उसके जीवन में दो सबसे बड़ी फैंटेसी हैं - civil Services और Indian Politics. वो चलता फिरता विकिपीडिया है. आप भारतीय राजनीति के किसी भी नेता का नाम बोलो, वो प्रोफाइल बोल डालेगा. मुझे याद है हम कभी आटा पिसवाने वाली चक्की पर मिलते थे और जितनी देर में हमारे गेहूं पिस रहे होते थे वो बेपनाह उत्साह के साथ राजस्थान की राजनीति, देवी सिंह भाटी, नरेंद्र मोदी, राजा भैय्या, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन, अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे, भैरों सिंह शेखावत, लाल कृष्ण आडवानी, अटल बिहारी वाजपेयी, सोनिया गांधी, जसवंत सिंह, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, बाल ठाकरे और मनमोहन सिंह के बारे में बातें कर रहा होता था. इतना कौतूहल और जुनून मैंने बाद में मेरे पारिवारिक मित्र 'भगवान' में ही देखा. जब विकिपीडिया नहीं आया था तब इन राजनेताओं के ऐसे-ऐसे किस्से लक्ष्मण मुझे सुनाता था जो आज भी गूगल पर नहीं मिलते.जब राजनेताओं का जिक्र पूरा होता तो वो सिविल सर्वेंट्स पर आ जाता. राजस्थान काडर, महाराष्ट्र काडर, यूपी काडर, दिल्ली.. कहीं के भी ऑफिसर हों. IAS, IPS, IRS, IFS सभी में, किसी न किसी के बारे में बात कर रहा होता था. कौन डीजीपी का बेटा कहां क्या कारस्तानी करते हुए पाया गया था? या ये कि कॉन्ग्रेस के कौन से नेता के छह भाई हैं और सभी के सभी सिविल सर्विसेज में हैं और किसे तीन दिन पहले ही उस नेता ने एक राज्य का मुख्य सचिव बनवा दिया है, किसे राजस्थान पुलिस में डीजीपी लगवा दिया है, और बाकी चारों को कहां कहां सेट करवाया है. वो लगातार 365 दिन ऐसे किस्से बोलता रह सकता है और कंटेंट खत्म नहीं होगा.
उसके जीवन का वो ध्येय पूरा नहीं हो पाया. घर पर एक हादसा हुआ और उसे दिल्ली छोड़ चूहों वाली माता के मंदिर के पास अपने घर लौटना पड़ा. कभी देशनोक घूमने जाएं तो मिलिएगा, चौंका देगा. रेत में एक ऊंट ऐसा भी मिलेगा जो जीके की जुगाली कर रहा होगा और उसे पता भी न होगा.
सरफरोश के एसीपी अजय सिंह राठौड़ को ले लीजिए या राउडी राठौड़ के डीआईजी विक्रम राठौड़ को, लोग क्रेज़ी हैं इन पात्रों को लेकर, तो इसलिए क्योंकि ये नीली बत्ती वाले हैं. अगर इनकी जगह कॉन्सटेबल अजय राठौड़ होता या क्लर्क विक्रम राठौड़ तो लोग इतने दीवाने नहीं होते. जिस दिन चुनाव के नतीजे आने होते हैं उस दिन सब न्यूज़ चैनल वाले और पप्पा लोग और अब हम लोग सुबह 5 बजे ऐसे उठते हैं जैसे 15 अगस्त, 26 जनवरी के दौरान स्कूल की प्रार्थना में जाने के लिए सुबह 4 बजे हम उठते थे.नीली बत्ती और लाल बत्ती को लेकर हमारी ग्रंथियों में एक अलग ही प्रतिक्रिया बनी हुई है जो उत्साह भरी होती है. उतना ही बड़ा transition उन ऑफिसर्स के लिए होता है जो प्रशासनिक सेवाओं में रहने के बाद राजनीति में उतरते हैं. पहले वे अपने इलाके के नेताओं, मंत्रियों की जनसुनवाइयों में धैर्य के साथ खरी-खरी सुनते हैं और अपने काम में जुटे रहते हैं. सैद्धांतिक रूप से ज्यादा ज्ञान होते हुए भी. इस दौरान भारी उधेड़बुन से भी गुजरते होंगे कि "जाने किस-किस के आगे हाथ बांधकर खड़ा रहने पड़ता है. मैं आईपीएस, आईएएस और ये मंत्री दसवीं पास!!" लेकिन तब क्या हो जब वही अधिकारी चुनाव के जरिए राजनीति में आए. जनता की सेवा की श्रेष्ठतम अवस्था में.
आजादी के बाद के ऐसे कुछ चर्चित चेहरों से हम आपका परिचय करवा चुके हैं.
UPSC क्रैक करके राजनीति में आए ये 'बाबू' लोग
UPSC क्रैक करके राजनीति में आए ये 'बाबू' लोग-2
केंद्र सरकार ने आज अपने मंत्रीमंडल में विस्तार किया है. 19 नए मंत्रियों को शामिल किया गया है. राष्ट्रपति ने उन्हें शपथ दिलवाई है. इनमें बीकानेर लोकसभा सीट से सांसद अर्जुनराम मेघवाल भी थे. ये पहली बार हुआ है कि बीकानेर सीट से निर्वाचित कोई सांसद मंत्री बना है. वे राज्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए साइकल पर पहुंचे. मौजूदा सरकार के सबसे क्लीन चेहरों में हैं (हालांकि सिविल सर्वेंट के तौर पर कार्यकाल 100 परसेंट क्लीन भी नहीं बताया जाता) और वे भी नीली बत्ती से लाल बत्ती तक का पुल पारकर आए लोगों में से हैं.
आज राज्यमंत्री बनने वालों में सीआर (छोटू राम) चौधरी भी रहे जो राजस्थान से हैं. नागौर से पहली बार सांसद बने हैं. उसी नागौर से जहां का आनंदपाल सिंह केस आपके सुनने में बार-बार आ रहा होगा. छोटू राम पहले बाड़मेर और अजमेर में व्याख्याता थे और बाद में RAS यानी राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं में आए. सांवरलाल जाट को हटाने के बाद उन्हें ही जाट चेहरे के तौर पर मंत्रीमंडल में लिया गया है. उनके करियर पर नजर रखने वाले बताते हैं कि उनकी छवि क्लीन नहीं रही है. वे RPSC के चेयरमैन भी रह चुके हैं. उनके खिलाफ कभी जांच भी बैठी थी जिसे वसुंधरा राजे ने कथित तौर पर दबा दिया था.
राजस्थान के ही पाली से सांसद पीपी चौधरी को भी राज्यमंत्री बनाया गया है. वे हाई कोर्ट में वकील रहे हैं. दो साल में उन्होंने रिकॉर्ड 398 सवाल पूछे हैं और उन्हें सांसद रत्न सम्मान मिल चुका है। चौधरी लाभ के पद पर गठित संयुक्त संसदीय कमेटी के प्रमुख हैं।
फिलहाल पार्टी में अर्जुन मेघवाल ही ऐसे हैं जिनका कद निरंतर रूप से बढ़ा है. अभी लोकसभा में वे भाजपा के मुख्य सचेतक भी हैं. 2013 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद चुना गया. संसद में पार्टी के प्रमुख लोगों में वे नजर आते हैं.मौजूदा सरकार में दो और पूर्व-प्रशासनिक अधिकारी हैं जिन्हें सरकार में बड़ा रोल नहीं दिया जा रहा है. इनमें पहले हैं बिहार के आरा से सांसद आर. के. सिंह. वे 1975 बैच के बिहार काडर के IAS रहे. देश के गृह सचिव रहे. उनका प्रोफाइल बहुत भारी है लेकिन सरकार में कोई ऐसी भूमिका नहीं है. मुंबई काडर में 1980 बैच के IPS रहे सत्य पाल सिंह भी बीजेपी सांसद हैं यू.पी. के बागपत से लेकिन उन्हें भी सरकार ने कोई खास जिम्मेदारी नहीं दी है.
मेघवाल बीकानेर के पास बने छोटे से गांव किशमीदेसर के रहने वाले हैं. 65 साल के हैं. जन्म बुनकरों के परिवार में हुआ. बहुत गरीबी में. पिता का नाम राम मेघवाल लाखू और मां का हीरा देवी. खुद भी बुनकर का काम बचपन से किया. गांव के स्कूल से पढ़ाई शुरू की. 8वीं कक्षा में थे तब शादी पाना देवी से कर दी गई. गांव नाल बड़ी में. उसी नाल में जहां बीकानेर का हवाई अड्डा चालू नहीं हो पा रहा है. हालांकि मेघवाल अपने फेसबुक अकाउंट पर नागरिक उड्डयन मंत्रियों और अन्य लोगों के साथ फोटो डालते रहते हैं कि उनसे इस सिलसिले में आश्वासन पाया है. अभी तो इंतजार ही है. खैर, शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ाई चालू रखी. बीकानेर के डूंगर कॉलेज से बीए, एलएलबी, एमए किया. भारतीय डाक और टेलीग्राफ विभाग में फिर टेलीफोन ऑपरेटर का काम किया. टेलीफोन ट्रैफिक में महासचिव के पद के लिए चुनाव लड़ा और जीते. फिर RAS बने. राजस्थान के उप मुख्यमंत्री के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी भी बने. फिर प्रमोट होकर IAS बने. बीकानेर के चुरू जिले के कलेक्टर बने. 2009 में बीकानेर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और पहली बार में ही जीत गए. 2014 में दूसरी बार सांसद बने.पहली बार सांसद बनने के बाद से लोगों में उनका फीडबैक अच्छा है. बीकानेर या राजस्थान से लोग जाते हैं तो आमतौर पर वे सभी से मिलते हैं. हर वक्त सफेद कुर्ता-पायजामा और राजस्थानी साफा पहनते हैं. संसद में गंभीर सवाल पूछते हैं और काफी सवाल पूछते हैं. संसद तक साइकल से आते हैं. मृदुभाषी बताए जाते हैं. उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं.
उनका एक बेटा अभी चर्चा में रहा. अच्छी वजहों से नहीं. हाल ही में श्रीगंगानगर जिले की मंडी में अंबेडकर जयंती के मौके पर एक जन प्रतिनिधि सम्मान समारोह का आयोजन किया गया. आयोजकों ने मेघवाल को बुलाया था. लेकिन वे नहीं आए. उनकी जगह उनका बेटा पहुंचा. वो भी लाल बत्ती की गाड़ी में. तब मेघवाल पश्चिम बंगाल में पार्टी के चुनाव प्रचार में गए थे. उनके पुत्र लाल बत्ती की गाड़ी में तो आए ही, साथ ही पिता के सांसद कोटे से पंचायत के विकास के लिए 15 लाख की घोषणा भी कर दी.

इलाहाबाद में पार्टी के आयोजन में अर्जुन राम, लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली.
अर्जुन मेघवाल की कहानी के बहुत से अध्याय, और प्रमुख अध्याय अभी बनने बाकी हैं. अभी वे दिल्ली में अपनी स्थिति मजबूत करते चल रहे हैं क्योंकि अंतिम तौर पर फैसले वहीं से होने हैं. राजस्थान और बीकानेर के स्तर पर उनकी पार्टी के लोगों से बहुत बनती नहीं है. जैसे बीजेपी के कई बार विधायक रहे कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी और उनका तालमेल बिलकुल नहीं बैठता है. एक समय मेघवाल उनके आगे कुछ नहीं थे, आज भाटी बहुत बौने हो चुके हैं. बीकानेर से विधायक सिद्धिकुमारी की ग्रोथ पार्टी में कथित तौर पर मेघवाल के कारण रुकी है. आने वाले कुछ वर्षों में बीजेपी के लिए राजस्थान में मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार मेघवाल हो सकते हैं. वे अपनी छवि वैसी ही बना रहे हैं. राजस्थान और बीकानेर के मुद्दों को वे संसद में रखते हैं. ये और बात है कि अब तक वे बीकानेर को न तो कोई यूनिवर्सिटी दिलवा पाए हैं, न यहां हवाई अड्डा चालू करवा पाए हैं. वो भी इस परिस्थिति में कि ये उनका दूसरा टर्म है और केंद्र में पूरी मेजोरिटी के साथ बीजेपी की सरकार है. प्रशासनिक अधिकारी से नेता बनने के बाद उनकी पहली प्रमुख शुरुआत आज हुई है.





















