अमेरिका को ईरान के साथ जंग लड़ते हुए 30 दिन हुए, तो राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को युद्ध का खर्च सताने लगा. माली हालत ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी है कि अमेरिका को अरब देशों से पैसे मांगने की नौबत बस आ ही गई है. वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लीविट ने इसके बारे में काफी-कुछ कह भी दिया है. कैरोलिन लीविट ने बताया कि प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ईरान से युद्ध के खर्च की भरपाई के लिए सहयोगी अरब देशों की ओर देख रहे हैं.
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White House की प्रेस सेक्रेटरी Karoline Leavitt ने अपने बयान में संकेत दिया कि अरब देशों पर भी युद्ध के खर्च का बोझ पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति Donald Trump अरब देशों को खर्च में शामिल होने के लिए कहने में दिलचस्पी ले रहे हैं.


30 मार्च को कैरोलिन लेविट ने पत्रकारों से बात की. एक पत्रकार ने कहा कि 1990-1991 में फारस की खाड़ी के युद्ध के दौरान सऊदी अरब, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे अरब देशों ने युद्ध का ज्यादातर खर्च उठाया था. पत्रकार ने आगे सवाल किया कि मौजूदा युद्ध का खर्च कौन उठा रहा है? क्या पहले की तरह अरब देश खर्च उठाने के लिए आगे आएंगे?
कैरोलिन लीविट ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
"मुझे लगता है कि यह कुछ ऐसा है, जिसके लिए राष्ट्रपति (डॉनल्ड ट्रंप) उनसे (अरब देशों से) कहने में काफी दिलचस्पी ले रहे हैं. मैं इस बारे में उनसे पहले नहीं बताऊंगी. लेकिन निश्चित रूप से यह एक ऐसा आइडिया है, जिसके बारे में मुझे पता है कि राष्ट्रपति ट्रंप के पास पहले से यह आइडिया है. और मुझे लगता है कि आप इस बारे में उनसे और सुनेंगे."
वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लीविट ने अपने बयान में संकेत दिया कि अरब देशों पर भी युद्ध के खर्च का बोझ पड़ सकता है. तो क्या अमेरिका की अरब देशों के सामने हाथ फैलाने की नौबत आ गई है? सवाल इसलिए अहम है क्योंकि ईरान झुकने को तैयार नहीं है, और वेस्ट एशिया के संघर्ष से अपने कदम पीछे नहीं खींच रहा.
ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि वह ठोक-पीटकर अपनी शर्तों को पूरा कराए बिना लड़ाई से पीछे नहीं हटेगा. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के सीनियर मिलिट्री एडवाइजर मोहसेन रेजाई ने खुद टेलीविजन पर कहा था कि तेहरान अपने दुश्मनों की पूरी जवाबदेही के बिना लड़ाई खत्म नहीं करेगा. मोहसेन रेजाई ने कहा था,
"यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हमें अपने सभी नुकसानों का पूरा मुआवजा नहीं मिल जाता, सभी आर्थिक पाबंदियां हटा नहीं दी जातीं, और हमें यह इंटरनेशनल कानूनी गारंटी नहीं मिल जाती कि वाशिंगटन हमारे मामलों में दखल नहीं देगा."
अमेरिका के साथ बातचीत पर ईरान का रुख साफ़ है, लेकिन ईरान से नेगोशिएशन पर कैरोलिन लीविट ने अमेरिका का 'आशावादी' रुख दिखाया. उन्होंने कहा कि ईरान सबके सामने चाहे जो कुछ कहे, लेकिन पर्दे के पीछे मध्यस्थता के साथ अमेरिका और ईरान की बहुत अच्छी बातचीत चल रही है.
वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी ने दावा किया कि बातचीत में शामिल मौजूदा ईरानी नेता शायद उन पिछले नेताओं से ज्यादा समझदार हैं जो अब जिंदा नहीं बचे हैं. उन्होंने कहा कि पेंटागन अमेरिकी प्रेसिडेंट के लिए कई ऑप्शन तैयार कर रहा है. इनका इस्तेमाल बातचीत फेल होने पर किया जा सकता है.
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