ये 11 लाख लोग जंगल में क्यों रह रहे हैं, पहले उन्हें ज़मीन छोड़ने का आदेश क्यों आया और क्यों फिर सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही आदेश पर रोक लगा दी, समझिए आसान भाषा में

वन अधिकारों के लिए आंदोलनों का भारत में लंबा इतिहास है.(सांकेतिक तस्वीर)
क्या है फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006?
जंगल में लोग तब से रहते आ रहे हैं जब सभ्यता नहीं थी. गांव बसे, शहर बसे लेकिन कई समाज जंगलों में बने रहे. इनमें ज़्यादातर थे आदिवासी या अनुसूचित जनजातियों के लोग. अंग्रेज़ 1927 में इंडियन फॉरेस्ट एक्ट ले आए. इससे पीढ़ियों से जंगलों में रहने वाले लोग अचानक कानून की नज़र में अतिक्रमणकारी हो गए. अतिक्रमणकारी करार दिए इन लोगों पर सरकार जुर्माने और जेल की कार्रवाई करती.
इस बात का खूब विरोध हुआ. भारत में वन अधिकारों के लिए हुए आंदोलनों का लंबा इतिहास है. लंबी खींच-तान के बाद दिसंबर 2006 में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार द शिड्यूल्ड ट्राइब्स एंड अदर ट्रेडिशनल फॉरेस्ट ड्वेलर्स (रिकगनिशन ऑफ फॉरेस्ट राइट्स) एक्ट लेकर आई. साधारण भाषा में इसे ही फॉरेस्ट राइट्स या FRA कहा जाता है. इसके तहत 31 दिसंबर 2005 से पहले जितने भी लोग जंगल की ज़मीन पर कम से कम तीन पीढ़ियों से रह रहे थे, उन्हें ज़मीन के पट्टे मिलने थे.

जो लोग बिना कागज-पत्तर रह रहे थे, उनके लिए अपने दावे के लिए दस्तावेज़ पेश करना बहुत मुश्किल था.(सांकेतिक तस्वीर)
पट्ट मिलना इतना ज़रूरी क्यों था?
पट्टा मिलना मतलब सरकारी रिकॉर्ड में ज़मीन आपकी हो जाना. वहां से आपको कोई नहीं हटा सकता. इस ज़मीन को आप ज़रूरत पड़ने पर बैंक में गिरवी रख सकते हैं, या बेच भी सकते हैं. 1927 के कानून को वनवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय माना गया था. FRA इसी अन्याय के समाधान के लिए था.
क्या था पट्टे मिलने का प्रॉसेस?
ज़मीन पर रहने वाले को अपना दावा एक कमेटी के सामने पेश करना होता था. जंगल विभाग के सदस्यों वाली इस कमेटी के अध्यक्ष होते थे ज़िला कलेक्टर. आम तौर पर लोग दावे के पक्ष में जंगल विभाग की दी जुर्माने वाली रसीदें पेश करते थे. ये जुर्माना 1927 से ही वसूला जा रहा था.
क्या दिक्कत थी FRA में?
FRA की दो तरह से आलोचना हुई. पर्यावरण पर काम करने वाले कई लोगों का मानना था कि लोगों को पट्टे मिलने से जंगल और जानवरों को नुकसान होगा. एक पक्ष ये भी था कि FRA में पट्टे देने का प्रॉसेस इतना जटिल है कि कई लोगों के दावे खारिज हो जाएंगे. व्यक्तिगत दावों पर तो फिर भी पट्टे मिल जा रहे थे. लेकिन सामूहिक इस्तेमाल की ज़मीन वाले दावों पर बहुत ही कम पट्टे दिए गए. सामूहिक इस्तेमाल माने स्कूल या आंगनवाड़ी के लिए ज़मीन. या वो ज़मीन जिसपर जानवर चरें, लोग तेंदूपत्ता, बांस वगैरह इकट्ठा करें.
कितने दावे खारिज हुए हैं?
अलग-अलग राज्य सरकारों ने कोर्ट को बताया है कि अब तक 11 लाख 72 हज़ार 931 दावे खारिज हुए हैं. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से तकरीबन 20 फीसदी खारिज दावे सिर्फ तीन राज्यों के हैं - मध्यप्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा.
बात कोर्ट तक कैसे पहुंची?
फॉरेस्ट राइट्स एक्ट को कई NGO और रिटायर्ड वन अधिकारियों ने कोर्ट में चुनौती दी हुई है. वाइल्ड लाइफ फर्स्ट और अन्य बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मामले में कोर्ट ने 19 फरवरी को एक आदेश निकाला. इसमें17 राज्यों के चीफ सेक्रेटरी से कहा गया है कि वो खारिज दावों वाले लोगों को 12 जुलाई 2019 से पहले जंगल से बाहर करें. जो दावे पेंडिंग हैं, उन्हें भी इस तारीख तक निपटाना है. इस दिन मामले की फिर से सुनवाई होगी. देहरादून के फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया से कहा गया है कि वो सैटेलाइट से तस्वीरें लेकर एक रिपोर्ट बनाए जिसमें नज़र आए कि कितना अतिक्रमण हटा. अभी इस फैसले पर अमल होता, उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को एक और आदेश दिया और अपने पुराने आदेश पर रोक लगा दी.
आगे क्या होगा?
अतीत में ये इल्ज़ाम लगे कि भारत सरकार फॉरेस्ट राइट्स एक्ट वाले मुकदमे को ढंग से लड़ नहीं रही. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकारों के सामने ये समस्या खड़ी हो गई है कि 11 लाख परिवारों को जंगल से बाहर निकालें तो भेजें कहां. वन अधिकार पूरे देश में खासकर आदिवासियों के बीच भावनात्मक मुद्दा है. उनके लिए ये अपने सिर की छत से जुड़ा मामला है. चुनाव ऐन सिर पर हैं. तो ऐसे में सरकारों को बहुत सोच-सोच कर कदम बढ़ाना पड़ेगा.
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