आज अखबार खोला, तो नागपुर से एक और 'ऑनर किलिंग' की खबर दिखाई पड़ी. 'ऑनर' कहें या 'डिसऑनर किलिंग', सच तो ये है कि एक जान गई है. उन हजारों जानों की तरह, जो अक्सर जाती हैं. कभी न्यूज़ में दिख जाती हैं, कभी नहीं. हुआ ये कि 45 साल की मुक्ताबाई को मालूम पड़ा कि उसकी 19 साल की बेटी प्रेगनेंट है. बेटी गैर-शादीशुदा थी. स्कूल ख़त्म किए बिना ही पढ़ाई छोड़ दी थी. लड़की का अफेयर अपने ही इलाके के एक लड़के से था.
जब मुक्ताबाई को पता चला, बेटी की प्रेगनेंसी 3 महीने की हो चुकी थी. उसने बेटी से कहा, बच्चा गिरा दो. बेटी ने मना कर दिया. मां को लगा, अगर यह खबर फैली कि ये बिना शादी के प्रेगनेंट हो गई, तो दुनिया में बड़ी थू-थू होगी. जब बेटी नहीं मानी, मां ने तय किया कि उसे मार डालेगी. फिर उसने दुपट्टे से अपनी बेटी का गला घोंट दिया. और किसी को मर्डर का पता न चले, इसलिए उसके अंतिम संस्कार की तैयारी कर ली.
इसके साथ ही सारे सुराग खत्म हो जाते. लेकिन पहले ही पुलिस आ गई. जांच हुई तो 'फ़ाउल प्ले' के निशान मिले. यानी लड़की की मौत के पहले उसके साथ जोर-जबरदस्ती की गई. शरीर ऑटॉप्सी के लिए गया, तो पता चला लड़की 3 महीने से प्रेगनेंट थी. जब पुलिस ने घर वालों से पूछताछ की, तो लड़की की मां ने कबूला कि मर्डर उसी ने किया है. ऐसी मांएं, बाप या भाई कितनी जल्दी टूटकर अपने गुनाह कबूल कर लेते हैं. ये कोई क्रिमिनल मास्टरमाइंड नहीं होते. जानें लेना इनका शौक या पेशा नहीं होता. लेकिन इनकी इज्जत की कीमत अपनी बेटियों की जान से ज्यादा होती है. इतनी ज्यादा कि किसी का मर्डर उन्हें गुनाह लगता ही नहीं. उन्हें बस ये लगता है कि उनके बच्चों ने गलत किया. और उसकी जान लेना ही उसके साथ न्याय करना है. प्रेगनेंसी से हमारे समाज में एक अजीब तरह की शर्म जुड़ी है. हमारे यहां जब पड़ोस में औरतें प्रेगनेंट होती हैं, बड़ी-बूढ़ी औरतें आकर बताती हैं, 'यादव की बहुरिया के कुछ है.' 'कुछ' के प्रयोग से बाकी औरतें समझ जाती हैं कि प्रेगनेंसी है. पुरुषों और बच्चों के सामने इसका जिक्र नहीं करतीं. प्रेगनेंट बहू का पेट जब बढ़ने लगता है, वो पड़ोसियों में उठना-बैठना बंद कर देती है. पेट को दुपट्टे से ढक लेती है. उसी दुपट्टे से, जिससे एक समय उसने अपने बढ़ते स्तन ढके थे. उसी दुपट्टे से, जिससे मुक्ताबाई ने अपनी बेटी का गला घोंटा.
19 साल की वो लड़की बालिग थी. उसे किससे प्यार करना है, किसके साथ सेक्स संबंध बनाने हैं, कब प्रेगनेंट होना है और पेट में आए बच्चे को जन्म देना है या नहीं, ये सब उसके अधिकार है. मानवीय रूप से ही नहीं, कानूनन भी. अगर वो बच्चे को पैदा करना चाहती थी, ये उसका हक था. अगर मां को बेटी का ये फैसला नामंजूर था, वो उससे नाराज़ हो सकती थी. रिश्ता तोड़ सकती थी. लेकिन इज्जत ने मर्डर करवा दिया.
ये सच है, कि शादी और प्रेगनेंसी के लिहाज से लड़की की उम्र कम थी. लेकिन क्या हम इसका जिम्मेदार लड़की को मान सकते हैं? उस समाज में, जिसमें टीवी पर कॉन्डम का प्रचार भर आ जाए, तो मां-बाप चैनल बदल देते हैं. कभी उन्हें नहीं बताते कि सेक्स चीज क्या है. जल्दबाजी और बिना सेफ्टी के किए गए सेक्स के क्या नुकसान हो सकते हैं. ऐसे बच्चे अपने शरीर में आए परिवर्तनों को हैंडल नहीं कर पाते. और कुछ भी न समझ पाने की स्टेट में अनसेफ़ सेक्स करते हैं. कच्ची उम्र में लड़कियां प्रेगनेंट हो जाती हैं.
अगर इज्जत की इतनी ही फ़िक्र है, तो अपने बच्चों से बात कीजिए. इस बात को फेस कीजिए कि सेक्स, सिर्फ सेक्स भर है. और प्रेगनेंसी, बाद प्रेगनेंसी भर. इसके फायदे और नुकसानों के बारे में अपने बच्चों को बताइए.
मुक्ताबाई ने बेटी को इसलिए मार डाला कि उसकी प्रेगनेंसी का किसी को पता न चले. आज पूरा देश अखबारों में उसकी प्रेगनेंसी के बारे में पढ़ रहा है. और ये भी पढ़ रहा है कि उसकी मां खूनी है. तो बताइए, बच गई परिवार की इज्जत?