हिमाचल हाईकोर्ट ने नाबालिग रेप पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट करने के मामले में राज्य सरकार को 5 लाख़ रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि नाबालिग से मेडिकल जांच के दौरान डॉक्टर्स ने अपमानजनक सवाल भी पूछे हैं, मसलन वर्जिनिटी (कौमार्य) से जुड़ा सवाल. अब आरोपी डॉक्टर्स पर जांच बैठेगी. जो आरोपी डॉक्टर रिटायर हो गए हैं, उन्हें भी जांच से छूट नहीं दी जाएगी.
नाबालिग का 'टू-फिंगर टेस्ट' किया, हाईकोर्ट बोला- डॉक्टरों की जेब से मुआवज़ा वसूल हो
हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा, अगली सुनवाई में आना, तो मुआवज़े की रसीद साथ होनी चाहिए.


इस मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी है. अदालत ने हुक्म दिया है कि इस तारीख को सुनवाई के दौरान पीड़िता को दिए मुआवज़े की रसीद पेश की जाए और साथ ही आरोपी डॉक्टर्स पर बैठी जांच की रिपोर्ट भी. कोर्ट की नाराज़गी की वजह - टू फिंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट साल 2013 में ही बैन लगा चुकी है.
जेब से भरना पड़ सकता है मुआवज़ाबार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक़ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान व जस्टिस सत्येन वैद्य की बैंच ने कहा है कि इंक्वायरी के बाद मुआवजे की रकम दोषी डॉक्टर्स की जेब से रिकवर किया जा सकता है. अगर डॉक्टर दोषी पाये गए, तो उन्हें सरकारी खज़ाने में पांच लाख रुपये जमा कराने पड़ सकते हैं.
कोर्ट ने राज्य में टू फिंगर टेस्ट करने के लिए सख्ती से मना किया है. कहा कि रेप पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट करने वाले डॉक्टर्स पर अवमानना का मुकदमा दर्ज कर उन्हें सजा दी जा सकती है. पीठ ने आगे कहा,
अपमानजनक सवाल पूछे!“टू-फिंगर टेस्ट रेप पीड़िताओं की निजता और शारीरिक एवं मानसिक गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है. सिविल अस्पताल पालमपुर के डॉक्टर्स के हाथों पीड़ित का जो शोषण हुआ, जो आघात और अपमान हुआ, उसके लिए 5 लाख का मुआवज़ा दिया जाए.”
पीड़िता की मेडिकल जांच के दौरान जो प्रोफार्मा (फॉर्म) भरा गया, उसकी भाषा को लेकर भी कोर्ट ने नाराज़गी ज़ाहिर की. अदालत ने कहा कि प्रोफार्मा में पूछे गए सवाल न सिर्फ पीड़िता को नीचा दिखाते हैं, बल्कि दोष की सुई भी उसी की ओर मोड़ देते हैं. कुछ सवाल ऐसे थे, जो बेंच की नज़र में पीड़िता की निजता का सीधा-सीधा उल्लंघन थे -
- क्या आप गर्भवती हैं?
- लास्ट सेक्स का टाइम/तारीख़
- असॉल्ट से पहले सेक्स किया? (तारीख़, टाइम, कॉन्डम यूज किया था या नहीं)
- क्या आप वर्जिन हैं?
अदालत ने ये भी कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 53 A ये कहती है कि पूर्व के सेक्शुअल एक्सपीरियंस का सेक्शुअल असॉल्ट के मामलों में कोई वज़न नहीं होता. अतः जिन लोगों ने (डॉक्टर्स) ये प्रोफार्मा बनाया है, उनपर भी जांच बैठेगी. यदि ये लोग रिटायर हो गये हैं, तब भी ये जांच की ज़द में आएंगे.
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सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में बैन कर दिया था टू फिंगर टेस्टसुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में ही टू फिंगर टेस्ट को असंवैधानिक बताया था. तब कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट को रेप पीड़िता की निजता का हनन बताते हुए कहा था कि इस टेस्ट की वजह से पीड़ित महिला को बार-बार शारीरिक और मानसिक दर्द से गुजरना पड़ता है. कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी साफ तौर पर कहा था कि अगर टेस्ट में ये साबित भी हो जाता है कि एक महिला यौन संबंध बनाती रही है, तो भी इससे ये सिद्ध नहीं हो सकता है कि संबंध सहमति से बने थे.
असल में रेप का आरोप लगने पर पीड़ित महिला का वजाइनल टेस्ट किया जाता है. इस टेस्ट के लिए मेडिकल प्रैक्टिशनर्स को एक किट भी दी जाती है. इस टेस्ट में ये देखा जाता है कि महिला की वजाइना में चोट और जबरदस्ती के कोई निशान तो नहीं हैं, इसके साथ ही स्वैब टेस्ट भी किया जाता है. मेडिकल भाषा में टू फिंगर टेस्ट नाम का कोई टेस्ट नहीं है. लेकिन कई जगहों पर वजाइनल एक्ज़ामिनेशन के दौरान पीड़िता की वजाइना में दो उंगलियां डालकर देखा जाता था. यहीं से ‘टू फिंगर टेस्ट’ शब्द आया. दावा किया जाता था कि इस टेस्ट से ये पता लगता है कि महिला सेक्शुअली एक्टिव थी या नहीं. लेकिन ये टेस्ट पेशेवर मेडिकल प्रैक्टिस का हिस्सा नहीं था, न सटीक नतीजे ही देता था. और अब तो एक दशक से भी ज़्यादा वक्त से भारत में प्रतिबंधित है.
प्रतिबंध के बावजूद टू फिंगर टेस्ट होने की खबरें आती रहती हैं. आज तक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में 1500 रेप पीड़िताओं ने शिकायत की थी कि उनका टू फिंगर टेस्ट किया गया. साल 2021 में वायुसेना की एक महिला अधिकारी ने साथी वायुसैनिक पर रेप का आरोप लगाया था. पीड़ित वायुसैनिक ने वायुसेना के डॉक्टर्स पर टू फिंगर टेस्ट करने का आरोप लगाया था. महिला अधिकारी ने कहा,
"मुझे बाद में पता चला कि रेप की जांच में टू फिंगर टेस्ट नहीं होना चाहिए. इस हरकत की वजह से मुझे रेप के ट्रॉमा को दोबारा झेलना पड़ा."
इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग ने वायुसेना प्रमुख को चिट्ठी भी लिखी थी और टू फिंगर टेस्ट करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ एक्शन लेने की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भी टू फिंगर टेस्ट किए जा रहे थे. इसलिए अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अपने हुक्म पर अमल का आदेश दिया था.
वीडियो: रेप के आरोप में महिला दोषी हो सकती है? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार




















