शाल्मली खोलगड़े का ये नया वीडियो खूब वायरल हो रहा है
परेशां-परेशां वाली सिंगर याद है? वही हैं ये.
Advertisement

फोटो - thelallantop
चार दिन पहले सिंगर शाल्मली खोलगड़े का एक वीडियो आया. ये वीडियो औरतों के हक में था. आते ही वीडियो ने धूम मचा दी. 4 दिन में यूट्यूब पर 6 लाख से ज्यादा व्यूज बटोर लिए हैं. वीडियो का म्यूजिक भी शाल्मली ने दिया है और डायरेक्टर भी वही हैं. इस वीडियो में शाल्मली जेंडर इक्वॉलिटी की बात करती दिख रही हैं. देखिए वीडियो: https://www.youtube.com/watch?v=OUM62kMUdDg वीडियो को बनाने की नीयत अच्छी है. लेकिन कुछ बेसिक से दोष दिखे. या यूं कहें, सवाल आए दिमाग में. वीडियो को देखकर जिस बात ने मुझे परेशान किया वो ये कि किसी औरत को अपने हक़ में लड़ने के लिए आंखों से काजल मिटाने, बिंदी हटाने और बाल काटने की जरूरत क्यों है? दुपट्टा हटाकर कम कपड़ों में आने की जरूरत क्यों है? इसका ये अर्थ कतई न लगाया जाए कि औरत को कम कपड़े नहीं पहनने चाहिए. वो एक मुक्त इंसान है, चाहे तो साड़ी पहले, चाहे बुर्का या चाहे तो बिकिनी में घूमे. अपने कपड़े चुनना हमारा हक है. लेकिन जिस तरह वीडियो की शुरुआत होती है, देखकर ऐसा लगता है कि बिंदी और काजल से मुक्ति पाकर ही लड़की अपने लिए लड़ पाएगी. वरना नहीं. अगर किसी औरत पर काजल या बिंदी थोपा जाए, तो वो गलत है. अगर किसी औरत पर खूबसूरती के पैमाने थोपे जाएं, तो उसे बिलकुल बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. पर जो पुरुषवादी सोच औरतों को साड़ी या बुर्के में जकड़ती है, वही सोच ये भी कहती है कि कम कपड़ों में लड़की ज्यादा 'सेक्सी' और 'अपीलिंग' और लगती है. नारीवाद की लड़ाई ये नहीं कि औरतों को बिंदी और साड़ी से बाहर निकाल दिया जाए. नारीवाद कि लड़ाई ये है कि औरतें वो पहन सकें जो वो चाहती हैं. फिर चाहे वो साड़ी हो या बिकिनी. औरतों के हक में वीडियो निकालना अच्छी बात है. ये दिखाना कि वो सब्जी के झोले ही नहीं, जिम में वजन भी उठा सकती हैं, एक अच्छी बात है. वो जिम्नास्टिक्स कर सकती हैं. और वो पुरुष को हराना नहीं, उसके साथ खड़ी होना चाहती हैं, एक अच्छी बात है. लेकिन कुछ सवाल हैं जो उठाने जरूरी हैं. जिससे मुक्ति की इस राह पर चलते हुए हम कहीं गलत राह न पकड़ लें.
Advertisement











