खबर हैदराबाद की है. आराधना के पापा लक्ष्मीचंद पेशे से जैहरी हैं. बिजनेस में भारी लॉस हो गया. तो चल पड़े भगवान के घर. उसके रिकवरी के लिए टोटके मांगने. डैमेज कंट्रोल करने. जैसे ऊपरवाले ने जानबूझकर इनका काम बिगाड़ा हो. चेन्नई का पुजारी था. उसने लक्ष्मीचंद को बेवकूफाना उपाय बताया. उसने कहा,
'अपनी बिटिया से चतुर्मास का उपवास रखवाओ. जितना लॉस हुआ है न, सब का सब रिकवर हो जाएगा.'
यहां ध्यान दिया जाय, बच्ची के पापा जैन धर्म के हैं.
ये एक फैक्ट मात्र है. अगर इस बात से आपको कोई फर्क पड़ता हो तो उस हिसाब से पढ़ें.
पंडित का आइडिया लक्ष्मीचंद को पसंद आया. उसे इसने सिर-माथे से लगाया. और वापस घर आ गया. बिना सोचे-समझे उस चोमू ने अपनी नन्ही सी बिटिया आराधना को लगा दिया उपवास में. एक बार भी नहीं सोचा कि 13 साल की बच्ची 68 दिनों का उपवास कैसे रख पाएगी. खैर बाप की आज्ञा को आराधना ने भी सिर-माथे लगाया और उपवास रख लिया. उसका फास्ट खत्म हुआ 3 अक्टूबर को. घर में उस दिन जश्न का माहौल था. पूरा का पूरा जलसा सजाया था आराधना के बाप ने. नेता-वेता, मंत्री-संत्री सब आए थे. उपवास खोलने के कुछ ही देर बाद उसे अस्पताल में भर्ती किया गया. आराधना को डिहाइड्रेशन हो रखा था. इसके चलते वो कोमा में चली गई. और उसके बाद हमेशा के लिए सो गई. डॉक्टर्स ने बताया कि उसकी आंतें सूख गई थी. किडनी पर भी बुरा असर पड़ा था फास्ट का. बच्चों के अधिकार के लिए जो लोग लड़ते हैं उन्होंने आराधना के घरवालो के खिलाफ केस दर्ज करा दिया है.
ये कैसी बेवकूफी है? आप धर्म को अपने हिसाब से मोडीफाई करते हैं. उपवास करते हैं. आपकी मर्जी पर उपवास क्या एक्सचेंज ऑफर है? ये कौन सा लॉजिक हुआ कि अप अपने बच्चे को भूखा मारो और बिजनेस आगे बढेगा? किस धर्म में कौन सा भगवान ये कह कर गया है कि मैं आपकी तरक्की तब तक रोके रखूंगा जब तक तुम्हारा बच्चा खाना खाता रहेगा. बच्ची जैन धर्म से बिलॉन्ग करती है. लेकिन ये जो हुआ वो पागलपन है. और इस पागलपन के चक्कर में उस बच्ची की जान ले ली गई.