांच लेखकों ने मिलकर लिखा है. डेविड मस्कीटरीक, सीमस केल्टर्स, ब्रायन फेने, क्रिस थॉर्नटॉन और डेविड मैकवी. बहुत डिटेल्ड किताब है ये.

एक और किताब है. बैंडिट कंट्री: द IRA ऐंड साउथ अर्माघ. इसको लिखा है टोनी हर्नडेन ने. बहुत मेहनत से लिखी गई किताब है. जानकारी चाहिए हो कि और शोध करना हो, ये किताब बड़ी मददगार होगी.


अभिषेक त्रिपाठी आयरलैंड के बेलफास्ट में रहते हैं. उन्होंने हमें ये आर्टिकल लिखकर भेजा है.
अभिषेक त्रिपाठी आयरलैंड के बेलफास्ट में रहते हैं. उन्होंने हमें ये आर्टिकल लिखकर भेजा है.

‘द लल्लनटॉप’ के लिए ये आर्टिकल लिखकर भेजा है अभिषेक त्रिपाठी ने. अभिषेक उत्तरी आयरलैंड के बेलफास्ट में रहते हैं. 1998 में हुए ‘गुड फ्राइडे समझौते’ के बाद से ही अभिषेक बेलफास्ट में हैं. उत्तरी आयरलैंड की सियासत, यहां की सोसायटी, उसकी दिक्कतों को करीब से देखते हैं. जीते हैं. गुड फ्राइडे एग्रीमेंट से जुड़े सारे अहम किरदारों को उन्होंने देखा-सुना है. इस समझौते के बाद खूब सारे हिंदुस्तानी भी आए उत्तरी आयरलैंड. आयरलैंड के अंदर सबसे ज्यादा विदेशी मूल के लोग चीन के हैं. दूसरा नंबर अभिषेक जैसे हिंदुस्तानियों का है.


अगर आप भारतीय हैं, विदेश में रहते हैं, तो आप भी हमारे लिए लिख सकते हैं. हम एक नई सीरीज शुरू करने जा रहे हैं. इसका नाम होगा NRI सीरीज. आप जहां भी, जिस भी देश में रहते हैं, वहां के अपने अनुभव हमें लिखकर भेज सकते हैं. या फिर उस जगह की किसी खासियत के बारे में हमारे पाठकों को बता सकते हैं. सिसायत, सिनेमा, खेल, संगीत, साहित्य, टॉपिक आपकी पसंद का. आर्टिकल भेजने का पता है lallantopmail@gmail.com


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