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गुजरातः किसान ने सुसाइड किया, लिखा- मेरी आत्मा BJP की, पर गरीब का काम किसी ने नहीं किया

पांच साल से मदद मांग रहा था किसान, सरकारी दफ्तर में आत्महत्या कर ली.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडिया टुडे)
दिल्ली और देश के कई शहरों में किसान नए कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार किसानों की आय दोगुनी करने का दावा कर रही है. किसानों को सरकारी मदद मुहैया कराने की बात कहती हैं लेकिन जमीन पर ऐसा होता हुआ दिखता नहीं. गुजरात के महीसागर जिले के बाकोर गांव की तहसील पंचायत के दफ्तर में एक किसान ने सुसाइड कर लिया. किसान का नाम बलवंत चारण था. बलवंत ने अपने सुसाइड नोट में लिखा-
मेरी आत्मा में आज भी भाजपा है लेकिन मुझ गरीब का किसी ने काम नहीं किया.
चिट्ठी में और क्या लिखा? आत्महत्या करने से पहले बलवंत ने बाकोर पुलिस थाने में फोन किया था और कहा था कि अधिकारी उसकी सरकारी सहायता का काम नहीं कर रहे हैं और इसलिए वह अब आत्महत्या करने जा रहा है. लेकिन पुलिस ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया और बलवंत ने आत्महत्या कर ली. इंडिया टुडे की गोपी मनियार की रिपोर्ट के मुताबिक, बलवंत ने सुसाइड नोट में महीसागर के सांसद और विधायक जिग्नेश सेवक दोनों के नाम का जिक्र किया है. लिखा है-
सेवक का मतलब ही लोगों की सेवा करना होता है लेकिन यहां सेवा नहीं की जाती हैं. मैं एक गरीब आदमी हूं, सालों से बीजेपी में विश्वास करता था. मेरी आत्मा में भाजपा है. बीजेपी के साथ अंत तक रहा, भले ही मैं मर जाऊं, फिर भी मैं बीजेपी को मानता रहूंगा. पार्टी में आज भी मेरी आत्मा है लेकिन गरीब होने की वजह से मुझे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला.
पुलिस का क्या कहना है? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट मुताबिक, बाकोर तालुका के पुलिस सब इंस्पेक्टर एम बी वाच्छानी ने बताया है कि उसने 112 नंबर पर कॉल किया था और कहा था कि पंचायत ऑफिस में उसका काम नहीं हो पा रहा है. उसने मामले को लेकर विस्तार से नहीं बताया और ना ही किसी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया है. अभी के लिए हमने एक्सीडेंटल डेथ का मामला दर्ज किया है लेकिन अगर इसके लिए कोई जिम्मेदार पाया जाता है तो आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा 306 के तहत कारवाई की जाएगी. मामले को लेकर बलवंत के बेटे राजेन्द्र का कहना है कि उनके पिता ने अपनी जमीन का कुछ हिस्सा बेच कर एक घर बनाने का सपना देखा था. इसको लेकर वह पिछले पांच साल से प्रधानमंत्री आवास योजना की सहायता के लिए अर्जी दे रहे थे. उनका नाम भी इसके लिए चुना गया था लेकिन उन्हें सहायता नहीं मिल रही थी. वह बार-बार तहसील पंचायत के दफ्तर का चक्कर काट रहे थे.

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