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सरहद पर जवान खड़े तो हैं लेकिन क्यों खरीद रहे हैं डुप्लीकेट मेडल?

2008 से चल रही है ये शिकायत.

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फोटो - thelallantop
नए आर्मी चीफ आ चुके हैं. जनरल बिपिन रावत. आते ही उन्होंने बताया कि इंडियन आर्मी ज़रुरत पड़ने पर शक्ति-प्रदर्शन से पीछे नहीं हटेगी. जैसे स्कूल में नया प्रिंसिपल आता है, तो स्कूल की कमियों की घूम-घूमकर पड़ताल करता है, वैसे ही बिपिन रावत को भी पड़ताल शुरू कर देनी चाहिए. ये उनकी ज़िम्मेदारी भी है और ड्यूटी भी.
आर्मी में मेडल बहुत मायने रखते हैं. मेडल, जिसे सेना के लोग सीने पर शान से चिपकाए घूमते हैं. ठीक दिल के ऊपर.

अब पता चला है कि सेना के जवानों को 2008 से डिफेंस मिनिस्ट्री की तरफ से 'असली मेडल' ही नहीं दिए गए हैं. 

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असल में डिफेंस मिनिस्ट्री में सेना के मेडल्स के लिए अलग से एक डिपार्टमेंट होता है. 'द हिंदू' के मुताबिक़ 2008 से इस डिपार्टमेंट ने एक भी मेडल नहीं जारी किया है. इनकी तरफ से 14.5 लाख मेडल जारी होने थे. इसकी वजह से सेना के अफसर और नए जवान डुप्लीकेट मेडल पहन रहे हैं और ये मेडल वो बाज़ार से खरीदते हैं.
असली मेडल में इसे पाने वाले का नाम और उसका सर्विस नंबर लिखा होता है. अफसरों ने बताया कि इसके लिए बहुत से लेटर लिखे गए हैं.
सेना के कई अफसरों ने बताया कि उन्होंने ये मेडल मार्केट से खरीदे हैं. लेकिन सबसे बड़ी बात तो ये है कि बहुत से नए अफसरों को तो पता ही नहीं है कि इस तरह के मेडल मिनिस्ट्री की तरफ से दिए जाते हैं. एक नए अफसर ने बताया कि, ''हमें पता ही नहीं कि डिफेंस मिनिस्ट्री में ऐसा कोई डिपार्टमेंट भी है. हमने हमेशा उन्हें मार्केट से ही खरीदा है.''
एक अफसर ने कहा कि जब इसके लिए अलग से एक पूरा डिपार्टमेंट है तो अफसर मेडल खरीदने दिल्ली कैंट में गोपीनाथ बाज़ार क्यों जाएं? डिफेंस मिनिस्ट्री के मेडल डिपार्टमेंट को लगता है कि अगले फाइनेंसियल इयर में मेडल का स्टॉक क्लियर किया जाएगा. लेकिन बहुत से लोगों को अब भी लगता है कि उन्होंने इतने सालों से मेडल का मसला लटका रखा है तो अब लगता नहीं कि मामले में फुर्ती दिखाई जाएगी. कितने तरह के होते हैं मिलिट्री के मेडल और अवॉर्ड? आर्मी के साथ नेवी और एयरफ़ोर्स में भी कई तरह के मेडल दिए जाते हैं. एक तो वो जिन्हें युद्ध में वीरता के लिए दिया जाता है और एक वो जिन्हें तब दिया जाता है, जब युद्ध ना चल रहा हो यानी पीस टाइम में. वॉरटाइम गैलेंट्री (वीरता) अवॉर्ड- परम वीर चक्र- इंडिया का सबसे बड़ा मिलिट्री सम्मान. यूनाइटेड स्टेट अमेरिका के Medal of Honor और यूनाइटेड किंगडम के Victoria Cross की तरह है. ये वॉर टाइम अवार्ड है और तीनों सर्विस में दिया जाता है. इसे 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति ने शुरू किया था. इसे आर्मी के ही एक अफसर विक्रम खानोलकर की पत्नी सविता खानोलकर ने डिजाइन किया था. इसे बैंगनी रंग के रिबन के साथ पहना जाता है.
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महावीर चक्र- मिलिट्री का दूसरा सबसे बड़ा अवॉर्ड. इसे सफ़ेद और ऑरेंज रंग की रिबन के साथ पहना जाता है. 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान ये मेडल सबसे ज्यादा दिए गए थे.
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वीर चक्र- युद्ध का तीसरा सबसे बड़ा अवॉर्ड. इसने ब्रिटिश Dishtinguished Service Cross( DSC), Military Cross (MC)और Dishtinguished Flying Cross (DFC) की जगह ली थी. 26 जनवरी 1950 से इसकी शुरुआत हुई. इस मेडल को 16mm नीले और 16mm केसरिया रंग के रिबन के साथ पहना जाता है.
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पीसटाइम गैलेंट्री अवॉर्ड अशोक चक्र- इसे पीसटाइम का परम वीर चक्र माना जाता है. यानी युद्ध से अलग वीरता और साहस के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा अवार्ड. इसने ब्रिटिश जॉर्ज क्रॉस अवार्ड की जगह ली थी. फ्लाईट लेफ्टिनेंट सुहास बिस्वास पहले इंडियन थे, जिन्हें ये अवॉर्ड मिला. इस अवार्ड की शुरुआत 4 जनवरी 1952 को हुई थी. तब इसे अशोक चक्र क्लास 1 कहा जाता था. बाद में 1967 में इसे अशोक चक्र कहा जाने लगा. इसके अलावा कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र की भी शुरुआत हुई. इसे हरे रिबन के साथ पहना जाता है जिसमें एक केसरिया पट्टी बनी होती है.
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कीर्ति चक्र- इसे 1952 में अशोक चक्र क्लास 2 नाम दिया गया था. बाद में 1967 में इसे कीर्ति चक्र कर दिया गया. इसे भी हरे रिबन के साथ पहना जाता है लेकिन केसरिया पट्टी दो होती हैं.
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शौर्य चक्र- इसे पीस टाइम का वीर चक्र माना जाता है. इसे भी पहले अशोक चक्र क्लास 3 कहा जाता था, जिसका नाम बाद में बदल दिया गया. इसके रिबन में तीन केसरिया पट्टियां होती हैं.
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  सर्विस और गैलेंट्री मेडल सेना मेडल- सेना मेडल व्यक्तिगत वीरता और ड्यूटी के दौरान साहसिक काम करने के लिए दिया जाता है. इसे 17 जून 1960 को शुरू किया था. 1 फरवरी, 1999 को केंद्र सरकार ने इसके लिए 250 रूपए महीने देना शुरू किया और फिर इसे 1000 रूपए कर दिया गया. इस मेडल से पहले वीर चक्र, शौर्य चक्र और युद्ध सेवा मेडल दिए जाते थे. सेना मेडल चांदी का होता है और इसके बीच में एक संगीन बनी होती है.
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सेना मेडल

वॉरटाइम सर्विस मेडल
सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल- इसे युद्ध में अलग-अलग रूप में मदद करने पर दिया जाता है. खासकर किसी बड़े ऑपरेशन में घायल लोगों की मदद करने के लिए. इसे आर्मी, नेवी और एयरफ़ोर्स तीनों सर्विस में दिया जाता है. इसी काम के लिए उत्तम युद्ध सेवा मेडल और युद्ध सेवा मेडल भी दिए जाते हैं.
जब युद्ध न चल रहा हो तब इसी तरह की सेवाओं के लिए पीसटाइम सर्विस मेडल, परम विशिष्ट सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल दिए जाते हैं.
सर्विस और कैम्पेन मेडल
वाउंड मेडल- इसे पराक्रम पदक या आहत मेडल भी कहा जाता है. किसी भी तरह के ऑपरेशन या अटैक में घायल होने वालों को ये मेडल दिया जाता है. इसे 1973 में शुरू किया गया था.
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जनरल सर्विस मेडल- ये मेडल कुछ ख़ास जगहों में सेवाओं के लिए दिया जाता है. इसकी आधिकारिक शुरुआत 5 जून 1950 को हुई थी. इससे पहले जम्मू-कश्मीर में भारत पाक के बीच 1947 के युद्ध के लिए ये मेडल दिया गया. जम्मू-कश्मीर के अलावा 1955 में नागा हिल्स के ऑपरेशन के लिए, गोवा में 1961 में, लद्दाख में 1962 में, नार्थ ईस्ट फ्रंटियर में 1962 में और 1966 में मिज़ो हिल्स में ऑपरेशन के लिए ये मेडल दिए गए.
इन सबके अलावा दूसरे सर्विस और कैम्पेन मेडल में सामान्य सेवा मेडल, सियाचिन ग्लेशियर मेडल, संग्राम मेडल, सैन्य सेवा मेडल आते हैं.
साथ सर्विस में बिताए गए दिनों के आधार पर भी मेडल दिए जाते हैं. जैसे लॉन्ग सर्विस मेडल, मेरिटोरियस सर्विस मेडल, लॉन्ग सर्विस एंड गुड कंडक्ट मेडल, 30 इयर लॉन्ग सर्विस मेडल, 20 इयर, 9 इयर सर्विस मेडल, टेरिटोरियल आर्मी डेकोरेशन, टेरिटोरियल आर्मी मेडल.
फिलहाल, ऐसे समय में जब हर बात पर ''वहां सरहद पर जवान खड़ा है और तुम...'' कहा जा रहा हो और राष्ट्रवाद का हल्ला मचा हो, तब सेना के लोगों को डुप्लीकेट मेडल खरीदने पड़ रहे है. ये तो किसी का अपमान करने का ''सबसे बढ़िया'' तरीका है.

ये स्टोरी निशांत ने की है.

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