छोटे थे. स्कूल से निबंध लिखने को मिलता, तो लिखते थे- होली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है. हर साल धूमधाम से मनाया जाता है. क्या सच्ची, होली सिर्फ हिंदुओं का त्योहार है. अगर है तो सीलमपुर में होली वाली सुबह क्यों फिरोज घर के नीचे आकर आवाज लगाता. बाहर निकल बे, वरना घसीटता हुआ बाहर लाऊंगा. मम्मी गेट खोल देतीं वो तहजीब के साथ मम्मी को गुलाल लगाता. और मेरे चेहरे पर चांदी लगाकर चमकीला बना देता.
आज ये किस्सा यहां लिखना थोड़ा सी शर्म मुझ में भर रहा है. क्यों ये बात कहनी पड़ रही है कि होली हिंदुओं का नहीं, हिंदुस्तानियों का त्योहार है. खैर, होली आने को है. बधाई मैसेज और फेसबुक पर टैगिंग चालू है. लेकिन इन सबसे इतर एक कहानी है. स्टोरीबाजी कहते हैं उसे. दिव्यप्रकाश दुबे राइटर हैं न,
संडे वाली चिट्ठी लिखते हैं. ये स्टोरीबाजी दिव्य ने की है. उन्होंने होली से जुड़ी एक कहानी सुनाई है. देखेंगे तो आपको भी अपने बचपन का किस्सा याद आ जाएगा. हम ज्यादा फुटेज नहीं खाएंगे. आप वीडियो देखिए.
https://www.youtube.com/watch?v=gMbIeIabWNU&feature=youtu.be कहानी में दिव्य प्रकाश दुबे नजीर अकबराबादी की एक कविता का भी जिक्र करते हैं. होली से जुड़ी ये कविता हमें प्यारी लगी, तो हम आपको उसे भी पढ़ाए देते हैं.
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ (चंग) के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की
ख़म शीशए, जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।
हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुंहचंग भरे
कुछ घुंघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की
सामान जहां तक होता है इस इशरत के मतलूबों का
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों (सुंदरियों) का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की ।।
गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो
मुंह लाल, गुलाबी आंखें हों, और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को, अंगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की ।।
इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो
मुंह जिसका चांद का टुकड़ा हो औऱ आंख भी मय की प्याली हो
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो
मयनोशी हो बेहोशी हो 'भड़ुए' की मुंह में गाली हो
भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की ।।
और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की ।।
यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो
माजून, शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो
लड़-भिड़के 'नज़ीर' फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की- नज़ीर अकबराबादी