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होर्मुज से पैदा हुए तेल संकट से दुनिया को चीन ने बचाया? तैयारी बेमिसाल थी

मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग के चलते स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की सप्लाई लगभग बंद सी हो गई. तेल की कीमतें बेहताशा बढ़ने लगीं. दुनिया भर के जानकार वैश्विक मंदी की चेतावनी देने लगे. लेकिन फिर भी स्थिति बेकाबू नहीं हुई. तमाम अर्थशास्त्रियों के गणित धरे रह गए. ऐसा हुआ क्योंकि इस संकट के दौरान चीन ने अपने तेल के आयात में भारी कटौती कर दी.

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चीन मिडिल ईस्ट में चल रहे क्राइसिस के दौरान दुनिया का शॉक एब्जॉर्वर बन गया. (इंडिया टुडे)

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  • अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच टकराव के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की सप्लाई लगभग बंद हो गई, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई।
  • चीन ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति के तहत पिछले दो दशकों में बड़े रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाए रखने और तेल के आयात में भारी कटौती की, ताकि संकट के दौरान ग्लोबल सप्लाई को स्थिर रखा जा सके।
  • चीन द्वारा तेल आयात में कटौती से वैश्विक तेल कीमतों का असामान्य उछाल रुक गया और अब ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते के बाद संकट लगभग समाप्त होने की संभावना है।

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच टकराव से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं. दुनिया भर में जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ने लगीं. बड़े-बड़े अर्थशास्त्री वैश्विक मंदी की चेतावनी देने लगे. आम तौर पर मिडिल ईस्ट में जंग होने से ऐसा होता भी रहा है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. 

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तेल सप्लाई की लाइफलाइन माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की सप्लाई लगभग बंद सी हो गई. लेकिन फिर भी स्थिति बेकाबू नहीं हुई. तमाम अर्थशास्त्रियों के गणित धरे रह गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस संकट के दौरान चीन ने अपने तेल के आयात में भारी कटौती कर दी. 

चीन के इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को बेकाबू होने से रोक लिया. दुनिया भर के तमाम अर्थव्यवस्थाओं में मचने वाला हाहाकार थम सा गया. अब तो ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते पर सिग्नेचर होने के बाद ये खतरा पूरी तरह से टलता नजर आ रहा है.

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ईरान युद्ध के बाद पैदा हुए तेल संकट से चीन ने बचाया?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब लंबे समय से दुनिया के 'स्विंग प्रोड्यूसर' के तौर पर जाना जाता है. यानी ऐसा देश जो क्रूड ऑयल मार्केट में अचानक आए उछाल या गिरावट को थाम सके. तेल उत्पादन घटाकर या बढ़ाकर बाजार को स्थिर कर सके.

डिमांड यानी इम्पोर्ट के मामले में अब तक सऊदी जैसा कोई प्लेयर नहीं था. लेकिन ब्लूमबर्ग के एनर्जी एक्सपर्ट जेवियर ब्लास की मानें तो चीन ने ये गैप भर दिया है. वो अब दुनिया का पहला ‘स्विंग इम्पोर्टर’ बन चुका है. बकौल ब्लास चीन ने तेल की खरीद में बड़े पैमाने पर कटौती की. और अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए बिना ग्लोबल सप्लाई को लगे झटके के बड़े हिस्से को एब्जॉर्ब कर लिया.

चीनी कस्टम के आंकड़ों के मुताबिक, मई महीने में चीन का आयात 7.8 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गया. ये पिछले आठ साल का सबसे निचला स्तर है. टैंकरों से होने वाला आयात तो 10 साल के निचले स्तर पर चला गया. ये 2025 के मुकाबले 45% से भी कम रहा. जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम मिलकर जितनी तेल खपत करते हैं, चीन ने समुद्री रास्ते से उतना तेल का आयात कम कर दिया. इसके बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था में संकट के कोई संकेत नहीं मिले हैं.

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चीन ने ये कैसे कर लिया?

इसका जवाब उस रणनीति में छिपा है, जिस पर चीन पिछले दो दशकों से काम कर रहा है. ‘ड्रैगन’ ने पिछले 20 सालों में दुनिया का सबसे बड़ा स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व खड़ा कर लिया है. साल 2025 के आखिर तक चीन के अंडरग्राउंड खजाने में करीब 140 करोड़ बैरल कच्चा तेल जमा हो चुका था. ये अमेरिका के सरकारी तेल भंडार से तीन गुना और जापान के स्टॉक से छह गुना से भी ज्यादा है.

चीन की इस प्लानिंग के पीछे एक डर है. साल 2003 में चीन के राष्ट्रपति थे 'हूं जिंताओ'. उन्होंने इस डर को 'मलक्का डिलेमा' (Malacca Dilemma) नाम दिया. चीन के तेल आयात का बड़ा हिस्सा सिंगापुर और मलेशिया के पास मौजूद एक बेहद संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है. इसका नाम है मलक्का स्ट्रेट. चीन को डर था कि अगर कभी ताइवान से युद्ध हुआ तो अमेरिका इस रास्ते की नाकेबंदी कर देगा. अमेरिकी नीति नियंताओं का मानना था कि इससे चीन की तेल सप्लाई रुक जाएगी और उसकी अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ जाएगी.

चीन ने इस आशंका के डर से पिछले दो दशकों में अपनी एनर्जी पॉलिसी में बड़ा बदलाव किया. बीजिंग ने घरेलू मोर्चे पर सौर और पवन ऊर्जा का जाल बिछाया, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के निर्माण में भारी निवेश किया और बड़े पैमाने पर कोयला आधारित बिजली उत्पादन शुरू किया. इसके साथ ही अपने पेट्रोलियम रिजर्व को भी बढ़ाता रहा. एक्सपर्ट्स की मानें तो तेल संकट के दौरान चीन ने अप्रैल से जून के बीच अपने रिजर्व से लगभग 10 से 20 करोड़ बैरल तेल निकालकर अपनी जरूरतें पूरी कीं.

चीन की एनर्जी पॉलिसी ने संकट के समय ग्लोबल इकोनॉमी के लिए एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के तौर पर काम किया. अगर बीजिंग ने अपने तेल आयात में कटौती नहीं की होती तो ग्लोबल सप्लाई पर दबाव काफी ज्यादा बढ़ जाता. जिसके चलते तेल की कीमत और महंगाई बेकाबू हो सकती थी. चीन ने दुनिया को उस स्तर के ऊर्जा संकट से बचा लिया, जिसका डर अर्थशास्त्र के विद्वान लगा रहे थे.

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भारत के लिए सबक

भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. चीन के उलट भारत का पेट्रोलियम रिजर्व सीमित है. देश में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भी अभी शुरुआती फेज में है. हालिया ऊर्जा संकट से एक बात साफ हो गई. एनर्जी सिक्योरिटी का मतलब अब केवल सप्लाई सुनिश्चित करने भर सीमित नहीं है.

ये तभी संभव है, जब आपके पास पर्याप्त लचीलापन हो. ये लचीलापन चाहे पेट्रोलियम रिजर्व से आए, ऑप्शनल एनर्जी सोर्सेज, इलेक्ट्रिक गाड़ियों या फिर घरेलू ऊर्जा उत्पादन से आए. चीन का उदाहरण बताता है कि जो देश इन उपायों में निवेश करेंगे. वे ही वैश्विक झटकों का सामना करने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे. 

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