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अखिलेश यादव ने प्रसपा के साथ गठबंधन का ऐलान किया, लेकिन इससे शिवपाल को क्या फायदा?

यूपी चुनाव से पहले चाचा-भतीजे की इस मुलाकात के क्या सियासे मायने हैं?

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बाएं से दाएं. प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रमुख शिवपाल यादव और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव. (फोटो: आजतक)
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने 16 दिसंबर को प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के अध्यक्ष और अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव से मुलाकात की. ये मुलाकात शिवपाल के लखनऊ स्थित घर पर हुई. इस मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने ट्वीट किया,
प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी से मुलाक़ात हुई और गठबंधन की बात तय हुई. क्षेत्रीय दलों को साथ लेने की नीति सपा को निरंतर मजबूत कर रही है और सपा और अन्य सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत की ओर ले जा रही है.
वहीं शिपवाल यादव ने ट्वीट किया,
आज समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव जी ने आवास पर शिष्टाचार भेंट की. इस दौरान उनके साथ आगामी विधान सभा चुनाव 2022 में साथ मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई.

इस मुलाकात के क्या मायने हैं?

कहा जा रहा है कि अखिलेश अकेले ही शिवपाल से मिलने पहुंचे थे. उन्होंने चाचा के पैर छुए. शिवपाल यादव ने भी भतीजे को गले लगाया. लेकिन चाचा भतीजे के रिश्ते से बाहर अगर देखें तो इस मुलाकात के क्या मायने हैं. ये जानने के लिए हमने बात की इंडिया टुडे के सीनियर जर्नलिस्ट आशीष मिश्रा से. उनका कहना है कि अखिलेश ने सबसे बाद में जो गठबंधन किया है वो शिवपाल यादव से किया है. क्योंकि दोनों तरफ से दबाव की राजनीति थी. अखिलेश चाह रहे थे कि वो सबसे बाद में शिवपाल से गठबंधन करें, ताकि सीटों की जो डिमांड है वो कम हो. क्योंकि शिवपाल ने 76 सीटें मांगी हैं, जबकि अखिलेश किसी भी हालत में 5 से ज्यादा सीटें देना नहीं चाहते. आशीष मिश्रा ने आगे कहा,
एक ही रास्ता था, कि शिवपाल के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाएं जिससे उनकी बार्गनिंग पावर कम हो जाए. अखिलेश ने यही किया. क्योंकि अखिलेश को लग रहा था कि शिवपाल यादव भारतीय जनता पार्टी से अपना तार जोड़ रहे हैं. कहा गया कि शिवपाल 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में थे. और बीजेपी के खिलाफ कमजोर कैंडिडेट को खड़ा किया. उससे मैसेज ये गया कि कहीं ना कहीं शिवपाल के पीछे बीजेपी खड़ी है अखिलेश को हरवाने के लिए.
आशीष मिश्रा की मानें तो शिवपाल यादव को लेकर बीजेपी एक्टिव थी. ऐसे में अखिलेश पर भी दबाव आ गया था कि वो शिवपाल से मिलें. हालांकि पहले ये था कि जब इलेक्शन की तारीखों का ऐलान हो जाएगा फिर शिवपाल से मिलेंगे. लेकिन बीजेपी की सक्रियता की वजह से ये मुलाकात पहले हुई. आशीष मिश्रा का कहना है,
ये देखना होगा कि सीटों को लेकर बात कितनी बनती है. क्योंकि शिवपाल के पास समाजवादी पार्टी के बहुत सारे पुराने कार्यकर्ता और नेता हैं जो उनके साथ रहे हैं और हैं. शिवपाल उनके लिए टिकट मांग रहे हैं. अब यही देखना होगा कि शिवपाल का एडजस्टमेंट कैसे होता है. वो तरीका क्या होगा. कितनी सीटों पर गठबंधन होगा. कई बार सीटों के मुद्दे पर ही गठबंधन टूटता है. अखिलेश ने जयंत चौधरी के साथ लगभग 36 सीटों पर गठबंधन किया है. ऐसा कहा जा रहा है. राजभर भी इतनी ही सीटें मांग रहे हैं. अखिलेश कई छोटी पार्टियों को साथ ले रहे हैं. ऐसे में देखना होगा कि समाजवादी पार्टी खुद कितनी सीटों पर लड़ती है और बाकी दलों को कितनी सीटें देती है. अखिलेश के मन में ये भी है कि गठबंधन ऐसे किया जाए कि वो सरकार बनाने के लिए गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर ना रहें. उनका ये भी डर है कि बीजेपी चुनाव बाद गठबंधन ना तोड़ दे. ऐसे में उन्हें सबकुछ देखकर चलना है.
वहीं हिन्दुस्तान टाइम्स के सीनियर पत्रकार एम तारिक खान का कहना है कि अखिलेश खुद शिवपाल यादव से मिलने गए थे. ऐसा करक उन्होंने एक बड़कपन दिखाया है. तारिक ने कहा,
गठबंधन का ऐलान उम्मीद के मुताबिक है, क्योंकि कई दिनों से चल रहा था कि दोनों को साथ में आना है. मुलायम सिंह ने कुछ दिन पहले शिवपाल और अखिलेश को बुलाया भी था. हालांकि अखिलेश चाहते थे कि शिवपाल अपनी पार्टी का मर्जर कर लें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ये देखने वाली बात होगी कि मर्जर होता है कि नहीं. हालांकि इस मुलाकात के बाद ये मैसेज जाएगा कि यादव परिवार साथ हैं और इससे पार्टी में फर्क पड़ेगा.
शिवपाल यादव के पास कैडर है. गठबंधन ना होने से कई लोग डिसाइड नहीं कर पा रहे थे कि किसके साथ जाना है. एम तारिक खान का कहना है कि अखिलेश यादव के पास शिवपाल को रिस्पेक्ट मिलेगी. पार्टी के संगठन में शिवपाल का रोल भी रहेगा. मुलायम सिंह यादव कैंपेन नहीं कर सकते. ऐसे में यादव बेल्ट में शिवपाल को जिम्मेदारी दी जा सकती है.

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