महिला और बाल विकास मंत्रालय ने समाचार एजेंसी PTI द्वारा दायर की गयी RTI के जवाब में ये आंकड़े जारी किये हैं. ख़बरों के मुताबिक़, भारत में साल 2020 के मुक़ाबले इन कुपोषित बच्चों की इन संख्या में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. आइए जानते हैं कि कुपोषण का क्या पैमाना है? आंकड़े कैसे इकट्ठा किए जाते हैं? और कुपोषित बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी की क्या वजहें हैं?
लेकिन सबसे पहले जानिए कि सरकार ने क्या कहा है? "कोरोना महामारी से हालात और गंभीर" महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने चिंता जताते हुए कहा है कि कोविड महामारी की वजह से बेहद गरीब तबके के लोगों की तकलीफ़ें और बढ़ सकती हैं, ख़ासकर स्वास्थ्य और पोषण संकट और बढ़ सकता है. मंत्रालय के मुताबिक़ बच्चों के कुपोषण का आंकड़ा कुछ इस प्रकार है :
गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे : 17 लाख 76 हज़ार 902 कम गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे : 15 लाख 46 हज़ार 420
कुल जोड़ : 33 लाख 23 हज़ार 322
ये आंकड़े 14 अक्टूबर 2021 तक के हैं. पोषण ऐप के ज़रिए डेटा जुटाया गया बीते साल यानी कि नवंबर 2020 में भारत सरकार ने कुपोषण के आंकड़े जारी किए थे. इन आंकड़ों के मुताबिक़, नवंबर 2020 तक भारत में कुल 9 लाख 27 हज़ार 606 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित थे.
ताज़ा आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो, इस श्रेणी में 91 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.
अब सवाल आता है कि बढ़ोतरी की क्या वजह है? RTI में चिंता जताते हुए मंत्रालय ने तो कहा है कि कोरोनावायरस से ये वृद्धि हुई है. इसके अलावा भी एक वजह है. वो है आंकड़े जुटाने का तरीक़ा. पहले राज्य जुटाते थे, अब सीधे केंद्र जब नवंबर 2020 में जब कुपोषण के आंकड़े जुटाए गए थे, तब राज्य सरकारों ने अपने-अपने ज़िलों के आंकड़े जुटाकर केंद्र सरकार को भेजा था. लेकिन ये व्यवस्था बदल गयी. फ़िलहाल जारी किए गए आंकड़े सीधा केंद्र सरकार ने जुटाए हैं. कैसे? केंद्र सरकार ने पोषण की स्थिति की लगातार निगरानी के लिए इस ऐप को पिछले साल लागू किया था. और आंगनवाड़ीकर्मियों के नंबर दर्ज किए गए थे. इस साल आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने "पोषण ट्रैकर मोबाइल ऐप्लिकेशन" में ये आंकड़े फ़ीड किए.
कुपोषण तय करने का पैमाना विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी कि WHO ने कुपोषण का पैमाना तय किया है. WHO के मुताबिक़ गंभीर रूप से कुपोषित ऐसे बच्चे होते हैं जिनका वजन और ऊंचाई बहुत ही कम होती है या उनकी बाहों की मोटाई 115 मिली मीटर से कम होती है.
वहीं, मीडियम अक्यूट कुपोषित बच्चों की बाजुओं की मोटाई 115 मिमी से ज़्यादा या 125 मिमी से कम हो. इस आधार पर दुनिया के अलग-अलग देश आंकड़े जुटाते हैं. WHO के मुताबिक़, कुपोषित बच्चों को बीमारियों का ख़तरा काफ़ी ज़्यादा होता है. इसके अलावा गंभीर रूप से पीड़ित बच्चों का लम्बाई के अनुपात वजन काफ़ी कम होता है, उनके बीमारियों से मौत होने की संभावना स्वस्थ बच्चों के मुक़ाबले 9 गुना ज़्यादा होती है. लिहाज़ा ऐसे बच्चों की बचपन में मौत होने का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है.

मिड डे मील खाते बच्चों की प्रतीकात्मक तस्वीर. (फ़ोटो-आजतक)
महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात की स्थिति नाज़ुक पोषण ट्रैकर के हवाले से RTI में बताया गया है कि महाराष्ट्र में कुपोषित बच्चों की तादाद सबसे ज़्यादा हैं. यहां 6 लाख 16 हज़ार 772 बच्चे कुपोषित हैं. इन बच्चों में से 4 लाख 58 हज़ार 788 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं.
इसके बाद नंबर आता है बिहार का. यहां 4 लाख 75 हज़ार 824 कुपोषित बच्चे हैं. इनमें से 1 लाख 52 हज़ार 083 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं. वहीं, तीसरे नंबर पर गुजरात है. गुजरात में कुल 3 लाख 20 हज़ार 465 कुपोषित बच्चे हैं. इनमें से 1 लाख 65 हज़ार 364 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं.
# महाराष्ट्र - 6 लाख 16 हज़ार 772 कुपोषित बच्चे. # बिहार - 4 लाख 75 हज़ार 824 कुपोषित बच्चे. # गुजरात - 3 लाख 20 हज़ार 465 कुपोषित बच्चे.
बाक़ी राज्यों की अगर बात करें तो आंध्र प्रदेश में कुल 2 लाख 67 हज़ार 228 कुपोषित बच्चे हैं. वहीं कर्नाटक में ये संख्या 2 लाख 49 हज़ार 463 है. उत्तर प्रदेश में 1 लाख 86 हज़ार 640 बच्चे कुपोषित हैं. जबकि तमिलनाडु में 1 लाख 78 हज़ार 60 बच्चे. राजधानी दिल्ली के हालात भी कुछ बहुत अच्छे नही हैं. यहां कुपोषित बच्चों की कुल तादाद 1 लाख 17 हज़ार 345 है.
चाइल्ड राइट्स एंड यू (CRY) एक NGO है जो सालों में बच्चों के अधिकारों पर काम करता है. CRY की सीईओ पूजा मारवाह ने PTI से कहा है कि कोरोना महामारी ने पिछले एक दशक में हुई प्रगति को नष्ट कर दिया है. उन्होंने बताया कि ख़ासा असर बच्चों पर स्कूल बंद होने से पढ़ा है.
मारवाह ने PTI से कहा,
“स्कूलों के लंबे समय तक बंद रहने की वजह से स्कूलों में मिड ड़े मील भोजन बंद हो गई थी. जिससे गरीब परिवारों से आने वाले बच्चों को ज़्यादा असर पड़ा है."वहीं अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के समूह चिकित्सा निदेशक अनुपम सिब्बल ने PTI से बताया कि इस स्थिति से उबरना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने PTI से कहा,
"कुपोषित बच्चों में संक्रमण का ज़्यादा खतरा होता है. उनमें एनर्जी कम होती है, स्कूल में भी ऐसे बच्चों का प्रदर्शन अच्छा नहीं होता. इसके लिए गर्भवती महिलाओं के पोषण का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है. मां का दूध बच्चे के लिए बहुत ज़रूरी है."














