बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर विवादास्पद टिप्पणी को लेकर बीती 10 जून को यूपी के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन हुए. कुछ जगहों पर इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा हुई. पुलिस ने कार्रवाई करते हुए हिंसा के आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज की. पुलिस की तरफ से इन आरोपियों के पोस्टर भी सार्वजनिक जगहों पर लगाए गए. इन पोस्टर्स को लेकर बहस की स्थिति बन गई है. एक तरफ पुलिस की इस कार्रवाई का विरोध हो रहा है और दूसरी तरफ इसे सही बताया जा रहा है. विरोध के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि न्याय का एक बहुत जरूरी सिद्धांत होता है कि जुर्म साबित होने तक आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता. साथ ही आरोपियों की निजता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
यूपी पुलिस हिंसा के आरोपियों के जो पोस्टर लगा रही है, वो कितना सही है?
CAA-NRC प्रोटेस्ट के दौरान यूपी पुलिस के इसी तरह के कदम पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई थी.


दरअसल, पुलिस का दावा है कि उसके पास वीडियो फुटेज और फोटोज हैं, जिसमें लोग पत्थर फेंकते और गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम देते हुए देखे जा सकते हैं. पुलिस का कहना है कि ऐसे में ये पोस्टर इसलिए लगाए गए हैं ताकि आरोपियों को पकड़ा जा सके.
इस बीच कुछ सवाल उठ रहे हैं. वो ये कि आखिर किस कानून के आधार पर पुलिस ऐसे पोस्टर जारी कर सकती है? यदि ये आरोपी हैं, तो क्या तब भी पुलिस ऐसे पोस्टर जारी कर सकती है? क्या आरोपियों की निजता नहीं होती है?
इन सवालों के जवाब देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 9 मार्च, 2020 एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश दिया था. इस फैसले की जरूरी बातों को विस्तार से बताएंगे, उससे पहले ये बताते हैं कि किस मामले को न्यायालय ने ये ऑर्डर पारित किया था.
CAA-NRC प्रदर्शनये पहला मौका नहीं है, जब यूपी पुलिस ने इस तरह का कदम उठाया है.
साल 2019 के दिसंबर महीने में देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. इसमें उत्तर प्रदेश के भी कई जिलों के लोगों ने भाग लिया था. हालांकि, इस बीच कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई और पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक और निजी को संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है और उन्हीं से वसूली की जाएगी. हिंसा यूपी की राजधानी लखनऊ में भी हुई थी.
प्रशासन ने ऐसे लोगों को नोटिस जारी किया और कहा कि वो हर्जाने की भरपाई करें, नहीं तो उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी. इतना ही नहीं, पुलिस ने आरोपियों के नाम, पता और उनकी तस्वीरों के साथ बड़े-बड़े होर्डिंग्स लखनऊ की सड़कों पर लगा दिए.
पुलिस के इस कदम से बात ज्यादा बिगड़ गई. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए मामले पर स्वत: संज्ञान लिया और लखनऊ तथा राज्य के बड़े अधिकारियों को मौजूद रहने का आदेश दिया.
जब मामले की सुनवाई शुरु हुई, तो प्रशासन ने पहले कोर्ट के स्वत: संज्ञान जनहित याचिका पर ही सवाल उठा दिया और दावा किया कि कोर्ट इन मामलों में ऐसा कदम नहीं उठा सकता है, ये उसका अधिकारक्षेत्र नहीं है. प्रशासन की तरफ से कहा गया कि आरोपियों के पोस्टर इसलिए सार्वजनिक किए गए हैं, ताकि उन्हें सबक सिखाया जा सके.
निजता का उल्लंघन!इलाहाबाद हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस गोविंद माथुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रशासन की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि इस तरह आरोपियों का पोस्टर लगाना 'निजता के अधिकार का खुला उल्लंघन' है. दुनियभार में निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिली हुई है और ये 'लोकतंत्र के महत्वपूर्ण मूल्यों और मानवीय गरिमा' को दर्शाता है.
जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा की पीठ ने कहा था,
'कुल मिलाकर, हमें ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि राज्य की कार्रवाई लोगों के निजता में हस्तक्षेप करने के अलावा कुछ और नहीं है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का भी उल्लंघन है.'
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा 'कुछ चुनिंदा लोगों' के खिलाफ कार्रवाई करना उसके 'सिलेक्टिव' रवैये को दर्शाता है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से ये सवाल किया था कि जब प्रदेश में लाखों ऐसे आरोपी हैं, जो गंभीर अपराधों का सामना कर रहे हैं, तो सिर्फ कुछ आरोपियों के पोस्टर और बैनर लगाकर उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक की गई है. प्रशासन इस सवाल का उचित जवाब नहीं दे पाया था.
तमाम पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ के डीएम और पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया था कि आरोपियों के पोस्टर्स तत्काल हटाए जाएं.
पोस्टर न लगाने का निर्देशखास बात ये है कि न्यायालय ने राज्य सरकार को स्पष्ट रूप से यह भी निर्देश दिया था कि 'बिना किसी कानून के लोगों की निजी जानकारी शामिल करते हुए ऐसे पोस्टर्स सड़कों के किनारे न लगाए जाएं.'
उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने इसपर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.
इधर झारखंड की रांची पुलिस ने इसी तरह की हिंसा में कथित रूप से शामिल लोगों की तस्वीरें सार्वजनिक कर दीं. इसे लेकर राज्य सरकार के प्रधान सचिव राजीव अरुण एक्का ने रांची के वरीय पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र कुमार झा को पत्र लिखकर पूछा है कि आखिर उन्होंने किस आधार पर ऐसा किया है.
खास बात ये है कि प्रधान सचिव एक्का ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि ऐसा करना कानून के हिसाब से ठीक नहीं है. हालांकि यूपी पुलिस के तरफ से आरोपियों के पोस्टर लगातार लगाए जा रहे हैं.






















