इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस कानून के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है. याचिका में कानून को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके जवाब में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया. 8 जनवरी को. इसमें UP सरकार ने अपने कानून का बचाव किया. इसे लेकर प्रदेश की सरकार ने कई दलीलें दीं, सरकार ने अपने हलफनामे में उदाहरण देकर समझाया कि किसे कानून में गलत माना गया है और किसे नहीं. 'लव जिहाद' शब्द पर हलफनामे में क्या है? कोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया गया है उसमें कहीं भी 'लव जिहाद' शब्द का जिक्र नहीं है. हलफनामे के अनुसार लव जिहाद के नाम से किसी को भी गिरफ्तार करने का प्रावधान नहीं है. इस हलफनामे में यूपी सरकार यह समझाने की कोशिश करती दिखती है कि कानून को एक खास वजह से लाया गया है और इसके दुरुपयोग का खतरा नहीं है. सरकार का कहना है कि यह कानून गलत बयानी, ताकत, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, पैसे देकर या दूसरे तरीकों से धोखाधड़ी करने और शादी के नाम पर धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए है.
योगी सरकार ने उदाहरण देकर समझाया लाइव लॉ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी सरकार ने उदाहरण देकर समझाया कि कानून के दायरे में कौन धर्मांतरण में आता है और कौन नहीं.
किसे नहीं समझा जाएगा धर्मांतरण का दबाव
इसे एफिडेविट में 2 उदाहरण देकर समझाया गया.
1. अगर किसी क्रिश्चियन स्कूल में कोई हिंदू या सिख बच्चा पढ़ता है. उन्हें उस कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने के दौरान क्रिश्चियन धर्मग्रंथ बाइबल को पढ़ाया जाता है. वो इसे चाव से पढ़ते हैं लेकिन उन पर अपने धर्म को प्रैक्टिस न करने का कोई दबाव नहीं है. इस तरह से सभी स्टूडेंट्स का अपने धर्म में बने रहने का अधिकार कायम रहता है और उनके सम्मान पर भी कई प्रभाव नहीं पड़ता. इस मामले में धर्मांतरण निरोधक कानून का कोई दखल नहीं होगा.
2.मान लीजिए कोई क्रिश्चियन किसी गैर क्रिश्चियन के घर पर किराएदार की तरह रहता है. मकान में रहने के लिए कुछ शर्तें तय हैं. जैसे वाइन न पीना, नॉन वेज न खाना और खास वक्त पर आना-जाना. इसमें चर्च न जाने जैसी शर्त नहीं है. किराएदारी के नियम कायदों की वजह से क्रिश्चियन किराएदार के धार्मिक क्रियाकलापों में बाधा पड़ सकती है. हालांकि उन्हें उस घर से बाहर किसी भी तरह के बंधन में रहने की जरूरत नहीं है. वह कुछ भी खा-पी सकते हैं. इस मामले में धर्मांतरण के दबाव का मामला नहीं बनेगा. क्योंकि क्रिश्चिशन किराएदार घर के बाहर कुछ भी करने और चर्च जाने के लिए पूरी तरह से आजाद है.

योगी सरकार ने उदाहरण देकर समझाया है कि किसे जबरन धर्मांतरण माना जाएगा और किसे नहीं.
किसे माना जाएगा जबरन धर्मांतरण जबरन धर्मांतरण को एफिडेविड में शादी वाले मामले से ही समझाया गया है
माना किसी हिंदू लड़की ने किसी मुस्लिम लड़के से शादी कर ली. पर्सनल लॉ के मुताबिक किसी भी हिंदू महिला को पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता. ऐसे में अपने अधिकारों को पाने के लिए महिला को अपना धर्म छोड़ना पड़ेगा. ऐसा करके ही उसे एक पत्नी के तौर पर भी पूरा दर्जा मिलेगा. इस पहलू की हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी तफ्सील से चर्चा की गई है. यहां पर महिला अपने मन से शादी से पहले का अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहती लेकिन उसे पत्नी का दर्जा पाने के लिए इस्लाम कबूल करना होगा. इसे बलपूर्वक धर्मांतरण माना जाएगा.
यही बात उस हिंदू लड़के पर भी लागू जो मुस्लिम लड़की से शादी करना चाहता है. लड़का अपने मन से धर्म तो नहीं बदलना चाहता लेकिन चूंकि उसे शादी करनी है इसलिए धर्म बदलना पड़ेगा. यह भी जबरन धर्म परिवर्तन का मामला है.

यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल करते हुए समझाया कि किसे जबरन धर्मांतरण माना जाएगा.
एफिडेविड की खास बातें # भारत के संविधान में किसी भी तरह से धर्म परिवर्तन को रोकने पर काफी जोर दिया गया है. एक सेक्युलर स्टेट होने की वजह से राज्य का पहला कर्तव्य है कि वह जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक लगाए. जिससे राज्य के लोगों में विचारों की आजादी, भरोसा और सम्मान की भावना बरकरार रहे.
# किसी खास स्थिति में अगर कोई शख्स किसी दूसरे धर्म को स्वीकार करता है तो उसका वह अपने व्यक्तिगत सम्मान के साथ समझौता करता है. उस शख्स को तब तक बराबरी के अधिकार नहीं मिलते जब तक वह धर्म न बदल ले. इस तरह का मामला किसी के व्यक्तिगत चुनाव के खिलाफ है.
# अगर किसी खास समुदाय के भीतर डर भर गया है. अगर कोई समुदाय उस डर के तहत धर्मपरिवर्तन करने को मजबूर है. ऐसे में उस समुदाय की रक्षा करना बहुत जरूरी है.
# इस कानून के जरिए आम लोगों के हित और व्यवस्था को बनाए रखने में मदद मिलेगी. इससे समुदाय की सोच नहीं बल्कि समुदाय के हितों का ख्याल रखा गया है. समुदायिक हित किन्ही दो लोगों के व्यक्तिगत हितों से बड़ी चीज है. समुदायिक हित ही सामाजिक हित का पर्यायवाची हैं. यही सार्वजनिक हित भी कहलाता है.
# भारत के आठ राज्यों में ऐसे कानून हैं. भारत के आसपास के देश जैसे नेपाल, म्यानंमार, भूटान, श्रीलंका और पाकिस्तान में भी ऐसे कानून हैं.
बता दें कि इस कानून को आए अभी दो महीने हुए हैं और यूपी में इस कानून के तहत 16 मामले दर्ज हुए हैं. इस हफ्ते ही योगी सरकार ने हाई कोर्ट में इस कानून में बुक किए गए दो लोगों के खिलाफ सबूत न मिलने की बात कही है. पुलिस ने भी एक मामले में आरोपों को बेबुनियाद पाया था.
यूपी सरकार ने हाई कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल करने के बाद गुजारिश की है कि उस जनहित याचिका को रद्द कर दिया जाए जो इस कानून को खत्म करने की मांग कर रही है.
























