एक बखत की बात बताएं, एक बखत की जब शहर हमारो सो गयो थो, रात गजब की सभी जगत ये पूछ्या था जब इतना सब कुछ हो रयो थो तो सहर हमारो काईं-बाईसा आंख मूंद कै सो रयो थो तो सहर ये बोल्यो नींद गजब की ऐसी आई रे...सोने के और सोए रहने के क्या नुकसान हैं? इससे डोडो जैसी पूरी प्रजाती समाप्त हो जाती है. आंखें मिचमिचाते हुए कभी-कभी कोई सच्चाई देख भी लें तो भी फिर से झूठ के सपनों में खो जाना सुहाता है. ज़्यादा नहीं कुछेक साल पहले की बात है, जब हम खबरों को पढ़ के कहते थे – यार ये कहीं फेक न हो, झूठी न हो. अब कहते हैं – क्या पता ये खबर सही ही न हो. ऐसा वक्त आया है - हमारे सोए रहने से. कोऊ नृप होईं वाले एटीट्यूड से.
*** का सेमिनार का सब्जेक्ट देखिए! *** किस हद तक गिर गए हैं.
ये एक ट्वीट है जिसके साथ उस सेमिनार का सब्जेक्ट या शेड्यूल भी शेयर किया है. यहां पर आप यह ट्वीट देख और पढ़ सकते हैं -

स्क्रीनशॉट गरीबों का स्टिंग ऑपरेशन है!
कुछ और ट्वीट -
ये फोटो ट्विटर से लेकर व्हाट्सएप तक में वायरल हो रही है. इस फोटो या सेमिनार के शेड्यूल में कुछ सेशन (सत्र) और कुछ व्याख्यान हैं. सारे के सारे मोदी विरोधी.
जैसे कि -
# प्रथम सत्र – मोदी – भारत नाम के आईडिया पर खतरा
# द्वितीय सत्र - मोदी और दंगे – स्पष्ट और वर्तमान खतरा
# तृतीय सत्र – मोदी - बुराई जो लाखों जगह आग लगाती है
# चतुर्थ सत्र – मोदी और आरएसएस – ‘शोले’ फ़िल्म के सिक्के के दो पहलू
और,
# प्रथम व्याख्यान - लोकतंत्र और सार्वभौमिक वयस्क फ्रेंचाइजी से मुकाबला
# द्वितीय व्याख्यान - हाल ही में हुआ मिज़ूरी (अमेरिका) दंगा और उत्तराखंड की सांप्रदायिकता
# तृतीय व्याख्यान - मैकॉलियन गूंज और भारत का विचार
# चतुर्थ व्याख्यान - एक जनता, एक सत्ता, एक लीडर (हिटलर के भाषण का एक अंश)
इसमें भाग लेने वाले लोगों की बात की जाए तो, मोदी विरोधी छवि वाले पत्रकार, कम्युनिस्ट पार्टी के नेता, कश्मीर के अलगाववादी नेता और कुछ स्व-घोषित नक्सली, माओवादी शामिल हैं. यानी ये पूरी तरह से मोदी विरोधी और आंशिक (कुछ लोगों के लिए पूर्ण) रूप से देश विरोधी सेमिनार है. और इसका शेड्यूल शेयर भी इसी तरह से हो रहा है.
तो सवाल ये कि ये सेमिनार कब होने वाला है, या कहीं अॉलरेडी हो तो नहीं चुका?
पड़ताल
सन्नाटा वीराना खामोशी अनजानी जिंदगी लेती है करवटें तूफानी घिरते हैं साए घनेरे से रूखे बालों को बिखेरे सेसेमिनार की खबर पूरी तरह फेक है!
न्यूज़ लांड्री
ने एक अर्टिकल लिखा था. बहुत साल पहले. 2014 में. ये अर्टिकल कोई न्यूज़ या कोई विचारोत्तेजक राय नहीं थी. एक सटायर था. यानी व्यंग. और कमाल का क्रिएटिव. इसी आर्टिकल के बीच में एक सम्मेलन का निमन्त्रण पत्र भी दिया था. वो भी उतना ही क्रिएटिव.

(साभार - न्यूज़ लॉन्ड्री)
पहले मुझे आश्चर्य होता था कि गेहूं से रोटी तक की प्रोसेस किस क्रिएटिव ने खोजी होगी? मतलब पहले गेहूं उगाना, फिर उसे पीसना, फिर उसमें पानी मिलाकर उसे गूंथना, फिर उसे बेल के गोल बनाना. और फिर जाकर तवे में आग में गर्म करना अंततः उसे सेंक कर फुलाना. और ये सारे स्टेप्स ठीक वैसे-वैसे और उसी क्रम में जैसे होने चाहिए.
लेकिन अब मुझे रोटी के अविष्कार पर कोई आश्चर्य नहीं होता. मतलब सोचिये - 2014 के व्यंग की खोज करके उसमें से एक फोटो अपने मतलब के कंटेट को अपने अनुसार अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर करना और अंततः अपने लोगों से उसे RT करवाना. ये रॉकेट साइंस नहीं भी तो छोटी-मोटी बुलेट ट्रेन वाला विज्ञान तो है ही. एक आरटीआई तो इस आरटी पर भी दाखिल होनी चाहिए – कि जब आप किसी ट्वीट को इंडोर्स नहीं करते हो, तो अंकल उसे 'आंटी' सॉरी 'आरटी' करते ही क्यूं हो?
कहीं पे है झिंगुर की आवाजें कहीं पे वो नलके की टप-टप है कहीं पे वो खाली सी खिड़की है कहीं वो अंधेरी सी चिमनी है कहीं हिलते पेड़ों का जत्था है कहीं कुछ मुंडेरों पे रखा हैऔर मज़े की बात भारत में पाले इतने अच्छे से परिभाषित हैं कि इस 2014 के व्यंग में जिस पाले में लोग तब थे आज भी वहीं दिखते हैं. बेशक लोग बढ़ गए हैं, मगर पाले आज भी पुराने नहीं पड़े हैं - रिश्ता वही, अफ़सोस नहीं.

बरखा दत्त का ट्वीट
फोटोशॉप करने वाले ने तारीख़ तो हटा दी लेकिन इनविटेशन लैटर की हैडिंग – आईडिया ऑफ़ इंडियन कॉन्क्लेव, मतलब – भारतीय सम्मेलन का विचार में से ‘विचार’ नहीं हटाया. गोया उसने 'वी फॉर वेंडेटा' का डायलॉग सुन लिया हो – आइडिया कभी नहीं मरता.
सुनसान गली के नुक्कड़ पर जो कोई कुत्ता चीख-चीख कर रोता है जब लैंप पोस्ट की गंदली पीली घुप्प रौशनी में कुछ-कुछ सा होता है जब कोई साया खुद को थोड़ा बचा-बचाकर गुम सायों में खोता है जब पुल के खम्बों को गाड़ी का गरम उजाला धीमे-धीमे धोता है तब शहर हमारा सोता है...अब हम अपने ही मुंह से क्या कहें रियल फोटो और फोटोशॉप्ड को साथ साथ ही देख लीजिए. दस अंतर ढूंढ पाएं तो वो भी ढूंढ लीजिए.

पच्चीस अगस्त गायब है!
लेखन में दो विधाएं हैं – फिक्शन और नॉन फिक्शन. फिक्शन बोले तो दादी नानी की कहानियां, शक्तिमान और एवेंजर्स, नॉन फिक्शन बोले तो ‘जीत आपकी’, ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ आदि. इसी तरह पत्रकारिता में भी दो विधाएं हैं – वही फिक्शन और नॉन फिक्शन. नॉन फिक्शन मतलब न्यूज़ चैनल (ज़्यादातर), अख़बार(ज़्यादातर) और न्यूज़ पोर्टल्स (दी लल्लनटॉप सरीखे) और फिक्शन मतलब व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर.
लेकिन देखिए कहानियों की तरह न्यूज़ भी इंट्रेस्टिंग होनी चाहिए, फिर फर्क नहीं पड़ता कि वो खबर इंट्रेस्टिंग है या फेक. इसलिए ही तो विश्व पर्यावरण दिवस तब तक इंट्रेस्टिंग नहीं है जब तक तूफ़ान बारिश से एक देश न बर्बाद हो जाए, फिर कितना ही प्लास्टिक बैन का हैशटैग चलते रहो. आतंकवाद तब तक ब्रेकिंग नहीं है जब तक 9/11 या मुंबई टेरर अटैक न हो जाए. बेरोज़गारी तब तक ‘शॉकिंग’ नहीं है जब तक कोई बेरोज़गार अपनी हाथ की नस न काट ले.
जब शहर हमारा सोता है तो मालूम तुमको हां क्या-क्या क्या होता है इधर जागती है लाशें जिंदा हो मुर्दा उधर ज़िन्दगी खोता है इधर चीखती है एक हव्वा खैराली उस अस्पताल में बिफरी सी हाथ में उसके अगले ही पल गरम मांस का नरम लोथड़ा होता है

जहां एक तरफ विश्व पर्यावरण दिवस जैसे दिन किसी हैशटैग के ट्रेंडिंग होने पर पता चलते हैं, वहीं दूसरी तरफ हादसों का नामकरण तारीखों से हो जाता है - 9/11
ये बड़ी कमाल की साइकोलॉजी है. गौर कीजिएगा – एक तरफ तो न्यूज़ शॉकिंग होनी चाहिए तभी ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसे पढ़ेंगे, देखेंगे, सुनेंगे. दूसरी तरफ जब कोई फिक्शन या कोई कथा, कोई फ़िल्म – सत्य घटनाओं से प्रेरित होती है तो उसकी अलग ही पूछ होती है.
तो इस तरह फिक्शन में नॉन फिक्शन और न्यूज़ में ब्रेकिंग के मेल से जो बनता जाता है उसे फेक न्यूज़ कहते हैं.
वो पूछे हैं हैरां होकर, ऐसा सब कुछ होता है कब वो बतलाओ तो उनको ऐसा तब-तब, तब-तब होता है जब शहर हमारा सोता है!(गीत: पियूष मिश्रा, फ़िल्म गुलाल से) -
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