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वाह ताज से आह ताज! अमां इतनी मारामारी क्यों जनाब?

ताज महल को लेकर मौजूदा विवाद पर ये व्यंग्य आपका कलेजा ठंडा कर देगा.

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पिछले साल जब ब्रिटेन के प्रिंस विलियम और उनकी वाइफ कैथरीन भारत आए तो प्रेमियों की निशानी ताजमहल भी पहुंचे. (फोटोः रॉयटर्स)

यह व्यंग्य हमें भेजा है झारखंड मूल की सदफ़ नाज़ ने जो फ्रीलांस जर्नलिस्ट और राइटर हैं. अभी वे दिल्ली में स्थित हैं. उन्हें sadaf.naaz2009@gmail.com पर फीडबैक मेल किया जा सकता है. आप भी अपने विचार, व्यंग्य या टिप्पणी हमें lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं. उपयुक्त हुई तो प्रकाशित होगी.

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सदफ़ नाज़
सदफ़ नाज़

जिस तरह ताज को लेकर इन दिनों इधर-उधर वालों ने मिल कर ग़दर मचा रखी है, मुझे तो लगता है शाहजहां 'अपने ही मुल्क' में 'अपनों के हाथों' हो रही सुबकी पर ज़रूर कब्र में लेटे सोच रहे होंगे - अमां यार बड़ी ग़लती हो गई जो ताज सरज़मीं-ए-हिंद में बनवा दिया. सिल्क रोड से चलता हुआ चाइना में जाकर बनवा देता तो क्या ही अच्छा होता. दुनिया भर के सैलानियों को एक ही ख़र्चे में दो अजूबे, एक साथ देखने को मिल जाते. या फिर अगर बेग़म को ही ज़्यादा वक़्त दे पाता और उनकी ज़िंदगी में उन्हें वर्ल्ड टूर वग़ैरह करवा देता तो यूं मुझे गिल्ट फीलिंग में आकर उनकी मोहब्बत में ताज बनवाने की हूक न उठती. लेकिन अब हो भी क्या सकता है? अब तो यमुना का पानी सदियों का सफ़र तय कर चुका है.
या फिर हो सकता है उन्हें ज़्यादा गिल्ट इसलिए हो रही हो कि ताज हंगामे के बाद दादा हुज़ूर की रूह उनकी कब्र में जब तब आकर उन्हें फटकारती रहती हो कि बदबख़्त! तुम्हारी हरकतों ने मुग़लिया सल्तनत की नाक कटवा कर रख दी है. देख रहे हो! मुल्क में तुम्हारी कारस्तानी ने कैसी आफ़त मचाई हुई है? जो वक़्त लोगों को अपने ख़ित्ते की तरक्की की बातों पर ख़र्च करना चाहिए, वो उसे ताजमहल पर जूतम-पैजार करने में बिता रहे हैं. और यह सब तुम्हारी नाआकबत अंदेशी का नतीजा है. हमारे बुज़ुर्गों ने इतनी मुश्किल से सरज़मीं-ए-हिंद में रेपुटेशन बनाई थी और तुमने सब बर्बाद कर के रख दिया. वैसे तुम्हारे बाप सलीम ने भी अनारकली के पीछे बावले होकर हमारी इज़्ज़त कम नहीं उछाली थी और तुमने भी बीवी के चक्कर में ख़ानदान को रुसवा कर के रख दिया. नानसेंस! नालायक़! अगर बनवाना ही था तो दो-चार और लाल किला टाइप की चीज़ बनवा देते जिस पर चढ़ कर हर साल "हमारे मुल्क" के सदर कौम को ख़िताब करते हैं, और जिसे देख कर हर बार हमारा सीना फ़ख़्र से चौड़ा हो जाया करता है, लेकिन तुम तो.!
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बीते दिनों यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताज महल का दौरा किया.

वैसे हमारे यहां ताज को लेकर जिस तरह की हाय-हाय मची है, वह बिलकुल वैसी ही है जैसी अक्सर बीवी को कीमती तोहफ़े देने पर शौहर के घरवालों और रिश्तेदारों में मच जाया करती है. एक मकबरे के नाम पर पूरा का पूरा ज़माना सिनिकल हुआ फिर रहा है. किसी को यह हिंदुस्तानी तहज़ीब पर काला धब्बा दिखने लगा है तो कोई कह रहा है यह तो हमारे कल्चर का हिस्सा ही नहीं है. कोई फ़ावड़ा कुदाल लिए "असली चीज़" की खुदाई को तैयार बैठा है. किसी को इमारत की ख़ूबसूरती में मज़दूरों के ख़ून के धब्बे नज़र आने लगें तो किसी को कोई अलाना फ़लाना सी बात अचानक से ही दिखने लगी है. मतलब वाह ताज से आह ताज वालों की लंबी फ़हरिस्त तैयार हो गई है. वैसे ताज को लेकर शिकायत सिर्फ़ आजकल ही नहीं हो रही है, गुज़रे जम़ाने में भी लोगों को शिकायत थी. बरसों पहले कोई एक शायर थे जिन्होंने महबूबा के ताज पर इनवाइट करने का ख़ासा बुरा माना था और नज़्म में ही उन्होंने शंहशाह की शिकायत के साथ महबूबा को नसीहत भी की थी कि -
बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशां एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम ग़रीबों का उड़ाया है मज़ाक, मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से!
मुझे तो लगता है कि बेचारी महबूबा शायर की बात सुन कर पानी-पानी हो गई होगी. कान में हाथ लगाते हुए सोचा होगा - अच्छा होता इन्हें किसी चाय के ढाबे पर या फिर मोहल्ले के पीछे बने चिल्ड्रेन्स पार्क में ही मुलाक़ात के लिए बुलवा लेती. ख़्वामाख़्वाह ही मारे शौक के इन्हें ताज पर बुलवा लिया. या यह भी हो सकता है महबूब की बातों से ज़िंदगी के मामूलीपन पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते हुए दाएं बाज़ू के दफ़्तर जाकर उसकी मेंबर बन गई हों. कौन जाने?
रमादान का महीना पूरा होने पर पिछले साल ताज महल में ईद-अल-फितर की नमाज़ देते हुए कुछ भारतीय. (फोटोः रॉयटर्स)
रमादान का महीना पूरा होने पर पिछले साल ताज महल में ईद-अल-फितर की नमाज़ देते हुए कुछ भारतीय. (फोटोः रॉयटर्स)

वैसे बड़ी अजीब बात है. ताज मामले में हमारे यहां के दाएं बाज़ू वाले, जो पिछले वक़्तों के राजे-महराजाओं पर गर्व से फूले नहीं समाते हैं वह भी आजकल बिलकुल बाएं बाज़ू से मुत्तासिर शायर की तरह बातें करने लगे हैं. 16-17वीं सदी के मज़दूरों का हक़, मज़दूरों का पसीना और ख़ून वग़ैरह उन्हें बहुत कचोटने लगा है. लोग यूं इमोशनल हुए जा रहे हैं मानो कि सोलहवीं सदी के राजे-सुल्तानों को वे चेग्वारा समझते रहे हों, और अचानक ही उन्हें इल्हाम हुआ कि दरअसल ये तो साम्राज्यवादी और फ़िज़ूलख़र्च लोग थे.
अमां ख़ल्ली-बल्ली करो यार!! काहे को अपने सेंटीमेंट्स बर्बाद किए फिर रहे हो, हुक्मरान किसी भी दौर के हों, होते वह अपने दौर के रईसों के यार ही हैं. अगर सदियों पहले वे ग़रीबों और मज़दूरों की अनदेखी कर के महलात और मकबरे बनवा रहे थे तो आज वही बुर्ज ख़लीफ़ा और आसमान छूती मूर्तियां बनवा रहे हैं. पहले जंग कर इलाके हथियाते थे तो अब बाज़ार हथियाने के लिए जंग कर और करवा रहे हैं. ग़रीबों को रोटी देने का तो पता नहीं लेकिन बड़े बड़े डैम ज़रूर बनवा रहे हैं. पहले कबूतरबाज़ी से दिल बहलाते थे, अब पनामाबाज़ी से दिल बहला रहे हैं.
सो दाएं बाज़ू में रहें या बाएं बाज़ू में, ख़ातिर जमा रखिए कि आम अवाम के ख़ून जलाने से कोई चराग रौशन होने वाला नहीं है. इतिहास पर फावड़े चलाने से ज़्यादा ज़रूरी है वर्तमान को ठोंक पीट कर ऐसा बनाया जाए ताकि आने वाली नस्लों को एक बेहतर और बराबरी का माहौल मिल सके. ख़ैर आज के हालात देखकर यही दुआ की जा सकती है कि ऊपर वाला हम सब को अक्ल वाली दांत जल्द से जल्द अता फरमाएं (आमीन).
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(सांकेतिक तस्वीर.)

वैसे एक बात और है कि उन्हें जिन्हें ताज बाहरी लगता है वो जिस दिन पुर्वाग्रह की पट्टी को आंखों से खोल कर देखेंगे तो उन्हें नज़र आएगा कि जिन्हें वे 'बाहरी' कहते हैं उन सब की पीढ़ियां तो यहीं पैदा होकर खप चुकी हैं. यूं भी जिस मिट्टी में बाप और दादा मिल जाते हैं वह मिट्टी बाप दादों की मिट्टी बन जाती है. और यूं भी अपने और ग़ैरों के हिसाब-किताब को लेकर बैठेंगे तो हिसाब किताब लंबा हो जाएगा. करोड़ों साल पुरानी धरती पर कौन कहां पैदा हुआ, कहां से आया, किस जगह पैदा हुआ और कहां मरा कौन जानता है? जब अपने ख़ानदान का सौ साल का हिसाब करना ही मुश्किल हो तो फिर करोड़ों साल का हिसाब कौन करे?
वैसे ताज मामले में हमारी जुब्बा ख़ाला की बात में दम है. वह कहती हैं कि "जब आज के ज़माने में लोग गुठलियों के दाम लेना नहीं छोड़ते तो यह बिचारी तो अच्छी ख़ासी मुनाफ़ा बख़्श इमारत ठहरी. काहे को इसके ख़िलाफ़ सर फुटव्वल कर रहे हैं सब. ख़ुदा रखे दुनिया भर के मुल्कों से लोग शौक के मारे इस शाहकार को देखने आते हैं, टिकटें ख़रीदते हैं, मार से इसकी बदौलत इलाके में छोटे-बड़े जाने कितने रोज़गार फल फूल रहे हैं, लोगों को रोज़ी मिल रही है. और सौ बात की एक बात कि ताज की वजह से होने वाली आमदनी कौन सा मध्य एशिया के बैंको के अकाउंटों में भेजी जा रही है, ख़ुदा रखे मुल्क के गुल्लक में हम सब की भलाई के लिए ही जा रहा है सब कुछ.
तो भईया क्या फ़र्क पड़ता है कि ताज खदेरू के दादा ने बनवाया था की रज्जन के चच्चा ने.?"
 
सामने जमा पानी में प्रतिबिंबित होता आगरा का ताजमहल. (फोटोः रॉयटर्स)
सामने जमा पानी में प्रतिबिंबित होता आगरा का ताजमहल. (फोटोः रॉयटर्स)

ताज को लेकर होने वाली जूतम-पैजार से हमारी एक चचेरी पड़ोसन बहुत ख़फ़ा हैं. चचेरी बहन के बग़ल के फ्लैट में रहती हैं. तीन दिन पहले उनके घर मिलने गई तो कहने लगीं कि तुम्हें पता है यह सब हमारे यहां के कंजूस पतियों और प्रेमियों के ख़ैरख्वाहों की कारस्तानी है. ये कमबख़्त तो चाहते ही नहीं कि हम बीवियां और महबूबाएं ख़ुश रहें. अरे एक ताजमहल ही तो था जिसकी मिसालें दे दे कर हम उन्हें चुल्लू भर पानी में डुबोया करते थे कि देखो एक वह शहंशाह गुज़रा जिसने अपनी मोहब्बत की ऐसी मिसाल पेश की कि सदियों बाद भी लोग उस पर अश-अश करते हैं. और एक तुम हो जो एक सोने की चेन के नाम पर करेले जैसी शक्ल बना लेते हो."
हालांकि यह अलग बात है कि शौहर की ज़बान पर आते आते रह जाता है कि बेग़म शाहजहां ने तो ताज बीवी के दुनिया से कूच करने के बाद बनवाया था. और अगर तुम कहो तो . हालांकि कई बार बोलने से ज़्यादा ख़ामोशी में आफ़ियत होती है. और हमारे यहां के समझदार शौहरों और प्रेमियों को ये बात अच्छे से पता होती है.

तो जनाब चाहे आप वाह ताज कीजिए या फिर आह ताज, पर ख़ुदारा ताज को 'इनका-उनका' मत बनाइए. मोहब्बत की निशानी न मानें न सही पर आर्कीटेक्ट की बेज़ोड निशानी तो मान ही सकते हैं न?


सबको राम-राम और ढ़ेरों सलाम.
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