'आप लोग अपने इलाके में आलू फैक्ट्री की मांग कर रहे हैं, लेकिन आपको समझना चाहिए कि मैं विपक्ष का नेता हूं. मैं सरकार पर दबाव बना सकता हूं लेकिन फैसला नहीं ले सकता. मैं किसानों के लिए आलू की फैक्ट्री नहीं खोल सकता हूं.' - राहुल गांधी, यूपी के फिरोजाबाद में, 2016इन दो बयानों में कितना अंतर है. एक में नासमझी दिखती है तो दूसरे में परिपक्वता. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दो हफ्ते से अमेरिका दौरे पर थे. राहुल वहां अपने आप को एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित करने में कामयाब रहे. सवाल उठता है क्या राहुल गांधी बदल गए हैं? क्या उनकी जो 'पप्पू' वाली इमेज बना दी गई है, वो इस अमेरिकी दौरे से खत्म होगी? खैर ये फैसला तो आपको खुद करना है.
'आप सभी अनिवासी भारतीय हैं. वास्तविक कांग्रेस आंदोलन भी एनआरआई आंदोलन था. महात्मा गांधी भी एनआरआई थे. जवाहरलाल नेहरू इंग्लैंड से लौटे थे, अंबेडकर, पटेल, आजाद ये सभी एनआरआई थे. इनमें से हर किसी के पास बाहरी दुनिया का अनुभव था. भारत लौटने के बाद उनका इस्तेमाल कर उन्होंने देश का कायांतरण कर दिया.' -राहुल गांधी, अमेरिका में, 2017

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राहुल ने कई मुद्दे उठाए.(सोर्स-INC ट्विटर)
अगले महीने यानी अक्टूबर के अंत में कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव भी होने हैं. कहा जा रहा है राहुल को कांग्रेस पार्टी की कमान सौंपी जा सकती है. इस लिहाज से भी ये अमेरिकी दौरा खासा महत्वपूर्ण है. लोग कहेंगे राहुल गांधी ने देश के बाहर जाकर कमियां बताईं. तो भाई पीएम मोदी ने भी तो कई बार ऐसा ही किया है. ये चीज सही है या गलत, इसका फैसला भी आप लोग करेंगे. पर फिलवक्त राहुल गांधी के बयानों से उनमें ये 5 बदलाव दिखे:
1. गलतियों को स्वीकारना
बर्कले यूनिवर्सिटी में राहुल ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी हार के कारण पर बात की. कहा कि हम युवाओं को नौकरियां देने में नाकामयाब रहे. हमने जो विज़न बनाया था, उसके लिए 10 साल का समय चाहिए था, लेकिन 2012 में कांग्रेस में घमंड आ गया, जिसके चलते पार्टी ने जनता से संवाद बंद कर दिया. इसीलिए हमें करारी शिकस्त मिली. आमतौर पर जब पार्टियां चुनाव हार जाती हैं तो प्रवक्ताओं या नेताओं का एक ही रटा-रटाया बयान रहता है, 'शायद हमसे कोई कमी रह गई, हार की समीक्षा करेंगे.' कांग्रेस ने भी 2014 लोकसभा चुनाव हारने के बाद ऐसी ही बातें कही होंगी. तीन साल बाद ही सही, राहुल ने अपनी कमियां स्वीकारी हैं.

अगले आम चुनाव में मोदी को सीधी टक्कर देने को तैयार हैं राहुल गांधी.
2.प्रतिद्वंद्वी की तारीफ करना
राहुल ने अपने अमेरिकी दौरे पर प्रतिद्वंद्वी पीएम नरेंद्र मोदी को जमकर घेरा. उनकी आलोचना भी की. उनकी लाख कमियां गिनाईं पर उनकी तारीफ करने से भी नहीं चूके. अपना दिल बड़ा करते हुए नरेंद्र मोदी को खुद से बेहतर वक्ता बताया. बोले, 'मोदी जानते हैं कि जनता को कैसे अपने पक्ष में किया जाए. वो लोगों को रोकने की कला जानते हैं.' उन्होंने मोदी की कई योजनाओं की आलोचना की तो मेक इन इंडिया स्कीम की तारीफ भी की. राहुल ने ये भी कहा कि मोदी मेरे भी प्रधानमंत्री हैं. चाहते तो राहुल खाली अपनी ढपली पीटते पर उन्होंने ऐसा नहीं किया.

राहुल गांधी से युवाओं ने खुलकर किए सवाल.
3. ईमानदारी और साफगोई दिखी
राहुल ने न्यूयॉर्क में एक और घटना का जिक्र किया. उन्होंने बताया-
'मैं जब 12 साल का था तो पापा ने एक दिन मुझसे कहा कि एक प्रेजेंटेशन होनी है और तुम भी इसमें शामिल होना. मैं नहीं जानता था कि प्रेजेंटेशन क्या होती है. खैर, मैं वहां अपनी बहन के साथ पहुंचा और कमरे के एक कोने में हम दोनों चुपचाप बैठ गए. मेरे पापा और सैम कम्प्यूटर्स के बारे में बातें करते रहे. मैं नहीं समझ पाया कि कम्प्यूटर्स होते क्या हैं? मेरे लिए तो ये एक छोटा-सा बॉक्स था, जिसमें टीवी स्क्रीन लगी हुई थी.'
अब बताइए नेता आमतौर पर अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते नहीं थकते हैं. अपनी कमियां ऐसे कौन बताता है. राहुल ने यहां ईमानदारी बरती. इसके अलावा वंशवाद पर उन्होंने बिना घुमाए सीधा जवाब दिया. सवाल को नकारा नहीं. स्वीकार किया कि हां, वंशवाद है.

राहुल ने दो हफ्ते अमेरिका में गुजारे.
4.आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेना
राहुल गांधी से पूछा गया कि वह कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे? इस पर राहुल ने कहा, 'हां मैं तैयार हूं. पार्टी में यह तय करने के लिए एक प्रक्रिया है जो कि जारी है. पार्टी मिलकर इस पर फैसला लेगी.' अब तक राहुल इस बात से बचते ही रहे हैं. इस बार शायद पहली बार उन्होंने खुलकर अपनी दावेदारी स्वीकारी है. उन्होंने अपने बयानों पर भी खुलकर स्टैंड लिया. विपक्ष के नेता के तौर पर भी अपना रोल निभाया. सरकार को उसकी कमियां बताईं. कुल मिलाकर राहुल ने आगे बढ़कर इस बार हर उस मुद्दे पर स्टैंड लिया है, जिससे वो बचते रहे हैं.
5. प्रोत्साहित करते दिखे
राहुल अमेरिका में थे. जींस के साथ ब्लेजर पहने दिखे. अंग्रेजी में बात कर रहे थे. मगर बातों के केंद्र में भारत ही रहा. भारत के अहिंसा जैसे मूल्यों की तारीफ की तो असहिष्णुता की बात करते हुए चिंता भी जाहिर की. इसके साथ एक और चीज की. एनआरआई को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई. उनको उनके मूल यानी भारतीयता की याद दिलाई. खैर पीएम मोदी ये अक्सर करते दिखते हैं पर इस बार राहुल ने एनआरआई को प्रोत्साहित किया. उन्होंने एनआरआई समुदाय से अपील की कि वो भारत आएं और अच्छे काम करें. उन्हाेंने कहा कि एनआरआई समुदाय ने भारत की आजादी में अहम रोल निभाने के साथ ही भारत को बदल डाला. इसीलिए आज भारत को बदलने के लिए एक बार फिर से एनआरआई समुदाय की जरूरत है.

राहुल अमेरिका में कई डिप्लोमैट्स, बिजनेसमैन और एनआरआई से मिले.
खैर, इन सब बातों के बावजूद हम ये नहीं कह सकते कि राहुल गांधी परफेक्ट हो गए हैं. परफेक्ट कोई नहीं होता. सभी को सीखते रहना चाहिए. राहुल का ये अमेरिका दौरा खासा चर्चा में रहा. वो कुछ हद तक अपनी छवि बदलने में कामयाब रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी लोग उनकी तरफदारी करते दिखे. अब देखना होगा कि अमेरिका में जो परिपक्वता उन्होंने दिखाई, क्या वो भारत में बरकरार रह पाती है.
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