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वो मस्जिद का पैरोकार था, उसके जनाज़े में मंदिर वाले आंसू बहा रहे थे

नहीं रहे बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी. जनाज़े में उमड़ी भीड़. राम मंदिर के पक्षकार साधु-संत भी पहुंचे.

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फोटो - thelallantop
होनी को कौन टाल सकता है, ये बात कभी अम्मी से सुनी तो कभी किसी बुजुर्ग से. इस होनी को आज यही मंजूर था कि हाशिम अंसारी इस दुनिया में नहीं रहे. बाबरी मस्जिद के सबसे पहले मुद्दई. 60 साल तक थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ने वाले. राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों से चिढ़ने वाले.
हाशिम अंसारी जो सारी ज़िंदगी अयोध्या में बाबरी के हक के लिए लड़े, उनका जनाज़ा उठा तो उसमें साधुओं ने भी शिरकत की. ये है हिंदुस्तानी तहजीब. हाशिम अयोध्या में मंदिर और मस्जिद दोनों ही देखना चाहते थे, मगर अपनी आंखों से इसे देखने की खुशनसीबी उनके हिस्से नहीं आई. काफी वक्त से बीमार थे, उम्र का भी तकाजा था. 96 साल की उम्र में ये बुजुर्ग मंदिर-मस्जिद की हसरत लिए इस दुनिया से कूच कर गया.
हाशिम अंसारी की मौत की खबर सुनकर आचार्य सत्येंद्र दास ओर आचार्य ज्ञान दास घर ही पहुंच गए उनकी आंखों में आंसू थे.
हाशिम अंसारी की मौत की खबर सुनकर आचार्य सत्येंद्र दास ओर आचार्य ज्ञान दास उनके घर पहुंचे. उनकी आंखों में आंसू थे.

जब हाशिम का जनाजा उठा तो उसकी शान अलग ही थी. सर पर टोपी लगाए लोगों की भीड़ थी तो गेरुए पहनावे वाले भी कम नहीं थे. मुसलमानों के जनाजे में साधुओं को देखना एक दुर्लभ मौका है. मैंने अब से पहले नहीं देखा था. ये सिर्फ अवध की मिट्टी का असर नजर आता है.
दंगो को भड़काने वालों को सबक है ये. एक बुजुर्ग का जनाज़ा और उसमें साधु-संतों की मौजूदगी. आंखें नाम थीं. इसकी वजह यही थी कि हाशिम अंसारी ने कभी मंदिर-मस्जिद के झगड़े और निजी दोस्ती का कोई घालमेल नहीं किया. वो कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. जब-जब उन्हें हिन्दुओं ने दावत पर बुलाया तो हमेशा शरीक रहे.
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झगड़े की जमीन के दावेदारों में निर्मोही अखाड़े के रामकेवल दास और दिगम्बर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्र दास से हाशिम की मरते दम तक गहरी दोस्ती रही. परमहंस और हाशिम तो एक ही सवारी से मुकदमें की पैरवी के लिए साथ-साथ अदालत तक जाते थे. इस दौरान नाश्ता-खाना भी साथ ही करते थे.
रामकेवल दास और परमहंस रामचंद्र दास के दुनिया में न रहने के बाद हाशिम ने हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञान दास से मिलकर दोस्ती की रस्म आगे बढ़ाई और सुलह-समझौते की कोशिशों को कायम रखा. इसीलिए बुधवार को ज्ञान दास के अलावा राम मंदिर से जुड़े पक्षकार और समर्थक संगठनों के पदाधिकारी उनके घर पहुंच गए. सबकी जुबान पर बस यही अल्फाज थे कि हाशिम तो कभी हमारे खिलाफ लगे ही नहीं.
हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास कहते हैं, 'पहले अक्सर अपने बेटे इकबाल के साथ हाशिम हमारे पास आया करते थे और राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का जिक्र करते रहते थे. हम दोनों चाहते थे जीते जी इस मसले का समाधान निकल आए. अभी ईद के दिन कह रहे थे कि अपने उत्तराधिकारी इकबाल को आपको सौंप रहा हूं. हम हमेशा इकबाल का ध्यान रखेंगे.'
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अयोध्या केस से जुड़े वकील विरामनराम लाला हाशिम अंसारी और रामचन्द्र परमहंस की दोस्ती याद करते हैं और कहते हैं, 'हाशिम बहुत ही भले इंसान थे. रामचंद्र परमहंस ने 1951 में मुकदमा दायर किया था. उनसे हाशिम के ऐसे ताल्लुकात थे कि सुबह-शाम साथ बैठना. मुक़दमे की पैरवी के लिए साथ जाना दोनों की आदत में शुमार था.
1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक़ लिए मुकदमा किया. मुकदमा करने वालों में 9 मुस्लिम थे. जिनमें से हाशिम अंसारी भी मुद्दई बने. इन 9 में वो अकेले ही बचे थे. कानून के जानकारों का कहना है कि इससे मुक़दमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

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