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खुशनसीब थे ग़ालिब जो फेसबुक युग में पैदा न हुए

गालिब चचा के साथ एक अच्छी बात ये रही कि वो फेसबुक के युग में पैदा नहीं हुए. नहीं तो सारा टाइम उनका इधर कट जाता. शेरो शायरी का टाइम ही नहीं मिलता. उसके लिए पैसा तो बिल्कुल नहीं मिलता. बस लाइक्स और शेयर से संतोष करना पड़ता.  लेकिन वो नहीं पैदा हुए तो क्या. उनकी शायरी तो अमर है. जो फेसबुुक पर कॉपी पेस्ट होती रहती है. इनमें से तमाम शेर ऐसे होते हैं जिनमें बीच में जबरन गालिब का नाम खोंस दिया जाता है. शेर लल्लू रंगीला का होता है. ऐसे शेर के स्क्रीनशॉट देने से अच्छा रहे कि गालिब का थोड़ा सा हुनर आ जाए. देख लो. ऐसी होती है शायरी.

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