The Lallantop

आज़ाद होने के बाद भी बारबाडोस को ब्रिटिश से मुक्ति क्यों नहीं मिली?

कोरोना के ओमीक्रॉन वेरिएंट को लेकर लेटेस्ट अपडेट क्या है?

Advertisement
post-main-image
ब्रिटिश संघ का झंडा और बारबाडोस का राष्ट्रीय ध्वज एक दूसरे के बगल में लहराते हुए.
कैरेबियन सागर में एक द्वीप है. बारबाडोस. जाबड़ क्रिकेटरों का देश. सर गैरी सॉबर्स, मैल्कम मार्शल, गॉर्डन ग्रीनिज़ जैसे दिग्गज खिलाड़ी यहीं से पनपे. बाकी मानकों पर भी ये देश आगे की कतार में खड़ा है. लेकिन कुछ दशक पहले तक ऐसा नहीं था. ग़ुलामी और दमन इसका अभिन्न हिस्सा थे. बारबाडोस का इतिहास लहू, आंसू और मौत की त्रासदियों से मिलकर बना है. इस दास्तान का मुख्य विलेन ब्रिटेन है. आज जानेंगे, बारबाडोस का पूरा इतिहास क्या है? आज़ाद होने के बाद भी उसे ब्रिटिश दखल से मुक्ति क्यों नहीं मिली? अब जाकर उसका ब्रिटेन से मोहभंग क्यों हुआ? और बताएंगे, राजतंत्र और गणतंत्र में क्या अंतर होता है? साल 1625 की बात है. 14 मई का दिन था. इंग्लैंड का एक जहाज समंदर में रास्ता भटक गया. जहाज के कप्तान जॉन पॉवेल और उनके साथी ब्राज़ील से लौट रहे थे. उन्हें वापस इंग्लैंड जाना था. लेकिन रास्ता भटकने के बाद वे एक वीरान द्वीप पर पहुंच गए. उन्हें लगा कि ये तो खाली ज़मीन है. कोई दावेदार नज़र नहीं आता. ‘जो किसी का नहीं, वो हमारा’ की तर्ज़ पर जॉन ने उस जगह पर ब्रिटेन का झंडा लगा दिया. क्या ब्रिटिश उस द्वीप पर पहुंचने वाले पहले यूरोपियन थे? कतई नहीं. ब्रिटेन के आने से बरसों पहले पुर्तगाली उस द्वीप पर कदम रख चुके थे. जब वो तट पर उतरे तो उन्हें अंजीर के बड़े-बड़े पेड़ दिखे. इन पेड़ों की पत्तियां मिलकर दाढ़ी की आकृति बना रहीं थी. इसी के मद्देनज़र उन्होंने द्वीप का नामकरण किया. लॉस बारबाडोस. यानी दाढ़ी वाला द्वीप. एक किंवदंती ये है कि पुर्तगालियों का सामना बड़ी दाढ़ी रखने वाले लोगों से हुआ. इस वजह से उन्होंने इसे बारबाडोस का नाम दिया. खैर, सच जो भी हो, बारबाडोस बाहरी दुनिया के ज़ेहन में आ चुका था. जॉन पॉवेल ने इस तलाश की जानकारी अपने सरदार को दी. सरदार बहुत खुश हुआ. उसने आदेश दिया, जाओ और वहां नई कॉलोनी बसाओ. पॉवेल बारबाडोस के लिए निकला ज़रूर, लेकिन कभी पहुंच नहीं पाया. वो बीच में दूसरे काम में फंस गया. फिर सरदार ने जॉन के भाई हेनरी से संपर्क किया. हेनरी ने कहा, भाई के सपने को मैं पूरा करूंगा. फ़रवरी 1627 में हेनरी पॉवेल 80 सेटलर्स और 10 ग़ुलामों को लेकर बारबाडोस पहुंचा. अंग्रेज़ों के आने से पहले बारबाडोस के जंगलों अरावाक क़बीले रहा करते थे. वे लोग वेनुज़ुएला से आए थे. 17वीं सदी ईसापूर्व में. अंग्रेज़ों ने कहा, इतिहास तो हमसे शुरू होता है. तुम कौन हो? उन्होंने अरावाक क़बीले का नामोनिशान मिटा दिया. अब अंग्रेज़ ये बता सकते थे कि बारबाडोस को उन्होंने ही बसाया. इस सफ़ाई के बाद अंग्रेज़ों ने अपनी गाड़ी आगे बढ़ाई. ब्रिटिश सज़ायाफ़्ता और ग़रीब लोगों को अपने देश से बाहर भेज रहा था. कुछ लोग बारबाडोस भी लाए गए. नई कॉलोनी पनप तो रही थी, लेकिन ब्रिटेन को उससे कुछ फायदा नहीं हो रहा था. बारबाडोस में कोई क़ीमती धातु नहीं मिली. हेनरी पॉवेल को झटका लगा. फिर उसने आस-पड़ोस की कॉलोनियों में पड़ताल की. उसे पता चला कि बारबाडोस गन्ने की खेती के लिए परफ़ेक्ट जगह हो सकती है. उस समय ब्रिटेन में चीनी किसी क़ीमती धातु के बराबर मानी जाती थी. चीनी को ‘उजला सोना’ कहा जाता था. अच्छी फसल मतलब पैसा ही पैसा. गन्ने की खेती के लिए मज़दूरों की दरकार थी. ब्रिटेन, अफ़्रीका से ग़ुलामों को लेकर आया. ग़ुलामों के ख़ून-पसीने से गन्ने की खेती चल निकली. बारबाडोस बाकी कॉलोनियों की तुलना में अधिक मुनाफ़ा देने लगा. वो ब्रिटिश कल्चर को भी अपना रहा था. इसलिए, अंग्रेज़ों ने बारबाडोस को ‘लिटिल इंग्लैंड’ का नाम दिया. बारबाडोस में माहौल शांतिपूर्ण चल रहा था. फिर आया साल 1642 का. इंग्लैंड में सिविल वॉर शुरू हुआ. उस समय इंग्लैंड के राजा थे, चार्ल्स प्रथम. सिविल वॉर के बीच में ही उनका तख़्तापलट हो गया. चार्ल्स प्रथम को कुर्सी से बेदखल करने वाला उनका ही मातहत था. ओलिवर क्रॉमवेल. जब राजा का तख़्तापलट हुआ तो इसका असर बारबाडोस पर भी पड़ा. वहां सत्ता-प्रतिष्ठान दो गुटों में बंट गया. एक पक्ष चार्ल्स प्रथम के समर्थन में था, जबकि दूसरा धड़ा क्रॉमवेल की वक़ालत कर रहा था. इस झगड़े में चार्ल्स के धड़े ने बाजी मार ली. बारबाडोस के तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड फ़्रांसिस विलोबी ने इंग्लैंड से आज़ादी की घोषणा कर दी. लेकिन ब्रिटिश पार्लियामेंट पर क्रॉमवेल का नियंत्रण था. संसद ने विलोबी और उनके समर्थकों को गद्दार घोषित कर दिया. बारबाडोस के किसी भी देश से व्यापार पर रोक लगा दी गई. इसके बाद विरोध को कुचलने के लिए ब्रिटेन की रॉयल नेवी को रवाना किया गया. अक्टूबर 1651 में ब्रिटिश नेवी ने बारबाडोस को घेरे में ले लिया. लड़ाई हुई, लेकिन विलोबी की सेना उन्नीस साबित हुई. अंतत:, विलोबी को सरेंडर करना पड़ा. ब्रिटेन ने बारबाडोस को अपने नियंत्रण में ले लिया. विलोबी का विद्रोह स्वार्थपूर्ति से जुड़ा हुआ था. उसमें अश्वेत ग़ुलामों के लिए कुछ भी नहीं था. फिर भी इस घटना ने सताए लोगों को प्रेरणा दी. उन्हें बार-बार हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने शोषकों के ख़िलाफ़ लड़ाई धीमी नहीं पड़ने दी. बारबाडोस के इतिहास में अश्वेतों का सबसे बड़ा विद्रोह 1816 के साल में हुआ. नवंबर 1815 की बात है. बारबाडोस की असेंबली में इम्पीरियल रजिस्ट्री बिल लाने की बात चली. इसके तहत, ग़ुलामों का रजिस्ट्रेशन किया जाना था. ग़ुलामों को लगा कि इससे उन्हें आज़ादी मिल जाएगी. लेकिन वो बिल चर्चा के बाद रिजेक्ट कर दिया गया. इससे ग़ुलाम लोग दहशत में आ गए. उन्हें महसूस हुआ कि वे कभी आज़ाद नहीं हो पाएंगे. इस डर से ग़ुलामों ने विद्रोह का प्लान तैयार किया. इसमें अलग-अलग प्लान्टेशन्स से लीडर्स चुने गए. वे छिपकर जमा होते और आगे की प्लानिंग करते. उनकी प्लानिंग कई महीनों तक चली. आख़िरकार, अप्रैल 1816 में ईस्टर संडे की रात उन्होंने अपना काम शुरू कर दिया. सबसे पहले सेंट फ़िलिप में खेत में आग लगाई गई. ये विद्रोह की शुरुआत का संकेत था. जल्दी ही ये आग पूरे बारबाडोस में फैल गई. गोरे अंग्रेज़ मालिक राजधानी ब्रिज़टाउन भाग गए. तीन दिनों तक तांडव चला. फिर मार्शल लॉ की घोषणा कर दी गई. ब्रिटिश आर्मी और भाड़े के लठैतों ने मिलकर विद्रोह को दबा दिया. इसके बाद तो दमन का वीभत्स दौर चला. बारबाडोस में 80 दिनों तक मार्शल लॉ लागू रहा. इस दौरान दो सौ से अधिक ग़ुलामों को मौत की सज़ा दी गई. लगभग दो सौ को देशनिकाला दे दिया गया. ग़ुलामों को बेमतलब का टॉर्चर किया जाता रहा. इस विद्रोह का सबसे ख़ास आदमी था, बुसा. उसे अफ़्रीका से लाया गया था. कहा जाता है कि उसी ने पूरी क्रांति का नेतृत्व किया. उसी के नाम पर 1816 की क्रांति को ‘बुसा विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है. बुसा विद्रोह के बाद भी ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ दो और बड़े विद्रोह हुए. लेकिन वे असफ़ल साबित हुए. सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद ब्रिटेन के लिए कॉलोनियों में शासन करना मुश्किल साबित हो रहा था. 30 नवंबर 1966 को ब्रिटेन ने बारबाडोस को आज़ाद कर दिया. हालांकि, एक पेच कायम रहा. बारबाडोस को आज़ादी तो मिल गई थी. लेकिन कई चीज़ों में ब्रिटेन का दखल बरकरार रहा. इसमें सबसे बड़ा था, हेड ऑफ़ द स्टेट का पद. ये पद ब्रिटिश क्राउन के पास बना रहा. आज हम बारबाडोस की कहानी क्यों सुना रहे हैं? आज़ाद होने के 55 बरस बाद बारबाडोस ने ब्रिटेन से नाता तोड़ लिया है. पूरी तरह से. अब से ब्रिटिश क्राउन बारबाडोस का हेड ऑफ़ द स्टेट नहीं होगा. बारबाडोस दुनिया का सबसे नया गणतंत्र बन गया है. गणतंत्र की एक आसान परिभाषा है. गणतंत्र में राष्ट्राध्यक्ष जनता या जनता के प्रतिनिधि के द्वारा चुना जाता है. गणतंत्र में हेड ऑफ़ द स्टेट का पद वंशागुनत नहीं होता. 30 नवंबर को बारबाडोस की राजधानी ब्रिज़टाउन में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसमें डेमा सेंड्रा मेसन को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई. इससे पहले वो गवर्नर-जनरल के पद पर थीं. उन्होंने अपने भाषण में कहा,
रिपब्लिक बारबाडोस अपने नए मिशन पर निकल चुका है. मैं ईश्वर से कामना करती हूं कि वो सभी तूफ़ानों से जूझते हुए हमारे मुल्क़ को मंज़िल तक पहुंचाए.
इस मौके पर ब्रिटेन के प्रतिनिधि के तौर पर प्रिंस चार्ल्स आए थे. उन्होंने कहा,
इतिहास के अंधकार भरे दिनों और ग़ुलामी के दर्दनाक अत्याचार हमारे इतिहास का दाग हैं. बारबाडोस के लोगों ने उस दौर को भुलाकर अपने लिए एक नया मुकाम चुना है. उन्हें शुभकामनाएं.
बारबाडोस का ब्रिटेन से मोहभंग कोरोना के समय शुरू हुआ था. बारबाडोस का आरोप था कि सदियों तक मेवा खाने के बावजूद ज़रूरत के वक़्त ब्रिटेन ने मदद से हाथ पीछे खींच लिया. आबादी का एक धड़ा मानता है कि अगर हमें अपने ही दम पर सबकुछ करना है, तो सांकेतिक शासन क्यों बना रहे. सितंबर 2021 में इसका ऐलान किया गया और आज़ादी की 55वीं सालगिरह के मौके पर इस प्रक्रिया को अमलीजामा पहना दिया गया. बारबाडोस की आबादी लगभग तीन लाख है. वो कैरेबियन के सबसे संपन्न देशों में गिना जाता है. कैरेबियन में अभी भी कई देश ऐसे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश क्राउन को राष्ट्राध्यक्ष का दर्ज़ा दिया हुआ है. बारबाडोस के निकलने के बाद वे भी नई राहें तलाशेंगे. बारबाडोस के चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब चलते हैं वैश्विक समस्या की तरफ़. इस समय कोरोना का नया ओमीक्रॉन वेरिएंट चर्चा में है. ये सबसे पहले साउथ अफ़्रीका में पकड़ में आया था. ओमीक्रॉन को अभी तक मिले सभी कोरोना वेरिएंट्स का सरदार बताया जा रहा है. ये तेज़ी से फैलता है. आशंका ये भी है कि ये उपलब्ध वैक्सीन या पुराने संक्रमण से मिली इम्युनिटी को आसानी से भेद सकता है. WHO ने ओमीक्रॉन को ‘वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न’ घोषित किया है. यानी, इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत है. कई देशों ने इसे गंभीरता से लिया भी है. ट्रैवल बैन्स और लॉकडाउन वापस लौट रहे हैं. आज हम अपडेट्स पर बात करेंगे. - ओमीक्रॉन वेरिएंट से प्रभावित देशों की संख्या 19 पर पहुंच गई है. ओमीक्रॉन वेरिएंट का पहला मामला 24 नवंबर को साउथ अफ़्रीका में पकड़ में आया था. अभी तक इस वेरिएंट से किसी के भी मरने की ख़बर नहीं है. - इस बीच नीदरलैंड ने कहा है कि ओमीक्रॉन वेरिएंट उनके यहां एक हफ़्ते पहले से मौज़ूद था. यहां 19 और 23 नवंबर को दो लोगों के सैंपल लिए गए थे. ये दोनों लोग साउथ अफ़्रीका से ट्रैवल करके आए थे. उन दोनों की रिपोर्ट अब आई है. दोनों में ओमीक्रॉन कोरोना वेरिएंट मिला है. - ओमीक्रॉन के बढ़ते ख़तरे के बीच अमेरिका ने सभी व्यस्कों से बूस्टर डोज़ लगाने की अपील की है. सेंटर्स फ़ॉर डिजीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन (CDC) ने पहले 50 से ऊपर के लोगों को बूस्टर डोज लगाने के लिए कहा था. लेकिन अब उन्होंने अपील को यूनिवर्सल बना दिया है. अभी ये पता नहीं है कि उपलब्ध वैक्सीन ओमीक्रॉन वेरिएंट पर कितनी कारगर होगी. फिर भी कई देश एहतियात के तौर पर बूस्टर डोज को बढ़ावा दे रहे हैं. - इसके अलावा, सिंगापुर ने क़्वारंटीन-फ़्री ट्रैवल और री-ओपनिंग को कुछ समय के लिए टाल दिया है. ओमीक्रॉन वेरिएंट से संक्रमित होने वालों को होम आइसोलेशन की बजाय सरकारी अस्पताल में भर्ती होना होगा. साथ ही, बाहर से आने वाले यात्रियों को पीसीआर कोरोना टेस्ट कराना भी अनिवार्य कर दिया गया है. ओमीक्रॉन वेरिएंट के सफ़र पर हमारी नज़र बनी रहेगी. आप बने रहिए लल्लनटॉप के साथ.

Advertisement
Advertisement