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तीन राज्यों में बीजेपी की जीत के बाद EVM पर सवाल कौन उठा रहा है?

तीन राज्यों में चुनाव हारने के बाद बड़े नेताओं ने हार को स्वीकार किया है. लेकिन दूसरे नेता EVM पर शक जता रहे हैं. ये कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा हो रहा है. जो पार्टी चुनाव हारती है उसे ईवीएम पर शक हो जाता है. बैलेट पेपर पर वापस जाने की मांग उठ जाती है.

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पीएम मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने तीन राज्यों में जीत हासिल की है.

सबसे पहले बात उन नेताओं की, जो ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं. तीन राज्यों में चुनाव हारने के बाद बड़े नेताओं ने हार को स्वीकार किया है. लेकिन दूसरे नेता EVM पर शक जता रहे हैं. ये कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा हो रहा है. जो पार्टी चुनाव हारती है उसे ईवीएम पर शक हो जाता है. बैलेट पेपर पर वापस जाने की मांग उठ जाती है. साल 2009 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मांग की कि चुनाव पुरानी पद्दति से कराए जाएं. माने बैलेट पेपर से. 2009 वो साल था, जब भाजपा लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव हारी थी. अगले साल भाजपा ने एक पूरी किताब ही लॉन्च कर दी. इस किताब का नाम था Democracy At Risk! Can We Trust Our Electronic Voting Machines?. हिंदी में नाम हुआ - 'लोकतंत्र खतरे में. क्या हम EVM पर भरोसा कर सकते हैं.' इस किताब को लिखा था भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने. और लॉन्च किया था तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने.

2014 में प्रचंड जीत के बाद भाजपा केंद्र की सत्ता में आ गई. इसके बाद पार्टी ने ईवीएम पर कभी सवाल नहीं उठाया. अब दूसरी पार्टियां ईवीएम पर सवाल खड़ी करती हैं. 3 दिसंबर को चार राज्यों के परिणाम आने के बाद कांग्रेस नेता डॉ उदित राज ने कहा कि ज़रूर ईवीएम में कुछ हुआ है वर्ना ऐसे नतीजे की उम्मीद नही थी. फिर इसी तरह समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव का बयान आया. अखिलेश कह रहे हैं कि अगर अमेरिका और जापान में बैलट पेपर की व्यवस्था है, तो हमें भी वही अपनाना चाहिए.

EVM में हेरफेर को लेकर आजतक कोई प्रमाण हमारे सामने नहीं आया है. न ही सरकार के सामने और न ही चुनाव आयोग के पास. साल 2017 के जून में केंद्रीय चुनाव आयोग ने सभी राजनैतिक दलों को खुला न्योता दिया. कहा कि चाहें तो हमारे पास आकर बताएं कि ईवीएम में छेड़छाड़ कैसे होती है. उसी साल अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा कि हमने हैकिंग के डेमो के लिए न्योता दिया था. लेकिन कोई दल आया ही नहीं. EVM पर सवाल उठा रहे दलों में से कई INDIA अलायंस का हिस्सा हैं. आज इस अलायंस को लेकर भी एक खबर आ गई.

6 दिसंबर को दिल्ली में INDIA अलायंस की बैठक होने वाली है. ये बैठक बुलाई है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने. लेकिन मीटिंग से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि उन्हें इस बैठक के बारे में जानकारी नहीं है. पार्टी के सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि ममता बनर्जी का 6 दिसंबर को पहले कार्यक्रम तय है, ऐसे में वो बैठक में शामिल नहीं होंगी. वहीं, जेडीयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने आरोप लगाया कि इन चुनावों में विपक्ष के तौर पर इंडिया गठबंधन कहीं था हीं नहीं.

तो INDIA अलायंस आपस में जूझ रहा है. दूसरी तरफ भाजपा चुनावी जीत के बाद संसद सत्र वाले मोड में गेयर शिफ्ट कर चुकी है. आज सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री ने संसद के बाहर एक बयान जारी किया. उन्होंने विपक्ष को सलाह दी कि वो सकारात्मकता के साथ आगे बढ़े और सरकार के खिलाफ अपनी नकारात्मक विचारों से बचे. ये भी कहा कि हार का गुस्सा सदन के भीतर न दिखाएं.

संसद सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री का ये रस्मी संबोधन था. लेकिन इसमें सांसदों के लिए एक मेसेज भी था. वो ये कि संसद को चलने दिया जाए. आज से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया है. हम सभी जानते हैं कि आम तौर पर एक कैलेंडर वर्ष में संसद के तीन सत्र होते हैं. पहला बजट सत्र. जो फरवरी की शुरुआत से लेकर अप्रैल तक चलता है. दो हिस्सों में बांटकर. पहले हिस्से में बजट पेश किया जाता है, उस पर बहस होती है, दोनों सदनों में बजट पास होता है. उसके बाद एक महीने के लिए सेशन को स्थगित कर दिया जाता है. इस एक महीने में संसद की स्थायी समिति अलग-अलग कामों के लिए मांगे गए खर्च का आंकलन करती है. एक महीने बाद फिर से बजट सत्र की बैठक होती है.

दूसरा मानसून सत्र, जो जुलाई से अगस्त के बीच होता है. और तीसरा शीतकालीन सत्र, जो आम तौर पर दिसंबर महीने में ही चलता है. लेकिन संविधान में एक 'विशेष सत्र' को बुलाने की भी व्यवस्था है. जिसका इस्तेमाल सरकार ने इसी साल सितंबर में किया था. इसी विशेष सत्र में सालों से लटके महिला आरक्षण बिल को पारित किया गया.

सामान्य ज्ञान खत्म. वापस मुद्दे पर आते हैं. शीतकालीन सत्र के पहले दिन आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के निलंबन को खत्म कर दिया गया. मानसून सत्र के दौरान 11 अगस्त को उन्हें सदन से निलंबित कर दिया गया था. कहा गया था कि विशेषाधिकार समिति की जांच रिपोर्ट आने तक वो सदन से निलंबित रहेंगे. 7 अगस्त को दिल्ली सर्विसेज़ बिल से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राघव चड्ढा पर पांच सांसदों के फर्जी हस्ताक्षर का आरोप लगा था. इसके बाद उन्हें निलंबन का सामना करना पड़ा था. आज बीजेपी सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद उनका निलंबन रद्द हुआ. निलंबन रद्द होने के बाद राघव चड्ढा ने किसका शुक्रिया अदा किया.

अब इस सत्र के महत्वपूर्ण कामकाजों पर आते हैं. ये सत्र 22 दिसंबर तक चलने वाला है. कुल 15 बैठकें होंगी. और इस दौरान कुल 17 बिल पर चर्चा हो सकती है. इनमें से 12 विधेयक पुराने हैं, जिस पर चर्चा होनी है और उन्हें पारित कराना है. साथ ही 7 नए विधेयक पेश किए जाएंगे, जिस पर चर्चा होगी. आप स्क्रीन पर उन सभी विधेयकों की सूची देख सकते हैं.  

और वो क्यों लाए जा रहे हैं ये भी. इनमें से कुछ के बारे में हम पहले आपको बता चुके हैं. मसलन, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, शर्तें और पद अवधि) विधेयक, 2023'. इस पर हमने 15 सितंबर के दी लल्लनटॉप शो में विस्तार से बात की थी.

संसद में आज जो बिल पेश किए गए हैं. हम उसके बारे में आपको बताते हैं. सरकार आपराधिक कानूनों में बड़ा बदलाव करने जा रही है. आज तक हम जो IPC और CRPC पढ़ते थे, वो बदल रहा है. मानसून सत्र के आखिरी दिन सरकार ने इससे जुड़े तीन विधेयक पेश किया था. इन्हें बाद में गृह मंत्रालय की स्टैंडिंग कमिटी को भेज दिया गया. आज लोकसभा में स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट भी पेश की गई.

ये बिल हैं-
1.भारतीय न्याय संहिता, 2023 (IPC-1860 में बदलाव के लिए)
2. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (CrPC 1898 में बदलाव के लिए)
3. भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 (इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 में बदलाव के लिए)

जब पहली बार इस बिल को लाया गया था तब गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि अंग्रेजों के पुराने कानूनों का उद्देश्य दंड देने का था, न्याय देने का नहीं, इसलिए इनमें बदलाव किया जा रहा है. क्या बदलाव होंगे? IPC में बड़े स्तर पर बदलाव होने वाले हैं.  IPC में पहले 511 धाराएं थीं. अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में सिर्फ 356 धाराएं होंगी. 175 धाराओं में बदलाव हुआ है, 8 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 22 धाराओं को खत्म कर दिया गया है. इसके अलावा पुराने कानूनों में कई ब्रिटिश शब्दावली हैं, जैसे लंदन गैजेट, कॉमनवेल्थ प्रस्ताव, ब्रिटिश क्राउन. सरकार का कहना है कि 475 जगहों से ऐसे शब्दों को खत्म किया गया है.

इसी तरह, CrPC में बदलाव कर जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 बनेगी, उसमें अब 533 धाराएं बचेंगी, 160 धाराओं को बदल दिया गया है. बिल में 9 नई धाराएं जोड़ी गई हैं और 9 धाराओं को खत्म किया गया है. वहीं भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023 में 170 धाराएं होंगी. पहले इंडियन एविडेंस एक्ट में 167 धाराएं थी. इसके लिए 23 धाराओं में बदलाव किया गया. एक नई धारा जोड़ी गई है और 5 धाराएं निरस्त की गई हैं.

सरकार का कहना है कि इन कानूनों के तहत FIR से केस डायरी, केस डायरी से चार्जशीट और चार्जशीट से जजमेंट तक सारी प्रक्रिया को डिजिटाइज करने का प्रावधान है. ताकि कागजों का ढेर न बने. इसके अलावा सर्च और जब्ती के दौरान वीडियोग्राफी को अनिवार्य कर दिया गया है. पुलिस बिना रिकॉर्डिंग के अगर चार्जशीट फाइल करेगी, तो वो मान्य नहीं होगा.

कानूनों में प्रस्तावित बदलाव की कुछ अहम बातें जान लीजिये....

1. जिन मामलों में सात साल या उससे ज्यादा की सजा है, वैसे केस में क्राइम सीन पर फॉरेंसिक टीम का जाना अनिवार्य होगा.

2. यौन हिंसा में पीड़िता का बयान और बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य.

3. 7 साल से अधिक की सजा वाले केस को खत्म करना है तो पीड़ित को सुने बगैर केस वापस नहीं होगा.

4. किसी भी मामले में 90 दिन के भीतर चार्जशीट फाइल करनी पड़ेगी. कोर्ट की मंजूरी से और 90 दिन का समय मिल सकता है.

5. किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद एक महीने के भीतर कोर्ट को फैसला सुनाना होगा. 7 दिन के भीतर उस फैसले को ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा.

6. पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ट्रायल चलाने का फैसला सरकार को 120 दिन में करना होगा.

7. मॉब लिंचिंग के मामले में दोषियों को 7 साल की सजा, आजीवन कारावास या मौत की सजा भी हो सकती है.

8. गैंगरेप के सभी मामलों में 20 साल की सजा या आजीवन कारावास की सजा. 18 साल से कम उम्र की लड़की के मामले में मौत की सजा का प्रावधान. हालांकि मैरिटल रेप को लेकर कानून में कोई प्रावधान नहीं है.

9. बच्चों के साथ अपराध पर सजा को 7 साल से बढ़ाकर 10 साल किया गया.

10. सजा माफी में बदलाव का प्रावधान. मौत की सजा को आजीवन कारावास में ही बदल सकते हैं, आजीवन कारावास की सजा को 7 साल की सजा तक, और 7 साल की सजा को 3 साल तक की सजा तक ही माफ कर सकते हैं.

11. भगोड़ों की अनुपस्थिति में भी ट्रायल होगा और उन्हें सजा सुनाई जाएगी.

इसके अलावा सरकार का दावा है कि वो राजद्रोह को खत्म करने वाली है. राजद्रोह की प्रासंगिकता को लेकर देश में खूब विवाद हो चुके हैं.  इसकी वैधानिकता का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है. हालांकि IPC की धारा-124 (a) में राजद्रोह की जो परिभाषा दर्ज है, करीब-करीब उसी तरह की परिभाषा भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रस्तावित क्लॉज 150 में भी दी गई है. कह सकते हैं कि सिर्फ शब्द 'राजद्रोह' हटाया गया है. इस क्लॉज के तहत जो नई परिभाषा है.... “अगर कोई जानबूझकर या सुनियोजित, बोलकर, लिखकर, संकेत, ऑनलाइन, वित्तीय साधन के जरिये, अलगाव या सशस्त्र विद्रोह में शामिल होता है या इसे बढ़ावा देता है और भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालता है या ऐसे अपराध में शामिल होता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा होगी.”

IPC की धारा-124 (a) भी इसी तरीके से परिभाषित है. 12 नवंबर को स्टैंडिग कमिटी ने इन कानूनों को लेकर अपनी रिपोर्ट राज्यसभा के सभापति और लोकसभा स्पीकर को भेजा था. कई सिफारिशें की गई थी. जैसे कमिटी ने कहा कि लापरवाही से मौत के मामले में सात साल जेल की सजा का प्रावधान काफी ज्यादा है, इसे घटाकर पांच साल किया जाना चाहिए. कमिटी के विपक्षी सांसदों ने असहमति का नोट दिया और कहा कि ये मोटे तौर पर पुराने कानूनों का ही कॉपी पेस्ट है. कुछ सांसदों ने हिंदी नामों को लेकर भी आपत्ति जताई.

इसके अलावा आज लोकसभा में एडवोकेट्स अमेंडमेंट बिल (2023) पर चर्चा हुई. एक अगस्त को सबसे पहले ये बिल राज्यसभा में पेश किया गया था. क्या है इस बिल का उद्देश्य? तब कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा था कि अदालतों में ऐसे लोग होते हैं, जो जजों को, वकीलों और मुवक्किलों को प्रभावित करने का काम करते हैं. इनसे सावधान रहने की जरूरत है. कानूनी भाषा में ऐसे लोगों को टाउट्स कहा जाता है. फौरी अनुवाद होगा दलाल. ये लोग वकीलों, जजों और मुवक्किलों के बीच काम करके अपने पैसे बनाते हैं.

इस बिल के पास होने के बाद हाई कोर्ट जज से लेकर जिला मजिस्ट्रेट, कलेक्टर तक के अधिकारी ऐसे दलालों की लिस्ट बनाकर छाप सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति पर दलाली का संदेह है, तो उसकी जांच का भी आदेश दे सकते हैं. आरोपी को अपनी बात रखने का मौका दिया जाएगा, साथ ही दोष साबित हो गया तो 3 साल की कैद, 500 रुपये का जुर्माना या दोनों भरना पड़ सकता है.

इस बिल को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एडवोकेट मो. कुमैल हैदर कहते हैं कि हमारे समाज की न्यायपालिका में सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि टाउटिंग की प्रैक्टिस बहुत ज्यादा है. इसका मतलब है कि दलाली बहुत आम है. क्लाइंट को जबरदस्ती लीगल प्रोसीजर में खींचने की कोशिश की जाती है. इस विधेयक का मकसद ये है कि जो दलाल हैं, चाहे वो जिस रूप में भी हों, उनकी एक लिस्ट तैयार की जा सके. उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया जा सके. ताकि वो एक्सप्लेन करें कि वो क्यों टाउट्स नहीं कहलाए जाएं या दलाल न कहलाए जाएं. फिर उस लिस्ट में समय-समय पर फेर-बदल किया जाए, ताकि इस तरीके से दलाली को रोका जा सके.

तीसरा विधेयक है, द सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2023. ये बिल तेलंगाना में सेंट्रल ट्राइबल यूनिवर्सिटी बनाने के लिए लाया गया है. इसके लिए यूनिवर्सिटीज एक्ट, 2009 में बदलाव किया जाएगा. तेलंगाना के मुलुगु में सम्मक्का सरक्का केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना होगी. इसके लिए 889 करोड़ रुपये खर्च होंगे.

इसके अलावा राज्यसभा में द पोस्ट ऑफिस बिल, 2023 पारित हो गया. इससे डाकघर से जुड़े नियमों में बदलाव होंगे. साथ ही भारतीय डाकघर अधिनियम, 1898 खत्म होगा. बिल की जरूरी बातें जान लीजिये. अगर डाक अधिकारियों को शक होता है कि किसी पार्सल या किसी डाक में ड्यूटी नहीं अदा की गई है, या वो कानून द्वारा प्रतिबंधित है, तो अधिकारी उस पार्सल को कस्टम अधिकारी को भेज देगा. कस्टम अधिकारी उस पार्सल से कानून के मुताबिक निबटेगा.

केंद्र सरकार अधिकारी की नियुक्ति करेगी. उस अधिकारी को अगर लगता है कि कोई पार्सल राष्ट्र की सुरक्षा के खिलाफ है, किसी दूसरे देश से संबंधों में चोट पहुंचा सकता है,  या शांति में बाधा पहुंचा सकता है, तो वो अधिकारी उस पार्सल को रोक सकता है, खोलकर चेक कर सकता है और चाहे जब्त कर सकता है. बाद में ऐसे सामान को नष्ट भी किया जा सकेगा.

अक्सर होता है कि हम लोगों के पार्सल खो जाते हैं या देर से आते हैं या डैमेज हो जाते हैं. मन करता है कि डाक अधिकारी के खिलाफ केस कर दें. लेकिन ऐसा कर नहीं पाएंगे क्योंकि नए कानून में ऐसा प्रावधान बनाया गया कि ऐसी स्थितियों में डाक अधिकारियों पर केस नहीं किया जा सकेगा. इसके अलावा पोस्ट ऑफिस के पास डाक टिकट जारी करने का अधिकार होगा.

संसद सत्र पर हमारी नज़र बनी रहेगी. और आप अगर इसकी बारीक जानकारियों में दिलचस्पी लेते हैं, तो हमारा खास कार्यक्रम संसद में आज देखना न भूलें.

अब रुख करते हैं मिजोरम का. सुंदर पहाड़ी सूबा. भारत के मॉडल राज्यों में से एक. साक्षरता दर में केरल और लक्षदीप के बाद तीसरे नंबर पर आता है.

आज यहां विधानसभा चुनाव के परिणाम जारी हुए, जिसमें मुख्यमंत्री ज़ोरमथंगा की मिज़ो नेशनल फ्रंट सरकार गिर गई. अपनी सीट भी न बचा पाने वाले जोरमथंगा ने बिना देर किये इस्तीफा दे दिया है. उनकी जगह लेंगे लालदूहोमा, जिनकी पार्टी ज़ोरम पीपल्स मूवमेंट ZPM को दो तिहाई बहुमत मिला है. ये पार्टी सूबे की 40 सीटों में से 27 पर जीती है.

ये सब 3 दिसंबर को ही हो जाना था, जब राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के आए. लेकिन मिज़ोरम में गिनती को एक दिन आगे बढ़ाया गया. दरअसल 3 दिसंबर था रविवार और मिज़ोरम की 87 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ईसाई धर्म को मानती है. रविवार के दिन ईसाई धर्म में चर्च सर्विस की जाती है. इसीलिए मिज़ोरम के प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिख मतगणना की तारीख बदलने का आग्रह किया था. जिसके बाद तिथि बदली और काउंटिंग के लिए 4 दिसंबर का दिन मुकर्रर हुआ.

आइए अब नतीजों पर गौर करें -

- ZPM (Zoram People’s Movement) ने 27 सीटें जीतीं
- सत्ताधारी Mizo National Front (MNF)- 10 सीटों पर सिमट गई
- BJP 2 सीटों पर जीती
- कांग्रेस - महज 1 सीट जीती

अब इन पार्टियों का वोट शेयर देखिये -

-Zoram People’s Movement को 37.86 फीसदी वोट मिले
- Mizo National Front को 35.10 फीसदी
- कांग्रेस को 20.82 फीसदी
- बीजेपी को 5.06 फीसदी
और आम आदमी पार्टी को 0.09 फीसदी वोट मिले हैं

इस वोट शेयर के मायने आपको तब और अच्छे से समझ आएंगे, जब आप ये जानेंगे कि कौन कितनी सीटों पर लड़ा था. दरअसल मिज़ोरम की स्थानीय राजनीति राष्ट्रीय स्तर के राजनैतिक दलों की लाइन से कुछ अलग लीक पर चलती है. ऐसे में पार्टियां ये देखती हैं कि उन्हें चुनाव में उतरना है, तो कितना. अब इस संदर्भ के साथ सीटों की संख्या सुनिये -

-MNF, ZPM और कांग्रेस 40 सीटों पर लड़े. माने पूरे सूबे में.
- BJP 23 सीटों पर लड़ी.
- आम आदमी पार्टी 4 सीटों पर लड़ी.

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और भाजपा के लिए मिज़ोरम में मौके सीमित थे. इस लिहाज़ से सबसे खराब प्रदर्शन कांग्रेस का रहा, जो सारी सीटें लड़कर भी एक ही सीट निकाल पाई. भाजपा को दो ही सीटें मिलीं, लेकिन पार्टी इन नतीजों से खास नाखुश होगी, ऐसा लगता नहीं. क्योंकि मुख्य मुकाबला वैसे भी ZPM और सत्ताधारी MNF के बीच था. ऐसे में जो मिला, वो बोनस समझा जाएगा. तब बचते हैं दो किरदार - MNF और ZPM.पहले MNF की बात करते हैं.

हाल में एक फिल्म आई है सैम बहादुर. इसमें एक ऐतिहासिक घटना पर कुछ सीन्स हैं. जब तत्कालीन असम के लुशाई हिल्स इलाके में सशस्त्र विद्रोह उठ खड़ा हुआ था. यही इलाका आगे चलकर मिज़ोरम सूबा बना. मार्च 1966 को MNF के लड़ाकों ने आइज़ॉल पर कब्ज़ा कर लिया था. तब सेना ने दखल दिया. उन दिनों सेना की पूर्वी कमान संभालते थे लेफ्टिनेंट जनरल सैम मानेकशॉ. ऑइज़ॉल में MNF  की घेराबंदी को तोड़ने के लिए ही स्ट्रेफिंग की गई थी. माने हवाई जहाज़ से गोलियां और रॉकेट चलाए गए थे.

अगले 20 साल MNF ने छापामार युद्ध लड़ा. आखिरकार राजीव गांधी के ज़माने में, साल 1986 में मिज़ो अकॉर्ड हुआ. और MNF मुख्यधारा में लौटा, उसके मुखिया लालडेंगा सीएम बने. इसी पार्टी की सरकार इन दिनों सूबे में चल रही थी. ज़ोरमथंगा सीएम थे. लेकिन वो MNF की विरासत को भुना नहीं पाए. क्योंकि करीब 6 साल पहले, 2017 में कुछ हुआ था. क्या?

- मिजोरम में 6 राजनैतिक पार्टियों ने मिलकर एक मूवमेंट ग्रुप बनाया. नाम दिया 'जोरम पीपुल्स मूवमेंट'.
- इस मूवमेंट को लीड कर रहे थे लालदुहोमा. रिटायर्ड IPS अफसर हैं. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सिक्योरिटी चीफ भी रह चुके हैं.
- 2018 के विधानसभा चुनाव में ZPM ने कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों को अपना समर्थन दिया. 40 में से 36 सीटों पर उम्मीदवार उतारे.
- सभी कैंडिडेट एक ही चुनाव चिन्ह के तले लड़े, 8 की जीत हुई
- हालांकि 2018 में MNF सबसे बड़ी पार्टी बनके उभरी और जोरामथांगा फिर से सीएम बन गए.
- लेकिन 8 प्रत्याशियों की जीत ने ZPM ग्रुप को उत्साहित कर दिया. चूंकि जीते हुए उम्मीदवार निर्दलीय थे. इसलिए ZPM के दलों ने इसे आंदोलन से अलग एक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी.
- 2019 की जनवरी में ZPM ने चुनाव आयोग में पार्टी रजिस्ट्रेशन की अर्जी दी. कुछ महीनों के बाद चुनाव आयोग से हरी झंडी मिलते ही ZPM एक राजनीतिक दल के तौर पर सामने आया.
- इसके बाद साल 2023  ZPM के लिए काफी अहम रहा. क्योंकि इसी साल लुंगलेई मुनिसिपल काउंसिल के चुनाव भी हुए. जिसमें Zoram People’s Movement ने उम्दा प्रदर्शन के बलबूते काउंसिल की 11 में से 11 सीटों पर जीत दर्ज की.

2023 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत से इस पार्टी का नाम लोगों की जुबां पर चढ़ गया है. अब सबकी निगाहें ZPM को उसके मकसद तक पहुंचाने वाले एक शख्स पर टिकी हैं. नाम है लालदुहोमा. जिनकी बात हमने कुछ देर पहले की थी. कौन हैं बताते हैं.

- इन्होंने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत IPS के तौर पर की
- दिल्ली में लालदुहोमा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सिक्योरिटी चीफ बने
- 1982 के एशियन गेम्स में ऑर्गेनाइजिंग कमेटी के सेक्रेटरी भी बने
- इंदिरा गांधी लालदुहोमा पर काफी भरोसा करती थीं, यही वजह है कि मिजोरम में जब विद्रोह भड़का तो इसमें मध्यस्थता के लिए लालदुहोमा को भेजा गया.
- मिजोरम आंदोलन को हैंडल करने में इनका काफी बड़ा रोल रहा.
-  इसके बाद लालदुहोमा दिलचस्पी राजनीति की तरफ बढ़ी. 1984 में लालदुहोमा ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए.
- 1984 में लालदुनहोमा पहली बार मिजोरम से सांसद चुने गए. वे मिजोरम में कांग्रेस के पहले सांसद बने.
-  लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. कांग्रेस छोड़ते ही उनकी संसदीय सदस्यता भी चली गई. यहां भी एक ट्र्रिविया का जन्म हुआ. क्योंकि लालदुहोमा एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत डिस्क्वॉलिफाई होने वाले देश के पहले सांसद थे.
- साल 1997 में लालदुहोमा ने एक नई पार्टी बनाई जिसको नाम दिया जोरम नेशनलिस्ट पार्टी. इस पार्टी के तले लालदुहोमा साल 2003 में रातू सीट से विधायक चुने गए.
- और अब मिजोरम की सेरछिप सीट से विधायक चुने गए हैं

ये हुआ लालदुहोमा का एक संक्षिप्त परिचय. दर्शकों ये भी बताना ज़रूरी है कि लालदुहोमा की पार्टी ZPM की तुलना अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से की जाती है. क्योंकि दोनों का इतिहास लगभग एक जैसा नजर आता है. दोनों ही पार्टियां एक आंदोलन से निकली हैं, एक नायक के इर्द-गिर्द बनी हैं.
यहां हम आपको एक बात और याद दिलाना चाहते हैं कि वोटों की गिनती से पहले हुए एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे के एग्जिट पोल में भी मिजोरम में सत्ता परिवर्तन की बात कही गई थी. ग्राउंड पर मौजूद पत्रकार भी बताते हैं कि चुनाव के दौरान ZPM को लेकर हवा पॉजिटिव नज़र आ रही थी. 
अब बात मिजोरम के उन दिग्गजों की जिनकी हार ने लोगों को अचंभित किया

- मिजोरम के मुख्यमंत्री और MNF नेता जोरमथांगा अपनी सीट नहीं बचा पाए. आईजोल ईस्ट 1 विधानसभा सीट पर ZPM के लालथनसांगा ने हार गए.
- मिजोरम के डिप्टी सीएम तावंलुइया टुईचेंग सीट पर ZPM के चुआनावमा से हार गए हैं.
- मिजोरम कांग्रेस के अध्यक्ष लालसावता को आईजोल वेस्ट -3 सीट पर ZPM के  ZAITHANZAMA से शिकस्त मिली है
- मिजोरम बीजेपी के अध्यक्ष वनलालमुआका डाम्पा सीट पर चुनाव हार गए हैं. साल 2018 के चुनाव में ये इकलौती सीट बीजेपी के खाते में आई थी.

नतीजों के बाद ZPM उत्साहित है. भाजपा की ओर से अध्यक्ष वनलालमुआका ने कहा है कि नतीजे अप्रत्याशित रहे और पार्टी आत्मचिंतन करेगी.