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6 लोगों को फांसी की सज़ा मिली, 16 साल जेल में रहे, अब सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया

पुलिस को एक जुर्म की सजा दिलानी थी लेकिन खुद पुलिस ने जुर्म कर दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने अपना 10 साल पुराना फैसला पलटा है. जो गड़बड़ी निचले कोर्ट नहीं पकड़ पाए वो सुप्रीम कोर्ट ने पकड़ ली.
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने 5 मार्च, 2019 को 10 साल पहले दिया अपना फैसला पलट दिया. फैसले पलटते रहते हैं लेकिन ये फैसला खास है. क्योंकि, इस फैसले से मौत के मुहाने पर खड़े 6 लोगों को वापस जिंदगी मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में महाराष्ट्र के जालान जिले के बोखरधन में हुए हत्याकांड और गैंगरेप केस में अपना दिया फैसला पलट दिया. फांसी की सज़ा पा चुके 6 आरोपियों को बरी कर दिया गया. लेकिन इन बेकसूरों को न्याय के इंतज़ार में 16 साल सलाखों के पीछे काटने पड़े. ये सब घुमंतू समुदाय से हैं. नाम हैं- अंकुश मारुति शिंदे, राज्य अप्पा शिंदे, अंबादास शिंदे, राजू महासू शिंदे, बापू अप्पा शिंदे और सुरेश शिंदे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फैसले में पुलिस महकमे की भारी मज़म्मत की है. साथ ही, बरी हुए सभी 6 लोगों को 5-5 लाख का मुआवजा देने का आदेश महाराष्ट्र सरकार को दिया है.
क्या था पूरा मामला करीब 16 साल पहले, 5 जून, 2003 की रात. समय, करीब 10 बजे. महाराष्ट्र के बोखरधन कस्बे में एक परिवार के 5 लोगों की हत्या हुई और 1 महिला का गैंगरेप हुआ. पुलिस ने मामले की जांच की. 6 लोगों की गिरफ्तारी हुई. सभी आरोपी घुमंतू समुदाय से हैं. 2003 में नासिक की जिला अदालत में केस चला. तीन साल तक चली सुनवाई के बाद जून 2006 में सभी 6 आरोपियों को मौत की सजा दी गई.लोअर कोर्ट ने ये सजा दी थी इसलिए आरोपियों की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की गई. 2009 तक हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. फैसला आया और आरोपियों को कुछ राहत मिली. 6 में तीन आरोपियों की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया गया. लेकिन 3 आरोपियों की फांसी की सजा को बरकरार रखा गया.
बंबे हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल, 2009 को तीन आरोपियों की सज़ा फांसी से बदलकर उम्रकैद कर दी थी. जिसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल, 2009 को तीन आरोपियों की सज़ा फांसी से बदलकर उम्रकैद कर दी थी. जिसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची.

एक कानूनी प्रक्रिया होती है. उसमें राज्य सरकार ज्यादातर मामलों में अधिकतम सजा मांगती है, फैसला खिलाफ गया तो उससे बड़ी अदालत में जाती है. महाराष्ट्र सरकार ने भी ऐसा ही किया. तीन आरोपियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने के खिलाफ 2009 में महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सभी 6 के 6 दोषी भी राहत की उम्मीद लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच बनी. जस्टिस अरिजीत पसायत और जस्टिस मुकुंदकम शर्मा की. दोनों ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया. इस बेंच ने अपराध को दुर्दांत और अमानवीय बताया. 30 अप्रैल, 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया. 3 आरोपियों की मौत की सजा बरकरार रखी गई. बाकी के जो 3 दोषी राहत की उम्मीद लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे उनके साथ खेल हो गया. अपील तीनों के लिए शाप साबित हुई जिन्हें हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी थी. इन तीनों की उम्रकैद को सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा में बदल दिया. मतलब सेशंस कोर्ट की ही तरह सुप्रीम कोर्ट ने भी सभी 6 दोषियों को फांसी की सजा दे दी.
जस्टिस
(बाएं से)जस्टिस मुकुंदम शर्मा और जस्टिस अरिजीत पसायत , ने फांसी की सजा को बरकरार रखा . 3 दोषियों की उम्रकैद की सज़ा को भी फांसी में बदल दिया

इसके बाद दोषियों के पास रिव्यू पिटीशन का विकल्प था. रिव्यू  पिटीशन मतलब कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए उसी कोर्ट से दोबारा अपील करना. सो इनकी ओर से रिव्यू पिटीशन फाइल की गई. लेकिन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू पिटीशन को खारिज कर दिया.
2014 में तीन दोषियों (जिनकी उम्रकैद को फांसी में बदल दिया गया था) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा फिर खटखटाया. उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने उनका पक्ष एक बार भी नहीं सुना. इसलिए उन्हें सुना जाए. उनकी मांग सुप्रीम कोर्ट को कबूल थी. 2014 में दोबारा मामले की सुनवाई शुरू हुई. फांसी कुछ दिनों के लिए टल गई. सुप्रीम कोर्ट में ये मामला अक्टूबर, 2018 तक चला. दूसरी ओर बाकी दोषियों ने भी 2016 में रिव्यू पिटीशन को दोबारा खोलने की अर्ज़ी दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट ने अर्ज़ी मंजूर कर ली. अक्टूबर 2018 में तीन जजों की बेंच ने 2009 के आदेश पर रोक लगा दी. आरोपियों के लिए ये बड़ी राहत थी. 2019 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच बदल गई. लेकिन फैसला नहीं अटका. नई बेंच में तीन जज थे. जस्टिस अर्जन सीकरी, जस्टिस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस एम.आर. शाह. तीनों ने एकमत से आरोपियों को बरी करने का फैसला दिया.
(बांए से) जस्टिस ए.के.सीकरी, जस्टिस एम.आर.शाह, जस्टिस एस.अब्दुल नज़ीर ने 10 साल पुराना फैसला पलट दिया. ये रियर जजमेंट है जब फांसी जैसी सजा के अपने ही फैसले को पलटकर सुप्रीम कोर्ट आरोपियों को बरी कर दे.
(बांए से) जस्टिस ए.के.सीकरी, जस्टिस एम.आर.शाह और जस्टिस एस.अब्दुल नज़ीर ने 10 साल पुराना फैसला पलट दिया. ये रेअर जजमेंट है, जिसमें फांसी जैसी सजा के अपने ही फैसले को पलटकर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया.

क्या कहा जजमेंट में तीनों जजों की ओर से ये जजमेंट जस्टिस एम.आर. शाह ने लिखा. उन्होंने लिखा कि
मौजूदा फैसले को बदलने से पहले हम जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष के तौर-तरीके की कड़ी आलोचना करते हैं. इस मामले की जांच स्पष्टता और ईमानदारी से नहीं की गई. आरोपी घुमंतू समुदाय से आते हैं और इन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है. इसी वजह से एक आरोपी, जो उस समय नाबालिग था, उसे छोड़कर सभी को 16 साल जेल काटनी पड़ी.
सुप्रीम कोर्ट इस केस की जांच कर रहे जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. इन आदेशों को अमल में लाने के लिए महाराष्ट्र सरकार को तीन महीने का समय दिया गया है. महाराष्ट्र के चीफ सेक्रेटरी को इसे अमल में लाने का निर्देश दिया गया है.
कैसे पकड़ में आया मामला? इस वारदात में मारे गए त्रांबक सतोते घर के मुखिया थे. हत्याकांड में त्रांबक के अलावा उनकी एक बेटी, 2 बेटों और एक भतीजे की हत्या हुई थी. पत्नी और आखिरी बचे बेटे को भी मारने की कोशिश हुई थी. जो किसी तरह बच गए थे. हत्याकांड के दो दिन बाद त्रांबक की पत्नी ने जिला मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया था. मामला यहीं से पकड़ में आया. त्रांबक की पत्नी ने पुलिस के पास मौजूद आदतन अपराधियों की एलबम से चार अपराधियों को पहचाना था. लेकिन पुलिस ने उन अपराधियों को नहीं पकड़ा. न ही उस ओर जांच की. पुलिस ने मामला निपटाने के लिए घुमंतू समुदाय के एक नाबालिग समेत कुल 6 लोगों को पकड़ लिया. कोर्ट का कहना है कि "इसी वजह से असली दोषी कानून के शिकंजे से बच निकले. पकडे गए 6 लोग उन चार लोगों से अलग हैं. इसलिए CrPC के सेक्शन 173(8) के तहत इस मामले में जांच हो सकती है."
हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में वरिष्ठ वकील कोलिन गोन्ज़ालविज ने कहा कि-
ये रिहाई दुर्लभ है. आमतौर पर फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया जाता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में कई कोर्ट्स में हुई गलतियों को पकड़ा और खुद ठीक कर दिया. ये क्रिमिनल केसों में एक जानलेवा दोष की निशानी है.'
कोलिन गोंज़ाल्विज़ सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं. क्रिमिनल लॉ के बड़े जानकार माने जाते हैं
कोलिन गोंज़ाल्विज़ सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं. क्रिमिनल लॉ के बड़े जानकार माने जाते हैं.

ये 6 लोग 16 साल बाद आजाद हो गए. इनकी जान बच गई. लेकिन त्रांबक के परिवार को न्याय देने की राह में एक और जुर्म हो गया. 16 साल बाद अब एक की जगह दो जुर्म हैं. और न्याय सिफर.


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