ये जो सैटेलाईट फोन से कॉल किया जाता है, उसका खर्चा कौन देता है? वही सैनिक. अब चाहे वो जंगल में हो बियाबान में हो, बर्फ में खपे, रेत में धंसे. उसे नेटवर्क तो मिलता नहीं. फौज की प्राइवेसी अलग, तो प्राइवेट कंपनी की हेल्प भी नहीं ली जा सकती. आपके जैसे वो सिम पोर्ट नहीं करा सकते.संदेशे आते हैं का ज़माना जब गया और फोन हर हाथ आया तो सरकार ने सब्सिडी देकर बीएसएनएल की डीएसपीटी यानी डिजिटल सैटेलाईट फोन टर्मिनल शुरू की. अभी देश भर में इंटरनेशनल बॉर्डर के साथ ऐसी जगह जहां मोबाइल नेटवर्क नही हैं, वहां 400 डीएसपीटी सेट लगे हैं, जिसमें अकेले जैसलमेर सीमा पर 100 से ज्यादा डीएसपीटी सेट लगे हुए हैं. पहले रेट ठीक थे. फिर वो दिन आया. अप्रैल 2016. बीएसएनएल ने कहा कि अब सब्सिडी का टाइम खत्म हो गया. बीएसएनएल को बुत घाटा लग रहा है, इसलिए कॉल चार्ज बढ़ाए गए हैं. बीएसएफ के डीआईजी ने रिक्वेस्ट की. सैनिकों ने बॉर्डर पर पहुंचे गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी अपना दुःख बताया मगर अब तक कुछ नहीं हुआ.
भारत माता की जय










