अदालत ने कहा कि, यदि वे लिखित रूप से नोटिस के प्रकाशन के लिए ऐसा कोई अनुरोध नहीं करते हैं, तो अधिनियम की धारा 5 के तहत नोटिस देते हुए, विवाह अधिकारी ऐसी कोई सूचना प्रकाशित नहीं करेगा या शादी करने वालों पर आपत्तियों को दर्ज नहीं करेगा और विवाह को कराने के लिए आगे बढ़ेगा.
अदालत ने कहा,
हालांकि, 1954 के अधिनियम के तहत विवाह अधिकारी किसी भी विवाह को कराते हुए, पक्षों की पहचान, उम्र और वैध सहमति को सत्यापित करें या उक्त अधिनियम के तहत विवाह करने की उनकी क्षमता को सत्यापित करें. यदि उसे संदेह है तो उसके पास ऑप्शन होगा कि वह उपयुक्त विवरण या प्रमाण मांगे.

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने वालों को 30 दिन पहले नोटिस देने की कोई जरूरत नहीं है.
किस मामले में दिया फैसला साफिया सुल्ताना नाम की लड़की ने धर्मांतरण कर एक हिंदू लड़के से शादी की है. लड़की के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ हैं, इसलिए उन्होंने लड़की को अपने घर पर अवैध तरीके से बंदी बनाकर रखा है. लड़के के पिता ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर न्याय की गुहार लगाई. इसके बाद कोर्ट ने लड़की और उसके पिता को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया.
कोर्ट में पेश होने के बाद लड़की के पिता ने कहा कि वह पहले इस शादी के खिलाफ थे, लेकिन अब उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है. सुनवाई को दौरान लड़की ने अदालत के सामने अपनी समस्या रखते हुए कहा कि उसने स्पेशल मैरेज एक्ट के तहत शादी इसलिए नहीं कि क्योंकि इस कानून में एक प्रावधान है कि शादी से पहले 30 दिन का एक नोटिस जारी किया जाएगा. इसके तहत अगर किसी को विवाह से आपत्ति है तो वह ऑब्जेक्शन कर सकता है. लड़की ने बताया कि इस प्रावधान के कारण लोग अक्सर मंदिर या मस्जिद में शादी कर लेते हैं. कोर्ट ने लड़की की बात को संज्ञान लिया और स्पेशल मैरेज ऐक्ट की धारा 6 और 7 में संशोधन करते हुए फैसला सुनाया कि अब इस तरह के नियम की जरूरत नहीं है.
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने हाल ही में धर्मांतरण कानून बनाया है. इसमें शादी के लिए धर्म बदलने को जबरन धर्मांतरण कहा गया है. इस कानून के बनते ही पुलिस ने कई लोगों को इस कानून के तहत हिरासत में ले लिया. हालांकि, कुछ मामलों में गलत तरीके से लोगों को फंसाने का मामला भी सामने आया है.





















