The Lallantop

क्यों EU ने वेग्नर ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर डाला?

EU ने रूस पर प्रॉक्सी वॉर चलाने का आरोप भी लगाया है

Advertisement
post-main-image
EU ने रूस पर प्रॉक्सी वॉर चलाने का आरोप भी लगाया है
साल 2018. जुलाई का महीना था. रूस के तीन पत्रकार सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक (सीएआर) के दौरे पर गए. उन्हें वहां एक डॉक्यूमेंट्री बनानी थी. विषय था, CAR में रूसी प्राइवेट मिलिटरी कॉन्ट्रैक्टर्स की भूमिका. जब वे लोग राजधानी बांगी पहुंचे, तभी उनकी जासूसी शुरू हो चुकी थी. उन्होंने सफ़र के लिए एक गाड़ी किराए पर ली. राजधानी से निकलने के कुछ देर बाद ही सुनसान रास्ता था. तीनों लोग थके हुए थे. वे सोने की कोशिश करने लगे. उनकी आंख लगी ही थी कि गाड़ी एक झटके से रुक गई. बाहर कुछ हथियारबंद लोग रास्ता रोककर खड़े हुए थे. उन्होंने ड्राइवर को निकालकर साइड किया और फिर बाकी तीनों पत्रकारों को गोली मार दी. तीनों की मौके पर ही मौत हो गई. घटना की जांच हुई. रूस ने कहा कि ये बस एक संयोग है. वे लोग ग़लत टाइम पर ग़लत जगह पर मौज़ूद थे. वो इलाका ख़तरनाक है. उन्हें वहां नहीं होना चाहिए था. ये सरकारी वर्ज़न था. इसके बाद एक और जांच हुई. स्वतंत्र. इसके प्रायोजक थे - तीनों पत्रकारों की ट्रिप को फ़ंड करने वाले मिखाइल ख़ोदोकोस्की (या मिखाइल के.). जांच का रिजल्ट जानने से पहले प्रायोजक के बारे में जान लेते हैं. सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी सरकार, सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में बेच रही थी. रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन इसके जरिए अपने चुनावी कैंपेन के लिए पैसा जुटाने की फ़िराक़ में थे. इस स्कीम के ज़रिए वो सरकारी कंपनियों की दशा और दिशा सुधारने की प्लानिंग भी कर रहे थे. इसी दौरान मिखाइल के. ने सरकारी तेल कंपनी युकोस को खरीद लिया. उन्होंने बोरिस येल्तसिन के इलेक्शन कैंपेन को स्पॉन्सर किया. बदले में उन्हें येल्तसिन की दोस्ती हासिल हुई. सरकारी तंत्र का साथ मिलने के बाद तो युकोस की किस्मत ही खुल गई. कंपनी लगातार बड़ी होती गई. येल्तसिन के बाद रूस की कुर्सी पर आए व्लादिमीर पुतिन. मिखाइल के. से उनकी अनबन हो गई. मिखाइल के. रूस में लोकतंत्र लाने और आज़ाद ख़यालों की वक़ालत कर रहे थे. बात तब और आगे बढ़ गई, जब उन्होंने सरेआम ऐलान किया कि वो चुनाव में ‘लिबरल पार्टी’ की मदद करेंगे. लिबरल पार्टी पुतिन की मुख्य विरोधी पार्टी थी. अक्टूबर 2003 में मिखाइल के. को अरेस्ट कर लिया गया. उस समय वो रूस के सबसे अमीर आदमी थे. ग्लोबल लिस्ट में वो 16वें नंबर पर थे. उनकी कुल संपत्ति एक लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. मिखाइल के. के ऊपर टैक्स चोरी का आरोप लगाया गया. इस मामले में उन्हें आठ बरस क़ैद की सज़ा सुनाई गई. दिसंबर 2010 में उनके ऊपर दो और केस लाद दिए गए. मनी लॉन्ड्रिंग और ग़बन का. उनकी सज़ा 2014 तक के लिए बढ़ा दी गई. दिसंबर 2013 में पुतिन ने मिखाइल के. को क्षमादान दे दिया. जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने रूस छोड़ दिया. फिलहाल, मिखाइल के. लंदन में रहते हैं. वो पुतिन की तानाशाही के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट आयोजित करते हैं. साथ ही, रूस में लोकतंत्र, फ़्री प्रेस, निष्पक्ष चुनाव जैसे मुद्दों के लिए आवाज़ उठाते रहते हैं. उन्हें रूस से बाहर पुतिन का सबसे बड़ा आलोचक माना जाता है. (अगर आप मिखाइल ख़ोदोकोस्की के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो एक कमाल की डॉक्यूमेंट्री है, सिटीज़न K. आप वो देख सकते हैं.) अब लौटते हैं, CAR में तीन रूसी पत्रकारों की हत्या पर. मिखाइल के. की संस्था पत्रकारों की रिपोर्टिंग को स्पॉन्सर कर रही थी. उन्होंने हत्या की जांच कराई. पता चला कि पत्रकारों की गाड़ी का ड्राइवर घटना वाले दिन एक सरकारी अफ़सर के साथ संपर्क में था. वो भी घटना के एक घंटे पहले तक. वो सरकारी अफ़सर फ़्लाइट लैंड होने के बाद से पत्रकारों के पीछे लगा हुआ था. और, वो अफ़सर एक रूसी मिलिटरी ट्रेनर के रेगुलर कॉन्टैक्ट में था. इस रूसी ट्रेनर ने अमेरिकन नाम वाली फ़र्ज़ी आइडी बना रखी थी. लेकिन, असलियत में वो रूस के प्राइवेट मिलिटरी ग्रुप ‘वेग्नर’ के लिए काम करता था. तीनों पत्रकार इसी वेग्नर ग्रुप की कारस्तानियों पर रिपोर्टिंग के लिए सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक के दौरे पर गए थे. अगर रूसी जांच एजेंसियों की मानें तो ये घटना संयोग से अधिक कुछ नहीं थी. रूस में संयोगों की मात्रा का अक्सर ख़याल नहीं रखा जाता. जैसा कि अप्रैल 2018 में हुआ था. CAR वाले कांड से तीन महीने पहले की बात है. एक रिपोर्टर थे, मैक्सिम बोरोदिन. वो सीरिया में वेग्नर ग्रुप के लड़ाकों की मौत की रिपोर्टिंग कर रहे थे. उन्होंने वेग्नर ग्रुप और क्रेमलिन के बीच संबंधों को भी उजागर किया था. उनकी रिपोर्ट्स की ख़ूब चर्चा हुई. फिर 15 अप्रैल 2018 को बोरोदिन अपने घर की बालकनी से नीचे गिर गए. अगले दिन अस्पताल में उनकी मौत हो गई. रूसी अधिकारियों ने अपनी जांच में कहा कि ये आत्महत्या है. बोरोदिन के करीबी लोग इस दावे को नकारते हैं. जिस किसी ने भी वेग्नर ग्रुप की परतों को खोलने में दिलचस्पी दिखाई, या तो उन्हें मार दिया गया या फिर चुप करा दिया गया. अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि ये वेग्नर ग्रुप आख़िर है क्या? इस सवाल का जवाब थोड़ा रहस्यमयी है. एक जवाब हो सकता है कि ये कुछ अज्ञात लोगों का समूह है. अगर रूस के वर्ज़न पर विचार किया जाए तो, वेग्नर ग्रुप जैसी कोई चीज़ असल में है ही नहीं. तो ये है क्या बला? वेग्नर ग्रुप का नाम पहली बार 2014 में चर्चा में आया था. क्रीमिया पर क़ब्ज़े के दौरान वेग्नर ग्रुप ने रूसी सेना की मदद की थी. उसके बाद से वेग्नर का नाम मोज़ाम्बिक़, लीबिया, सीरिया, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक, माली, सूडान और मैडागास्कर जैसे देशों में भी उभरा है. इनमें से कुछ देश सिविल वॉर से जूझ रहे हैं, जबकि बाकी देशों में स्थिरता का संकट है. वेग्नर ग्रुप इन देशों में लड़ाके और ट्रेनर भेजकर संबंधित पक्ष की मदद करता है. इसके बदले में उन्हें पैसा मिलता है. कुछ मामलों में तेल और सोने के खदानों को लेकर हुई डील की रिपोर्ट भी है. वेग्नर ग्रुप असल में एक संरचना है. इस नाम से कोई कंपनी रजिस्टर्ड नहीं है. ये समान लक्ष्य के लिए काम कर रहे अलग-अलग समूहों का एक नेटवर्क है. इसके पीछे दो मास्टरमाइंड बताए जाते हैं. पहला नाम है, रूस की सैन्य खुफिया एजेंसी GRU में लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद पर काम कर चुके दमित्री उत्किन का. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्किन हिटलर को अपना आदर्श मानता है. हिटलर के एक चहेते म्युज़िक कम्पोज़र थे - रिचर्ड वेग्नर. कहा जाता है कि उन्हीं के नाम पर उत्किन ने नेटवर्क का नाम वेग्नर ग्रुप रखा. उत्किन को लंबे समय से पब्लिक में नहीं देखा गया है. दूसरा मास्टरमाइंड है, येवगेन प्रिगोझिन. उसे वेग्नर ग्रुप के फ़ाइनेंशियल बैकर माना जाता है. प्रिगोझिन पर इंटरनेट रिसर्च एजेंसी ‘ट्रोल फ़ैक्ट्री’ को फ़ंड देने का आरोप भी है. इस एजेंसी ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ऑनलाइन फ़ेक कैंपेन चलाया था. अमेरिका इसी आधार पर प्रिगोझिन और उनकी कंपनियों पर कई दफा प्रतिबंध भी लगा चुका है. प्रिगोझिन इन आरोपों को झूठा बताते रहे हैं. जहां तक प्रिगोझिन का सवाल है, उनकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. उनके कैरियर का ग्राफ़ पुतिन के साथ-साथ ऊपर गया. 1990 के दशक में पुतिन ने अपने पॉलिटिकल कैरियर की शुरुआत मेयर ऑफ़िस में सलाहकार की नौकरी के साथ की थी. उसी समय प्रिगोझिन भी अपना बिजनेस बढ़ा रहे थे. दोनों में दोस्ती हुई. जब पुतिन राष्ट्रपति बने, तब प्रिगोझिन ने रेस्टोरेंट शुरू किया था. पुतिन की बड़ी बैठकियां प्रिगोझिन के होटल में ही हुआ करतीं थी. इसके बाद प्रिगोझिन ने कैटरिंग बिजनेस में हाथ आजमाया. उन्हें क्रेमलिन, स्कूल और अंत में रशियन मिलिटरी से खाना पहुंचाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला. प्रिगोझिन को ‘पुतिन का शेफ़’ भी कहा जाता है. जानकारों का कहना है कि वेग्नर के संबंध में प्रिगोझिन बस मिडिलमैन की भूमिका निभा रहे हैं. पुतिन और रूसी सेना से उनकी नज़दीकी है. इसी के जरिए वो ठेका उठाते हैं. अगस्त 2021 में बीबीसी ने लीबिया में वेग्नर ग्रुप के मिशन पर एक रिपोर्ट छापी थी. उन्हें ग्रुप के एक लड़ाके का छोड़ा टैब मिला था. इस टैब से कुछ कोडनेम भी हाथ लगे थे. उसमें भी प्रिगोझिन और उनकी एक कंपनी का नाम आया था. प्रिगोझिन ने कंपनी से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया था. वेग्नर ग्रुप से रूस को क्या फायदा है? पहली बात, रूस में प्राइवेट मिलिटरी बनाना गैर-कानूनी है. अगर कोई रूस पर आरोप लगाता है तो वो इससे आसानी से इनकार कर सकता है. जो संस्था क़ागज़ पर है ही नहीं, उस पर कार्रवाई करने की ज़रूरत ही क्या है? दूसरी बात, मिलिटरी की तुलना में प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स पर खर्च कम आता है. सरकार प्राइवेट सैनिकों की मौत को आसानी से इग्नोर कर सकती है. रूस ने ऐसा किया भी है. सीरिया में वेग्नर ग्रुप के सैकड़ों लड़ाके मारे गए हैं. लेकिन रूस इन मौतों को स्वीकार नहीं करता. और तीसरी बात, रूस प्राइवेट आर्मी की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों की लूट कर सकता है. अगर कोई आरोप लगाए तो उसके पास एक बना-बनाया जवाब होगा, हम तो इनको जानते ही नहीं. आज हम ये सब क्यों सुना रहे हैं? दरअसल, EU ने वेग्नर ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है. वेग्नर ग्रुप से जुड़े लोगों और संस्थाओं पर कार्रवाई के लिए जल्दी ही एक फ़्रेमवर्क लाया जाएगा. इसमें थोड़ा समय लगेगा, ताकि किसी अदालत में इसे चुनौती ना दी जा सके. पिछले साल ही EU येगनेव प्रिगोझिन को ब्लैक-लिस्ट में डाल चुका है. EU ने रूस पर प्रॉक्सी वॉर चलाने का आरोप भी लगाया है. रूस ने कहा कि वेग्नर ग्रुप उसके इशारों पर काम नहीं करता. EU की कार्रवाई की वजह क्या है? अक्टूबर 2021 में माली में मिलिटरी हुंटा ने वेग्नर ग्रुप से संपर्क किया था. माली वेग्नर ग्रुप के एक हज़ार लड़ाकों को हायर करने पर विचार कर रहा है. माली में फ़्रांस के पांच हज़ार से अधिक सैनिक तैनात हैं. यहां EU का एक ट्रेनिंग मिशन भी काम कर रहा है. EU का कहना है कि इससे इलाके में अस्थिरता पैदा होगी. इसी को लेकर फ़्रांस वेग्नर ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने पर ज़ोर दे रहा था. फ़्रांस का डर है कि मिलिटरी हुंटा वेग्नर ग्रुप के ज़रिए सत्ता में बने रहने का रास्ता तलाश रही है. माली में एक साल में दो तख़्ततापलट हो चुके हैं. अगले साल फ़रवरी में यहां चुनाव होने वाले हैं. अगर सब ठीक रहा तो सत्ता लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार के हाथ में आ जाएगी. हालांकि, जो हालात बन रहे हैं, उसमें इसकी संभावना क्षीण होती जा रही है.

Advertisement
Advertisement