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मिर्ज़ा ग़ालिब ने आम खाने को लेकर जो कहा था, जानकर उनपर और भी प्यार आता है

ये आर्टिकल राना सफवी ने डेली ओ के लिए लिखा था. वे इतिहासकार, ब्लॉगर और राइटर हैं. उनकी कई किताबों में से एक ‘वेयर स्टोन्स स्पीक’ भी है. आर्टिकल में लिखे विचार उनके निजी हैं. इन्हें यहां हिंदी में दी लल्लनटॉप की रुचिका प्रस्तुत कर रही हैं.


 

 

हम बहुत शुक्रगुज़ार हैं अल्ताफ़ हुसैन हाली के, जिन्होंने मशहूर शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब की एक ख़ूबसूरत जीवनी लिखी. मुझ जैसे लोग, जिन्हें खाना खाने और बनाने का बहुत शौक है, उन्हें सबसे ज़्यादा इस जीवनी के उस हिस्से ने लुभाया होगा, जिसमें ग़ालिब की खाने की आदतों का ज़िक्र है.

हाली लिखते हैं कि ग़ालिब सुबह के नाश्ते में महज़ एक ग्लास बादाम का दूध लेते थे. उन्हें गोश्त भी बहुत पसंद था, वो अपने हर भोजन में गोश्त खाते थे. हाली यह भी लिखते हैं कि अपने आखिरी दिनों में ग़ालिब की भूख मर सी गई थी. फिर भी रोज़ लंच में उनके सामने 250 ग्राम गोश्त का बना कोरमा पेश किया जाता था.

गोश्त के टुकड़े और करी, दो अलग-अलग कटोरों में सर्व किए जाते थे. फुलके के ऊपरी हिस्से को करी मे भिगोकर उसे दूसरे कटोरे में रखकर ग़ालिब को दिया जाता था. एक कटोरे में दही भी सर्व होता था. कभी कभार एक कटोरे में अण्डे की ज़रदी भी होती थी.

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मिर्ज़ा ग़ालिब की पसंद: कबाब 

शाम के समय, वो शामी कबाक और सीख कबाब खाया करते थे. उन्हें ज़्यादा भूख नहीं लगती थी, लेकिन वो जो खाते थे, उसका ख़ास ध्यान रखते थे. एक दिन जब उनके दोपहर के खाने के लिए दस्तरख़ान लगाया गया, तो वहां बहुत सारे मिट्टी के बर्तन थे लेकिन उनमें खाना बहुत कम था. ग़ालिब मुस्कुराए और उन्होंने कहा, ‘अगर आप बर्तनों की संख्या पर ध्यान देंगे, तो आपको मेरा दस्तरख़ान यज़ीद के दस्तरख़ान जैसा लगेगा लेकिन जैसे ही खाने की मात्रा पर ध्यान जाएगा, तो दस्तरख़ान बायज़ीद के दस्तरख़ान जैसा नज़र आएगा.’

यज़ीद उमय्यद वंश के दूसरे खलीफा थे. जो पैग़ंबर के पोते हुसैन इब्न अली के साथ किए गए अधर्म और अत्याचार के लिए मशहूर थे. जिसके चलते हुसैन की कर्बला की लड़ाई में मौत हो गई थी. बायज़ीद बस्तामी 9वीं शताब्दी के एक मशहूर फ़ारसी सूफ़ी थे, जिन्हें उनकी भक्ति के लिए जाना जाता है.

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मिर्ज़ा ग़ालिब का पसंदीदा फल: आम

जब हम भारत में गर्मी के मौसम की बात करते हैं, तब हमारे दिमाग में आम आता है. और जब हम आम के बारे में सोचते हैं, तब हम मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में सोतचे हैं. वो आम के बहुत बड़े शौकीन थे. और गर्मी के मौसम में ग़ालिब के दोस्त अपने बागानों से आम की विभिन्न किस्में उन्हें भेजते थे. जितने आम दे दो, इस शायर के लिए वो कम ही पड़ते थे.

ग़ालिब का एक मशहूर क़िस्सा है. एक बार वो मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फर और उनके कुछ साथियों के साथ बाग-ए-हयात बख्श और किला-ए-मुबारक (लाल किला) में टहल रहे थे. वहां अलग-अलग किस्म के आम के पेड़ थे, जो कि सिर्फ़ बादशाह, शहज़ादों और हरम की औरतों के लिए थे.

चलते-चलते ग़ालिब हरेक आम को बड़े ध्यान से देख रहे थे.

बादशाह ने पूछा, ‘आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

शायर ने बड़ी गंभीरते से कहा, ‘मेरे मालिक और मेरे रहनुमा, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसे खाने वाले का नाम लिखा होता है. मैं अपने दादा, पिता और अपना नाम तलाश रहा हूं.’

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मिर्ज़ा ग़ालिब बहादुर शाह ज़फर के समय के शायर हैं.

बादशाह मुस्कुराए और उन्होंने शाम तक मिर्ज़ा ग़ालिब के घर एक बास्केट भर आम भिजवा दिए. एक बार वो अपने बेहद करीबी दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान के साथ अपने घर के बरामदे में बैठे थे. उनके इस दोस्त को आम बिलकुल नहीं पसंद थे. तभी वहां से एक गधा-गाड़ी गुज़री. गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूंगा और अपना मुंह हटा लिया, फिर चलता बना.

हकीम साहब मिर्ज़ा ग़ालिब की तरफ़ मुड़े और तुरंत कहा, ‘देखो, यहां तक कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’

ग़ालिब ने जवाब दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

एक बार मौलाना फ़ज़्ल-ए-हक़ और कुछ और जनाब, आम की अलग-अलग किस्मों के बारे में बात कर रहे थे. मिर्ज़ा ग़ालिब भी वहां मौजूद थे. जब सबने अपनी-अपनी राय दे दी, तब मौलाना फ़ज़्ल-ए-हक़, मिर्ज़ा की तरफ़ मुड़े और उनकी राय पूछी. ग़ालिब मुस्कुराए और कहा, ‘मेरे दोस्त, मेरी नज़र में, आम में महज़ दो चीज़े ज़रूरी होती हैं: वो बहुत मीठे होने चाहिए, और वो बहुत सारे होने चाहिए.’

मिर्ज़ा ग़ालिब के दोस्त उन्हें गिफ़्ट में हमेशा आम देते थे. इसके बावजूद वो कभी आम से बोर नहीं हुए.


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