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क्या है बिजली संशोधन बिल, जो हमें मनमर्जी की कंपनी चुनने का विकल्प देता है?

इस विधेयक से बिजली क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री होगी.

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केंद्रीय विद्युत मंत्री आरके सिंह. (फोटो साभार: पीआईबी)

केंद्र सरकार ने आखिरकार सोमवार को लोकसभा में विद्युत संशोधन विधेयक 2022 पेश कर दिया. दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से भी अधिक समय तक चले किसान आदोलन के पीछे बड़ी वजहों में से एक यह बिल भी था. सरकार का दावा है कि इस विधेयक का मकसद बिजली वितरण के क्षेत्र में बदलाव लाना, नियामक तंत्र को मजबूत बनाना और पूरी विद्युत व्यवस्था को आज के हिसाब से सुसंगत बनाना है.

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हालांकि विपक्ष ने विधेयक का पुरजोर विरोध किया और कहा कि सरकार इस बिल के जरिये पूरे बिजली क्षेत्र का निजीकरण करना चाह रही है, जिसके कारण बिजली बिलों में इजाफा होगा, सरकारी व्यवस्था को नुकसान होगा और अंतत: जनता को ही पूरा भार झेलना पड़ेगा.

इन तमाम चिंताओं और विरोधों को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक को संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है, जहां विस्तृत विचार-विमर्श के बाद इसे फिर से सदन में पेश किया जाएगा.

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ये बिल क्यों?

संसद ने साल 2003 में विद्युत कानून पारित किया था. इसके तहत बिजली के उत्पाद, व्यापार और उसके उपयोग संबंधी नियम बनाए गए थे. साथ ही बिजली क्षेत्र से जुड़े अन्य विषयों जैसे कि विद्युत टैरिफ को युक्तिसंगत बनाने, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और अन्य संबंधित संस्थाओं का गठन करने तथा पर्यावरण के लिए हितकर नीतियां बनाने जैसे फैसले लिए गए थे.

अब केंद्र सरकार इसी कानून में संशोधन कर रही है, जिसके लिए विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2022 लाया गया है. केंद्रीय विद्युत मंत्री आरके सिंह ने विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में कहा,

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'वैश्विक जलवायु परिवर्तन चिंताओं और हमारी नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) में भागीदारी करने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के मद्देनजर हमारे पर्यावरण के लिए हरित ऊर्जा की महत्ता को ध्यान में रखते हुए कानून में संशोधन आवश्यक हो गए हैं.'

उन्होंने आगे कहा, 

'इसके अलावा विनियामक और न्यायनिर्णायक तंत्र को मजबूत करने तथा वितरण लाइसेंसधारियों के बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस के माध्यम से प्रशासनिक बदलाव लाने के लिए कानून में संशोधन करना जरूरी है.'

विधेयक में क्या है?

केंद्र सरकार ने मूल विद्युत कानून में कुल 10 संशोधन का प्रस्ताव किया है, जिसमें से धारा 14 और धारा 42 में संशोधन का प्रस्ताव प्रमुख है. इसके तहत बिजली वितरण क्षेत्र में निजी कंपनियों की एंट्री देने और उपभोक्ताओं को अलग-अलग सर्विस प्रोवाइडर्स से बिजली प्राप्त करने की सुविधा मुहैया कराने की योजना बनाई गई है.

विधेयक के मुताबिक विद्युत कानून, 2003 की धारा 14 में संशोधन कर सभी लाइसेंसधारियों (जिसमें प्राइवेट कंपनियां भी शामिल हैं) को वितरण नेटवर्क का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाएगी.

सरकार का कहना है कि ये प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि पावर सेक्टर में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया सके, जिससे वितरण क्षमता में सुधार होगा, उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मिलेंगी और इन सबके चलते पूरे बिजली क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित हो सकेगी.

विधेयक में कानून की धारा 42 में भी संशोधन का प्रस्ताव किया गया है ताकि किसी वितरण लाइसेंसधारी के वितरण नेटवर्क तक बिना किसी भेदभाव पहुंच को सुलभ बनाया जा सके.

इसके साथ ही कानून में एक नई धारा 60ए जोड़ने का प्रावधान किया गया है ताकि यदि किसी क्षेत्र में कई वितरण लाइसेंसधारी हों तो वहां पर बिजली खरीद का सही से मैनेजमेंट किया जा सके.

इसके अलावा धारा 142 में संशोधन करने कानून के प्रावधान का उल्लंघन करने पर जुर्माने की दर को बढ़ाने का प्रावधान किया गया है. साथ ही धारा 146 में संशोधन करके दंड में 'जेल या जुर्माना' की जगह 'जुर्माना' करने का प्रस्ताव किया गया है.

सरकार की दलील है कि इन संशोधन के चलते उपभोक्ताओं को ये विकल्प मिलेगा कि वे किस कंपनी से बिजली प्राप्त करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो जैसे हम अपनी पसंद के अनुसार सिम खरीदते हैं, वैसे ही बिजली भी मुहैया कराने की बात की जा रही है. हालांकि ये इतना ब्लैक एंड ह्वाइट नहीं है, इस बिल का चौतरफा विरोध भी हो रहा है.

बिल का विरोध क्यों?

इस विधेयक का विरोध सदन के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर हो रहा है. विपक्षी सांसदों ने कहा कि बिजली का विषय समवर्ती सूची में आता है, इसलिए केंद्र इस पर एकतरफा कानून नहीं बना सकता है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षकारों से चर्चा करना जरूरी है, जो कि इस विधेयक को पेश करने से पहले नहीं किया गया.

रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरसीपी) के एनके प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस विधेयक से उपभोक्ताओं और किसानों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और निजी क्षेत्र की कंपनियों को मनमाना लाभ उठाने का मौका मिलेगा.

वहीं, लोकसभा में कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि यह विधेयक सहकारी संघवाद का उल्लंघन करता है और राज्य सरकारों के अधिकारों को कमतर करता है.

इसके अलावा बिजली क्षेत्र के करीब 27 लाख कर्मचारियों और इंजीनियर्स ने इस विधेयक के विरोध में प्रदर्शन करने की बात की है. ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने एक बयान जारी कर कहा कि एक क्षेत्र में एक से अधिक कंपनियों को वितरण लाइसेंस देने से प्राइवेट कंपनियों को फायदा होगा और सरकारी कंपनियों का नुकसान होगा.

संगठन का कहना है कि चूंकि अंतत: सरकारी कंपनियों की ही ये जिम्मेदारी होगी कि वे हर जगह पर बिजली सुनिश्चित करें, इसलिए प्राइवेट कंपनियां सिर्फ उन्हीं जगहों को चुनेंगी जहां बिजली में फायदा हो रहा है और घाटे वाला क्षेत्र सरकारी कंपनी के हिस्से आएगा.

हालांकि, चूंकि इस बिल को संसदीय समिति के पास भेजा गया है, इसलिए विभिन्न स्टेकहोल्डर्स को ये उम्मीद है कि वे अपनी चिंताएं समिति के सामने रख सकेंगे और समाधान का रास्ता सुझाया जाएगा.

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