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मैं एक गोरक्षक से मिली, जो मोदी से नहीं डरता

उससे मुलाकात में ऐसी बातें पता चलीं, जो कोई और नहीं जानता.

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प्रतीकात्मक इमेज.

यह लेख डेली ओ
 से लिया गया है जिसे मधुरीता आनंद ने लिखा है.  
दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.

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साल भले ही पिछला था पर समय यही था जब गोरक्षकों का उपद्रव अपने चरम पर था. वे गोरक्षा के नाम पर एक खास संप्रदाय के लोगों के खून के प्यासे बने फिर रहे थे. और गोरक्षा का तर्क देकर वे अपने अपराधों को सही ठहरा देते. गाय हमारी माता है और इसलिए उसके लिए किसी की जान लेना भी गलत नहीं है.

 16 साल का एक लड़का ज़ुनैद ख़ान एक दिन जब अपने दोस्तों के साथ घूम कर वापस घर आ रहा था. नई दिल्ली के पास बल्लभगढ़ में एक ट्रेन में उसे मार दिया गया. वो रमज़ान का महीना था और उस बच्चे की हत्या का कारण सिर्फ और सिर्फ उसका धर्म था. इससे दुखद और क्या ही हो सकता है.

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तब मैंने ऑस्ट्रियन टीवी को सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव भी दिया था.

लेकिन ये एक साल पुरानी बात है. कुछ वजहों से फिल्म बनाने में देर हुई. उसी दौरान मैंने कुछ लोगों से बातचीत की. बातचीत से मुझे लगने लगा कि गोरक्षकों का प्रभाव अब कम हो गया है और उनकी संख्या भी कम हुई है. लेकिन ऐसा था नहीं. ये कभी ख़त्म नहीं हुए बल्कि इनकी संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है. अब तो इन्हें राज्य और व्यवस्थाओं की भी सह मिल गई है.


दादरी, उत्तर प्रदेश के अख़लाक़ को गौ-मांस रखने के शक पर मार दिया गया.
दादरी, उत्तर प्रदेश के अख़लाक़ को गोमांस रखने के शक पर मार दिया गया.

मैंने एक गोरक्षक देव नागर से बात की तो उसने बताया-

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'जिन लड़कों ने अख़लाक़ को मारा था योगी आदित्यनाथ जी ने मुझे उन बच्चो को जेल से छुड़ाने की जिम्मेदारी दी थी. मैंने उन्हें जेल से बाहर निकाला भी.'

उसने कैमरे के सामने ये स्टेटमेंट दिए. उसने बताया कि वो एक कार्यकर्ता है. जब मैंने उसके काम के बारे में पूछा तो उसने बताया- 'मैं लव-ज़िहाद और गौ-रक्षा का काम करता हूं. जब जिसकी जरूरत होती है. उसी हिसाब से करता हूं.' उसके कार्ड से पता चला कि वो नोएडा के गोरक्षा दल का प्रेजिडेंट है.

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वहां पॉलिस्टर के भूरे-काले रंग के परदे लगे थे. दो सीलिंग फैन लगे थे. देव नागर एक सोफे पे बैठा था और उसके समर्थकों ने उसे चारों तरफ से घेर रखा था. उसने भगवा कुर्ता और करीने से इस्त्री किया हुआ सफ़ेद पाजामा पहन रखा था. उसकी उंगलियों में कई अंगूठियां थीं. गले में सोने की चेन भी थी. उसने हल्की दाढ़ी रखी थी. उसके हाव-भाव से उसकी सोच का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता था.

मुख्यमंत्री से उसके संबंध की बात से ही हमें कई बातों का अंदाजा लग गया. ये साफ़ हो गया था कि राज्य सरकार उनके साथ है या उन्हें बढ़ावा दे रही है. तभी उनके भीतर किसी तरह का कोई डर नहीं था.

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मैंने देव नागर से पूछा अख़लाक़ के हत्यारों को छुड़ाने का अपराधबोध नहीं होता? या गर्व होता है? उसने जवाब दिया- 'उसके फ्रिज में गाय का मांस था. इस बात पर लड़कों का गुस्सा करना जायज ही था.'

अंधभक्ति, अतार्किकता ही इन गोरक्षकों की पहचान हो जैसे. जब उससे ये पूछा कि गाय में ऐसा क्या है कि उसके लिए किसी इंसान की जान लेने को भी तुम सही साबित कर रहे हो?  इस सवाल पर अचानक जैसे उसे गुस्सा आ गया हो. उसने इस सवाल का बड़ा ही 'वैज्ञानिक' जवाब दिया और कहा- 'गाय ही एक ऐसी पशु है जो ऑक्सीजन छोड़ती है. ऑक्सीजन पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी है. अगर वो ऑक्सीजन ना छोड़े तो हम सब ज़िंदा नहीं बचेंगे.

मैंने उसे समझाया कि नहीं ऐसा नहीं है. ये गलत सूचना है. लेकिन उसपर मेरी इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ा. वो लगातार बोलता ही रहा. उसने जैसे बेहद महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया-

क्या आपको पता है भोपाल गैस काण्ड में सिर्फ उन्हीं की जान बच पाई थी जो अपने घर में उपलों का इस्तेमाल करते थे.

मैंने आगे उससे कोई बहस नहीं की. बस आश्चर्य से  उसे देखती रही. तब भी उसने बोलना नहीं छोड़ा. उसकी बातों और उसके पूरे व्यवहार को देख कर कोई भी ये समझ सकता है कि उसका ब्रेनवाश किया गया है. उसने अपना फोन मेरी तरफ बढ़ाते हुए बताया कि उसके फोन में पूरे देश के गो-रक्षकों से जुड़े लगभग 750 वॉट्सऐप ग्रुप हैं.

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उसने बताया कि जब भी कोई ट्रक राजस्थान से उत्तरप्रदेश की तरफ आ रहा होता है. ये गोरक्षक हमें उस की सूचना दे देते हैं.  उसने कहा- 'हम तुरंत उस सूचना पर कार्यवाई करते हैं. कोई कसाई जब अपने ट्रक में गायों को भर के ले आ रहा होता है तब काम पूरा करने में सिर्फ़ 5 से 10  मिनट लगते हैं. लेकिन अगर कोई गाय ज़ख्मी होती है तब अधिक समय लग जाता है क्योंकि गायों को अस्पताल भी ले जाना होता है.'

'5 से 10 मिनट के भीतर रिऐक्शन देने से आपका क्या मतलब है?'
'हम पहले 100 नंबर डायल कर पुलिस को खबर करते हैं लेकिन अक्सर पुलिस के आने से पहले ही आसपास के लोग ड्राइवर की पिटाई कर देते हैं.'
'कौन लोग?'
'उसी इलाके के लोग. गौमाता की ऐसी हालत देख कर ये लोग पागल हो जाते हैं.'
इस बातचीत के दौरान मैं लगतार उसे ये समझाती रही कि उन्हें लोगों की या कसाइयों की जान नहीं लेनी चाहिए. अगर वे सचमुच गायों की रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसी किसी भी हरकत से बचना चाहिए जो गोरक्षकों को बदनाम करने वाली हैं. मैंने उसे बताया कि हाल ही में प्रधानमंत्री ने गोरक्षकों को 'गुंडा' कहा है.
इस पर वो कहने लगा- 'मोदी ने ये भी कहा था कि वे उनकी पूरी लिस्ट भी निकलवाएंगे.' लेकिन क्या हुआ? वो लिस्ट कहां है? दिखाएं वो लिस्ट. हम तो इंतज़ार ही कर रहे हैं.'
उसने प्रधानमंत्री को सिर्फ 'मोदी' कहकर सम्बोधित किया. ऐसा लगा जैसे प्रधानमंत्री उसके जैसे ही किसी गोरक्षक वॉट्सऐप ग्रुप का हिस्सा हो.
मैं काफी देर तक उसे समझाती रही लेकिन फिर मैं समझ गई कि उसे समझाना दीवार पर सिर मारने जैसा है. वैसे भी उसे समझाने के लिए अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा था.
मैंने ऊंची आवाज़ में 'कट' कह कर जैसे अपना पूरा गुस्सा निकाला. कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था. नागर के समर्थक भी थोड़े असहज से हो गए थे. पंखा अपनी गति से लगातार चल रहा था. मेरे साथ के लोग सामान्य दिखने का भरसक प्रयास कर रहे थे. ये अलग बात है कि भीतर से कोई सामान्य नहीं रह गया था.
तभी देव नागर ने कहा-' चाय और पापड़ लीजिए प्लीज़. '
उसी दोपहर ज़ुनैद  (16 साल का लड़का जिसकी धर्म के  नाम पर हत्या कर दी गई थी) के घर की तरफ जाते हुए मैं देश की हालत के बारे सोच रही थी.
ज़ुनैद का परिवार वाले अब भी उसकी मौत के गम से बाहर नहीं आए हैं. उनकी मां अब भी उसी डर के साए में जी रही है. उसकी आंखें हमेशा अपने बेटों पर ही टिकी रहती हैं.  डरी-सहमी सी.
ज़ुनैद की मां सायरा बानो
ज़ुनैद की मां सायरा बानो

जब तक कोई बहुत ज़रूरी काम नहीं होता वो घर से बाहर नही जाते. जाते भी हैं तो अकेले नहीं जाते. ज़ुनैद की तो हत्या ही कर दी गई, सायरा बानो के के दो बेटों- हाशिम और शाकिर पर भी हमले हुए. शाकिर अस्पताल में कई दिनों तक अपनी ज़िंदगी और मौत से जूझता रहा.

उनकी मां आज भी ठीक-ठाक नहीं समझ पाई हैं कि उनके बच्चों के साथ ऐसा क्यों किया गया- 'वो हमेशा खुश रहा करता था. हमें किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी. वह मुझसे पैसे लेकर कहीं घूमने निकला था और फिर कभी नहीं लौटा.'

वो रोने लगीं. लेकिन जल्द ही चुप हुईं और मजबूत आवाज़ में कहा- 'ये सब राजनीति है. हम सबके खून का एक ही रंग है. अगर आपको इस बात का यकीन नहीं तो अपनी और मेरी ऊंगलियां काट कर देखो लो, हम दोनों के खून का रंग लाल ही होगा.
मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें सरकार की तरफ से कोई मुआवज़ा मिला? 'नहीं, कुछ नहीं मिला. उन्हें लगता है कि हम उनसे पैसे ऐंठना चाहते हैं.
ज़ुनैद का भाई शाकिर ज़ख़्मी हालत में ट्रेन के कम्पार्टमेंट में पड़ा था. वहीं उसकी आंखों के सामने उसके भाई को मार डाला गया. वो उस दिन को याद करते हुए कहता है- 'उस भरी हुई बोगी में किसी ने भी मेरे भाई को बचाने की कोशिश नहीं की. कोई उसे बचाने नहीं आया. हमें बचाने की जगह वो चीख-चीख कर कह रहे थे- मार डालो इन्हें, मार डालो. ये गाय खाते हैं. इन्हें मार ड़ालो.' मुझे अब भी वो आवाज़ें सुनाई देती हैं.
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मैंने उससे पूछा कि कहीं अब उसका इस देश और यहां के लोगों पर से यकीन तो नहीं उठ गया? 'मैं अब भी उस डर से नहीं निकल पाया हूं. लेकिन जब कुछ लोग हमारे पक्ष में सामने आए. हमारा साथ दिया तब लगा कि अब भी कुछ लोग हैं जिनमें इंसानियत बची हुई है. इस देश में अब भी ऐसे लोग बचे हैं जिनके लिए धर्म-जाति से ज़्यादा ज़रूरी इंसान की ज़िंदगी है.'

उन्होंने अपनी कुछ ज़मीन बेचकर ज़ुनैद के नाम पर एक स्कूल खोलने का फैसला किया है. सायरा ने बताया कि उनका बेटा हमेशा लोगों की मदद करना चाहता था. उसके नाम पर स्कूल खोल कर हम उसकी इच्छा पूरी करना चाहते हैं.

घर लौटने तक मेरी हालत अजीब सी हो चुकी थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे अपने आसपास घट रही इन घटनाओं को देखकर गुस्से से भर उठना चाहिए या दुःख से रो पड़ना चाहिए. इन सब बातों को अपने दिमाग से निकालने के लिए मैं घंटो दौड़ती रही, एक्सरसाइज किए. मुझे अपनी नींद पूरी करनी थी. अगले दिन के काम के लिए तैयार होना था.

अब हम गोरक्षकों के गढ़ यानी हरियाणा के जींद की तरफ बढ़ चले थे. हरियाणा के गौ-रक्षा दल के मुख्यालय की तरफ. जहां गुस्से, नफरत और हथियारों से लैस गोरक्षकों का हुजूम था.




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