रोज यहां सैकड़ों लोग आते हैं. वीकेंड में तो चापोचाप भीड़ उमड़ती है. सिर्फ भगवान भरोसे नहीं. जावेद भरोसे भी. ताइक्वॉन्डो और किक बॉक्सिंग चैंपियन जावेद 8 डिग्री ब्लैक बेल्ट हासिल किए हैं. अब ये डिग्री कितनी होती है इसके बारे में मार्शल आर्ट का जानकार बताएगा. हां जावेद खान के बारे में तमाम जानकारी यहां मिल जाएगी.

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कैसे पहुंचे मंदिर
तो भैया जावेद 1986 से अमेरिका आने लगे. मार्शल आर्ट का शौक था अंदर. उसी के कॉम्पटीशन के सिलसिले में. सन 2000 में अमेरिका में टिक गए. 2001 में फुल्ली सेटल हुए इंडियाना में.जावेद इसके बारे में तफसील से बताते हैं. कि ये सब शुरू हुआ उनकी बेटी की शादी से. शादी इसी मंदिर में हुई कुछ साल पहले. एक तेलुगू लड़के से अपनी बेटी की शादी की. फिर वो मंदिर में आने जाने लगे. लोगों से जान पहचान बढ़ने लगी. फिर उनको महसूस हुआ कि इस जगह को अच्छी सिक्योरिटी की जरूरत है. खुद जिम्मेदारी लेने का ऑफर दिया, और लग गए.
मंदिर में सबसे खास जिम्मेदारी उठाकर क्या सोचते हैं जावेद
"देखो भैया हम सब एक हैं, एक ईश्वर की औलाद. बस उसके नाम अलग हैं. और इबादत का तरीका सबने अलग चुना है. हम इंडियन हैं. मेरी आधी फैमिली हिंदू है. हमको हिंदू-मुस्लिम से कोई मतलब नहीं. मैं अपनी ड्यूटी करता हूं. इसमें कुछ खास या असाधारण नहीं है. जब भी मैं मंदिर में होता हूं, मुझे लगता ही नहीं कि अमेरिका में हूं. ऐसा लगता है अपने घर में हूं, इंडिया में."अब सुनो क्या कहते हैं मंदिर के ट्रस्टी और विजिटर्स
रवि पत्तर मंदिर में ट्रस्टी बोर्ड के चेयरमैन हैं. कहते हैं कि वो हमको वीकेंड्स और खास दिनों पर सिक्योरिटी देते हैं. जैसी चाहिए. पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ इनको एपॉइंट किया गया है.डॉक्टर मोहन राजदान ने बड़ा रोल निभाया, इस मंदिर के कॉन्सट्रक्शन में. वो बताते हैं कि "आज के वक्त में कोई मुसलमान मंदिर की सिक्योरिटी में लगा है. ये सुनकर बहुत अच्छा लगता है. बड़ा स्ट्रॉंग मैसेज जाता है इससे. उनको मंदिर में हर कोई जानता है और उनकी इज्जत करता है."

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और सुनो, जावेद मार्शल आर्ट, ताइक्वॉन्डो की ट्रेनिंग भी देते हैं. क्लास चलती हैं इनकी. सेल्फ डिफेंस के लिए सिखाते हैं. वेबसाइट भी है javed-khan.com के नाम से. और हां, फार्म भरवाने के पहले ये नहीं पूछते कि मुस्लिम हो, हिंदू, सिख कि क्रिस्चियन.























