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दिल्ली ग़ालिब से ज्यादा गालीबाजों की हुई पड़ी थी

ग़ालिब इन दिल्ली, फिर से...

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'ग़ालिब इन दिल्ली' के एक सीन में ग़ालिब बने 'टॉम आल्टर' (सांकेतिक चित्र)
साल 2017 हुआ. ग़ालिब एक बार फिर से दिल्ली में थे. दिल्ली में आदमी मेट्रो पकड़ने को ही होता है, जब नहीं होता तो सब्जी लेने निकल जाता है. दिल्ली में सब्जी लेना टास्क होता है. भगवान आसमान में क्यों रहते हैं? क्योंकि वो सब्जी लेना अफोर्ड नहीं कर सकते. तो जब चचा सब्जी लेने पहुंचे तो टमाटर का दाम पूछ बैठे. दाम सुनने के बाद चचा को गलती का भान हुआ तो उन्होंने फरमाया:
उग रही है किचन गार्डन में सब्जी 'ग़ालिब' हम बाजार में हैं और घर में बहार आई है.
सब्जी लेने के लिए ग़ालिब सुबह ही मेट्रो पकड़ने चल दिए थे. उस समय उन्होंने कहा:
रंगे-शिकस्ता सुबहे-बहारे-नज़ारा है, ये वक़्त है पीली से नीली लाइन मेट्रो बदलने का.
मेट्रो में ग़ालिब की जान सूखती रहती थी, कभी कोई पांव कुचल देता तो कभी कोई नाख़ून का पोर साथ लिए जाता. एक बार जब ग़ालिब मेट्रो के गेट पर भीड़ के कारण औंधे पड़े मिले तो वजह पूछने पर उन्होंने पोस्ट किया:
दो-टके की मेट्रो पे ख़त्त-ए-फ़ना खींच, बांहें फटीं, सब्जी गई, कोई बटुआ भी ले गया नीच.
ग़ालिब आम दिनों में काम करते-करते थके रहते थे. मॉर्निंग शिफ्ट में ऑफिस जाते और आधी रात को लौटते नतीजा ये कि स्लीपिंग डिसऑर्डर सा हो गया. नींद की कमीं पर ग़ालिब ने फरमाया:
मुंद गईं खोलते ही खोलते आंखें साहिब, बॉस लाए मॉर्निंग शिफ्ट पे निकलने का न कोई वक़्त.
ग़ालिब गली कासिम जान में रहते-रहते चट गए थे. घर से निकलते तो बगल में आइडिया वाले ने सिम बेचने की दुकान खोल ली थी. दिल्ली ग़ालिब से ज्यादा गालीबाजों की हुई पड़ी थी. ऐसे में ग़ालिब ने तय किया कि वो ग्रेटर नोएडा में फ़्लैट लेंगे. फ़्लैट की तलाश के दौरान चचा ने पाया कि फ़्लैट से मुश्किल पजेशन पाना है. फ़्लैट के दाम सुन चचा को लगता कि अंग्रेजों ने देश का कब्जा नहीं छोड़ा है और बिल्डर बन कर लूट रहे हैं, ऐसे दिनों में चचा के कीबोर्ड ने टीपा:
ऐ दिल-ए-ना-आक़िबत-अंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर, कौन ला सकता है फ़्लैट वो रेडी-टू-पजेशन-ए-सस्ता.
जैसे-तैसे ग़ालिब ने एक बड़े बिल्डर्स से घर ले लिया. इस बीच कंपनी खुद को दीवालिया घोषित कर गई. कहां शेर और ग़ज़ल में डूबे रहने वाले ग़ालिब उनकी उम्र अब इनसॉलवंसी रेजॉलूशन फॉर्म भरने में बीती जा रही थी. टूटे दिल से किराए के कमरे में बैठे हुए ग़ालिब बस ये लिख पाए कि:
फॉर्म को चाहिए इक उम्र असर होते तक, कौन जीता है क्रेडिटर क्लेम के रजिस्टर होते तक.
लेकिन सिर्फ घर नहीं था जिसने ग़ालिब को हैरान किया था. ग़ालिब फेसबुक पर पोस्ट चोरों से भी हैरान थे. इधर वो कुछ लिख रहे होते. उधर वो ट्विटर पर चढ़ जाता. उन्होंने जब तक दो लाइनें लिखी होतीं व्हाट्सऐप पर उसकी पैरोडी निकल जाती. और तो और ग़ालिब कुछ पूरा भी करते तो कोई खुली पीठ वाली लड़की का फोटो थंबनेल में लगाता और उनके लिखे को यूट्यूब पर बोलकर ट्रेंड हो जाता. ये देख चचा ने कुछ कहा और हमसे विदा ली:
इंटरनेट में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का, उसी को देख कर पछताते हैं जिसे लिखने में दम निकले.

मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में दी लल्लन-टॉप में और पढ़ें: सलमान के डायलॉग्स, ग़ालिब के शेर - मज्जानि लाईफ! खुशनसीब थे ग़ालिब जो फेसबुक युग में पैदा न हुए मिर्ज़ा ग़ालिब ने आम खाने को लेकर जो कहा था, जानकर उनपर और भी प्यार आता है
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