पुल के एक हिस्से में गहरा दर्द पसरा पड़ा है. एक डॉगी है. उसके नजदीक चप्पलें पड़ी हैं. लोग आते हैं तस्वीरें उतारते हैं, अफसोस जताते हैं और चले जाते हैं. जाएं भी क्यों ना. आखिर घर में कोई उनका इंतजार कर रहा है. इस डॉगी को भी इंतजार है. अपनी मालकिन का. जिन्होंने चप्पलें उतारकर इस पुल से नदी में छलांग लगा दी. इस डॉगी को आखिर कौन और कैसे समझाए कि मंदागी कंचना अब नहीं लौटेंगी.
मालकिन ने नदी में कूद कर दे दी जान, कुत्ता चप्पलों के पास करता रहा इंतजार
महिला ब्रिज पर वह अपने डॉगी के साथ पहुंची थी. वहां उसने चप्पलें उतारीं और पुल से छलांग लगा दी. डॉगी चप्पलों के पास बैठकर इंतजार करता रहा उसके लौटने का.
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पुदुचेरी में एक जिला है यानम. मंदागी कंचना भी यहीं की रहने वाली थीं. 16 जुलाई, रात का वक्त. यानम-येदुरलंका ब्रिज पर वह अपने डॉगी के साथ पहुंचीं. चप्पलें उतारीं और पुल से छलांग लगा दी. डॉगी चप्पलों के पास बैठकर इंतजार करता रहा मंदागी के लौटने का. पुल से गुजरने वाले राहगीर बेबस होकर उस डॉगी को रोता हुआ देखते रहे. यह ख़बर पुलिसवालों तक पहुंची. उन्होंने तलाशी अभियान शुरू किया ताकि महिला का पता चल सके.
जापान के हचिको का किस्सा भी इस कहानी के इर्द-गिर्द है. हिद्सएबुरो युएनो एक चर्चित एग्रीकल्चरल प्रफेसर हुआ करते थे. डॉग लवर भी थे. एक स्टूडेंट से बोले कि अकीता नस्ल का डॉगी तलाशो.
15 जनवरी 1924 की बात है. शिबुया जिले में प्रफेसर युएनो के घर के बाहर एक कुत्ते का बच्चा पहुंच गया. उसकी हालत बहुत खराब थी. उसका बचना मुश्किल लग रहा था. हचिको की बायोग्राफी लिखने वाले प्रफेसर मयूमी इतोह के मुताबिक, यूएनो और उनकी पत्नी यै ने उसका इलाज किया. तकरीबन छह महीने का वक्त लगा और उसकी हालत में सुधार हुआ. युएनो ने उसका नाम हाची रखा. हाची का मतलब होता है Eight, हिंदी में आठ. प्रफेसर युएनो के स्टूडेंट्स की ओर से सम्मान में उपाधि दी जाती थी 'को'. यही जुड़कर हो गया हाचि+को.
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, युएनो काम पर जाने के लिए हफ्ते में कई बार ट्रेन पकड़ा करते थे. जब वो शिबुया रेलवे स्टेशन जाते तो साथ में उनके तीन डॉगी भी निकल पड़ते. हाचिको भी इन तीनों में से एक होता था. फिर तीनों शाम तक प्रफेसर साहब के लौटने का इंतजार करते.
21 मई 1925 की बात है. प्रफेसर युएनो 53 साल के हो चुके थे. ब्रेन हैमरेज में उनकी जान चली गई. अभी 16 महीने पहले ही हाचिको उनकी जिंदगी का हिस्सा बना था. प्रफेसर साहब का हाचिको के लिए प्रेम बिलकुल पिता सरीखे. प्रफेसर के लिए हाचिको की मोहब्बत इतनी कि वो हर रोज रेलवे स्टेशन जाता. हर यात्री की ओर गौर से ताकता ताकि कहीं तो उसे प्रफेसर युएनो दिख जाएं. हाचिको को वहां से भगाने के लिए कुछ लोग उस पर पानी फेंक देते तो बच्चे उसे परेशान करते. लेकिन वो स्टेशन से नहीं जाता. वक्त गुजरता गया.
जापान के डेली न्यूज पेपर टोक्यो असाही शिमबन ने अक्टूबर 1932 में हाचिको की कहानी लिखी तो देशभर में उसकी चर्चा होने लगी. हाचिको के खाने के लिए अब हर रोज रेलवे स्टेशन में लोग दान करने लगे. दूर-दूर से लोग उसे देखने आते.
तकरीबन 10 सालों का इंतजार करने के बाद हाचिको की आंखें थक चुकी थीं. 8 मार्च 1935 को वह दुनिया को अलविदा कह गया. प्रफेसर और हाचिको के प्रेम की ये कहानी लोगों के दिलों को छू गई. लोगों ने चंदा इकट्ठा करके हाचिको की मूर्ति स्थापित कराई. पुदुचेरी में हुई घटना ने हाचिको के किस्सों को कुरेदकर जिंदा किया है.


















