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क्या अमित शाह ने लिखे थे ओवैसी के भाषण?

पूर्व बीजेपी विधायक यतिन ओझा का दावा: 'मैं भी था मीटिंग में मौजूद'. कभी अमित शाह हुआ करते थे इन विधायक जी के पोलिंग एजेंट.

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फोटो - thelallantop
काफ्का ने एक कहानी लिखी थी: मेटामॉरफोसिस. इसमें एक आदमी सो के उठता है और अपने आप को कॉकरोच बना हुआ पाता है. वो तो कहानी थी. पर ये मेटामॉरफोसिस जीवन में कई तरह से हो सकता है.
जैसे, आप एक दिन सोकर उठें और अखबार में पढ़ें कि बिहार चुनाव से पहले ओवैसी के बदमाशी वाले भाषण अमित शाह ने लिखे थे. कैसा लगेगा?
गुजरात से बीजेपी के पूर्व विधायक यतिन ओझा ने डिट्टो यही बात बोली है. बाकायदा चिट्ठी लिखकर. गेस करिए, ये चिट्ठी किसको गई है?
गलत जवाब.
सही जवाब है : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को.
2015 के बिहार चुनाव में लालू-नीतीश-राहुल ने 'महागठबंधन' बनाया था. पर यतिन का कहना है कि एक और महागठबंधन बना था. अमित शाह और अकबरुद्दीन ओवैसी के बीच. ओवैसी के घर पर. तड़के 3 बजे. यतिन का कहना है कि वो भी इस मीटिंग में मौजूद थे.
यतिन के मुताबिक, वहीं पर तय हुआ कि ओवैसी मुस्लिम इलाके में अपने कैंडिडेट उतारेंगे. ये भी तय हुआ कि 'हम लिख के देंगे, तुम बोलना'. मतलब शाह का दिमाग और ओवैसी की बोली. और बोली माने जहर उगलना. जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम खूब लेह-देह. 'जाएंगे पाकिस्तान, ले जाएंगे ताजमहल' टाइप का. ये हम इमेजिन कर रहे हैं. वरना लोग और बुरा बोलते हैं.
ये चिट्ठी खुद ही पढ़ लीजिये:
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आपको क्या लगता है? यतिन ओझा KRK हैं? नहीं भाई!

यतिन ओझा कोई ऐरे-गैरे आदमी नहीं हैं. एक टाइम में अमित शाह ओझा के 'पोलिंग एजेंट' हुआ करते थे. त्रेता युग में नहीं. 1996 के गुजरात विधानसभा चुनाव में ही.
 
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यतिन ओझा

अभी यतिन गुजरात हाई कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं. साथ ही गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी. ओझा सिर्फ 39 साल की उम्र में सीनियर एडवोकेट बन गए थे. गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के 16 बार प्रेसिडेंट रह चुके हैं. इसीलिए इनकी बात को हंसी में नहीं उड़ाया जा सकता. क्योंकि ये राजनीति के KRK तो हैं नहीं.
पहले ओझा बीजेपी से MLA थे. 2001 में बीजेपी के बड़े नेता केशुभाई पटेल से इनकी भिड़ंत हो गई. पार्टी छोड़ दिए. कांग्रेस में चले गए. 2002 में मोदी के खिलाफ ही लड़े भी. हार गए थे. बाद में 2007 में बीजेपी में वापस भी आये. फिर नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने लगे. मोदी के सपोर्ट में टीवी पर खूब बहस भी किया करते थे.
पर हाल में ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर को चिट्ठी लिखी थी. कि गुजरात हाई कोर्ट के दो जज एम आर शाह और के एस झावेरी मोदी और शाह की चापलूसी कर रहे हैं. हाई कोर्ट के खिलाफ भी काफी कान भरे थे. नतीजा, हाई कोर्ट में 'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट' का केस चल रहा है.

तो क्यों मिले थे केजरीवाल से?

कुछ दिन पहले यतिन अरविन्द केजरीवाल से मिले थे. मिलने के बाद बोले:
''हम तो ऐसे ही केजरीवाल से मिले थे. ऑफिशियल मीटिंग नहीं थी. पर आप समझ लीजिये कि हम अब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हैं.''
फिर बोले कि मोदी को कोर्ट पर दबाव बनाने और करप्शन पर घेरना है.
चिट्ठी वाला मेटामॉरफोसिस अचानक नहीं हुआ है. यतिन ओझा की इस चिट्ठी को उनके राजनीतिक अरमानों से अलग करके नहीं देखा जा सकता. AAP की सोशल मीडिया टीम ने भी इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया और ट्विटर पर #ShahOwaisiExposed ट्रेंड करने लगा. दिल्ली में बीजेपी को पटकने के बाद AAP गोवा और गुजरात में भी अपनी पिच तैयार कर रही है. पंजाब में ग्राउंडवर्क हो चुका है. वहां पार्टी मजबूत दावेदार मानी जा रही है. 119 में से 100 सीटों का दावा है. फिर गोवा में केजरीवाल फूल-पत्ती पहनकर गए थे. वहां भी 40 में से 35 सीट क्लेम कर रहे हैं. अब गुजरात में सोमनाथ मंदिर से अपनी यात्रा शुरू कर धावा बोल दिया है. पहले बीजेपी इस मंदिर से शुरुआत करती थी. माने एकदम बीजेपी की चप्पल पहनकर चल दिए हैं.
फिर अशिक्षा, बेरोजगारी, किसानों की स्थिति जैसे मुद्दे उठाकर बीजेपी के लिए चक्रव्यूह बनाना शुरू कर दिया है. सीधा मंत्र है. अगर कामयाब लेनी है तो गुजरात मॉडल में छेद करना पड़ेगा.
अब ओपन लेटर के दौर में ओझा ने लिफ़ाफ़े वाली चिट्ठी भेजी है तो उसमें कुछ तो होगा ही. कई तरह के कयास लगाए जाएंगे. कोई कहेगा कि केजरीवाल ने खुद ही टाइप किया है. कोई कहेगा राजनीति है ही ऐसी चीज. कुछ भी हो सकता है. कुछ लोग एकदम गंभीर होकर मुंह में पान लिए कहेंगे: 'हम तो पहिले ही बोले थे बे. सब एक्के हैं.'
हम तो इंतजार में हैं कि और दो-चार ठो लेटर आएं. मामला साफ हो. एक नया मेटामॉरफोसिस हो. कुछ आस्तीन का सांप-सूंप निकले.

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