शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है. उनके साथ पांच और विधायक शपथ लेकर बंगाल की नई कैबिनेट में शामिल हुए हैं. इनमें दिलीप घोष और अग्निमित्रा पॉल समेत बीजेपी के कद्दावर नेताओं का नाम शामिल है. शनिवार, 9 मई को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में राज्यपाल आरएन रवि ने उन्हें शपथ दिलाई. मंत्रियों के विभागों का बंटवारा बाद में होगा. तब तक उनके बारे में थोड़ा विस्तार से जान लेते हैं.
बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार के 5 मंत्री कौन हैं? CM शुभेंदु अधिकारी के साथ ली शपथ
Suvendu Adhikari के साथ पांच और विधायक शपथ लेकर बंगाल कैबिनेट में शामिल हुए हैं. इनमें दिलीप घोष (Dilip Ghosh) और अग्निमित्रा पॉल (Agnimitra Paul) जैसे बीजेपी के कद्दावर नेताओं का नाम भी शामिल है. इनके बारे में थोड़ा विस्तार से जान लेते हैं.


पश्चिम बंगाल की पहली बीजेपी सरकार में अग्निमित्रा पॉल (51) कैबिनेट में शामिल इकलौती महिला मंत्री हैं. इस बार चुनाव में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तापस बनर्जी को 40,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया. पॉल आसनसोल दक्षिण सीट से विधायक चुनी गईं है. कुछ हलकों में उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा था.

राजनीति में आने से पहले अग्निमित्रा पॉल जानी-मानी फैशन डिजाइनर थीं. उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती, श्रीदेवी और हेमा मालिनी जैसी बॉलीवुड हस्तियों के लिए कपड़े डिजाइन किए हैं. साल 2019 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और बीजेपी में शामिल हो गईं. अपनी कड़ी मेहनत और साफ-सुथरी छवि की वजह से वो बहुत कम समय में 'बीजेपी महिला मोर्चा' (महिला विंग) की अध्यक्ष बन गईं. उन्होंने पूरे बंगाल में घूम-घूमकर महिलाओं को पार्टी से जोड़ने का काम किया.
पॉल ने 2021 में आसनसोल दक्षिण सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा. इस कड़े मुकाबले में उन्होंने टीएमसी की उम्मीदवार और अभिनेत्री सायनी घोष को करीब 4 हजार 487 वोटों के अंतर से हराया था. यह जीत बीजेपी के लिए खास थी क्योंकि यह सीट पिछले 10 सालों से टीएमसी के पास थी. उन्होंने जमीनी स्तर पर अपनी योग्यता साबित की, जिससे पार्टी में उनका कद बढ़ा.

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, 7 जनवरी, 2026 को अग्निमित्रा को बीजेपी की पश्चिम बंगाल इकाई का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया. अब सरकार में उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है. हालांकि, अग्निमित्रा पॉल भी विवादों में घिरी रही हैं. चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनके खिलाफ गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने, दंगा करने और विरोध-प्रदर्शन से जुड़े 23 क्रिमिनल केस पेंडिंग हैं. हालांकि, उन्हें किसी भी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है.
बीजेपी ने मंत्री क्यों बनाया?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले 15 सालों से ममता बनर्जी ही 'महिला शक्ति' का एकमात्र बड़ा चेहरा थीं. टीएमसी का कोर वोटर बेस महिलाएं रही हैं. बीजेपी को एक ऐसी महिला नेता की सख्त जरूरत थी जो ममता बनर्जी की आक्रामक शैली का जवाब दे सके और बंगाली महिलाओं के साथ भी कनेक्ट कर सके. अग्निमित्रा इस कसौटी पर फिट बैठती हैं. पॉल को कैबिनेट में शामिल करके बीजेपी यह मैसेज देना चाहती है कि उसके पास भी बंगाल में एक सशक्त महिला नेतृत्व है. विपक्ष 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (33% महिला आरक्षण) को लेकर भी बीजेपी को घेरता रहा है. इसलिए अपनी पहली ही सरकार में किसी मजबूत महिला को मंत्री बनाना पार्टी की 'नैतिक मजबूरी' और 'रणनीति' दोनों थी.
दिलीप घोषदिलीप घोष पश्चिम बंगाल बीजेपी के सबसे कद्दावर और पुराने नेताओं में से एक हैं. वो पूर्व में पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद भी रह चुके हैं. उन्हें बंगाल में बीजेपी का ‘असली आर्किटेक्ट’ माना जाता है. जब बंगाल में बीजेपी की गिनती बहुत कम सीटों पर होती थी, तब उन्होंने ही गांव-गांव घूमकर पार्टी का संगठन खड़ा किया था. इस चुनाव में उन्होंने खड़गपुर सदर सीट से 30 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से बड़ी जीत दर्ज की है.

इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दिलीप घोष राजनीति में आने से पहले एक RSS प्रचारक थे, जो बंगाल की राजनीतिक सुर्खियों से दूर चुपचाप अपना काम कर रहे थे. पश्चिम मेदिनीपुर जिले में जन्मे घोष 1984 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए और संगठन के भीतर दशकों बिताए. यहां उन्होंने कैडर-बिल्डिंग, बूथ मैनेजमेंट और वैचारिक लामबंदी के गुर सीखे.

यही स्किल्स बाद में बंगाल में काम आए. कई सालों तक घोष ने पर्दे के पीछे रहकर ही काम किया. 1999 से 2007 के बीच उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए RSS प्रभारी के तौर पर काम किया. घोष ने पूर्व RSS प्रमुख केएस सुदर्शन के साथ भी करीब से काम किया. साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पीएम बने तो बीजेपी ने बंगाल पर ध्यान देना शुरू किया. RSS ने दिलीप को पार्टी की बंगाल इकाई का महासचिव बना दिया. एक साल बाद उन्हें बंगाल बीजेपी का अध्यक्ष बना दिया गया. ठीक उस समय जब राज्य में पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी न के बराबर थी.
बीजेपी ने मंत्री क्यों बनाया?
दिलीप घोष पार्टी के पुराने और वफादार नेता हैं. जब कोई बीजेपी के साथ नहीं था, तब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली थी. पार्टी ने उनकी इसी पुरानी मेहनत का इनाम उन्हें मंत्री पद देकर दिया है. इसके अलावा वे अपनी बयानबाजी और हिन्दुत्ववादी छवि के लिए भी जाने जाते हैं. शपथ लेने से दो दिन पहले ही दिलीप घोष ने ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका हिसाब’ वाला नारा दिया था. बीजेपी अपनी पहली सरकार में उनके जरिए ‘लॉ एंड आर्डर’ को लेकर एक सख्त संदेश देना चाहती है.

शुभेंदु अधिकारी टीएमसी से आए हुए नेता हैं, जबकि दिलीप घोष बीजेपी के पुराने कैडर का चेहरा हैं. इन दोनों को साथ रखकर बीजेपी ने अपने पुराने कार्यकर्ताओं और नए समर्थकों के बीच एक संतुलन बनाया है. दिलीप एक किसान परिवार से आते हैं. इससे आम जनता और खासकर ग्रामीण इलाकों के वोटरों में उनके प्रति काफी भरोसा है.
अशोक कीर्तनियाबोंगांव उत्तर से दो बार विधायक रहे अशोक कीर्तनिया ने भी मंत्री पद की शपथ ली है. उन्हें बंगाल के सबसे प्रभावशाली मतुआ समुदाय का एक मजबूत नेता माना जाता है. इस समुदाय का वोट बैंक कई जिलों में फैला है, जिसे उन्होंने बीजेपी के पक्ष में लामबंद करने में बड़ी भूमिका निभाई. अशोक ने 2021 के बाद 2026 के चुनावों में भी अपनी सीट को बरकरार रखा. इस बार उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के बिस्वजीत दास को 40,000 से ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से हराया.

बीजेपी ने मंत्री क्यों बनाया?
बंगाल में पहली बार सरकार बनाने वाली बीजेपी ने अपने मंत्रिमंडल में हर बड़े समुदाय को जगह दी है. अशोक कीर्तनिया को मंत्री बनाकर बीजेपी ने SC (अनुसूचित जाति) और खासकर मतुआ वोटरों को यह मैसेज दिया है कि सरकार में उनकी सीधी भागीदारी है. वे पिछले कई सालों से बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं.

मतुआ बहुल क्षेत्रों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने और शरणार्थी वोटों को पार्टी से जोड़ने में अशोक कीर्तनिया का बड़ा हाथ रहा है. बोंगांव का इलाका बांग्लादेश सीमा से सटा है, जहां घुसपैठ और नागरिकता जैसे मुद्दे अहम हैं. अशोक कीर्तनिया जैसे स्थानीय नेता को मंत्री बनाकर बीजेपी इन मुद्दों पर अपना रुख और मजबूत करना चाहती है.
क्षुदीराम टुडूक्षुदीराम टुडू पश्चिम बंगाल में बीजेपी के एक कद्दावर आदिवासी नेता हैं. राजनीति में आने से पहले वह एक सरकारी स्कूल में टीचर थे. उन्होंने इस चुनाव में रानीबांध (ST) सीट से जीत दर्ज की है. क्षुदीराम ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार को 52,000 से भी ज्यादा वोटों के अंतर से हराया. वे पश्चिम बंगाल ‘बीजेपी एसटी मोर्चा’ के पूर्व प्रमुख और पार्टी की आदिवासी शाखा के राष्ट्रीय सचिव हैं.

जंगलमहल और बांकुड़ा जैसे आदिवासी इलाकों में उन्होंने बीजेपी के लिए जमीन तैयार की. क्षुदीराम ने आदिवासियों के हक और जंगलमहल के विकास के मुद्दों को बहुत मजबूती से उठाया. उन्होंने सिर पर पीले रंग का पारंपरिक गमछा बांधकर संथाली भाषा में मंत्री पद की शपथ ली. इस तरह उन्होंने अपने समुदाय और संस्कृति के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की. इससे आदिवासी समाज का बीजेपी पर भरोसा और बढ़ा.
बीजेपी ने मंत्री क्यों बनाया?
बीजेपी को इस बार जंगलमहल (बांकुड़ा, पुरुलिया, झाड़ग्राम) में जबरदस्त जीत मिली है. बंगाल में करीब 6% आदिवासी आबादी है. क्षुदीराम टुडू को मंत्री बनाकर पार्टी ने इस पूरे इलाके के लोगों को सरकार में अपनी भागीदारी का एहसास कराया है. इसके अलावा क्षुदीराम पर एक भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं है. उनकी 'पढ़े-लिखे और ईमानदार शिक्षक' वाली छवि बीजेपी के लिए बहुत फायदेमंद रहेगी.

निसिथ प्रमाणिक पश्चिम बंगाल बीजेपी के युवा नेता हैं. 2019 में वे टीएमसी छोड़कर बीजेपी में आए. पार्टी के टिकट पर कूचबिहार सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. उन्होंने इस इलाके में बीजेपी की जड़ें बहुत मजबूत कीं. इसके बाद उन्होंने 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ा और दिनहाटा सीट से जीत हासिल की लेकिन सांसद बने रहने के लिए इस्तीफा दे दिया. इस विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने माथाभांगा सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की.

बीजेपी ने मंत्री क्यों बनाया?
निसिथ केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री भी रह चुके हैं और मोदी सरकार के सबसे युवा मंत्रियों में से एक हैं. वे खुद राजबंशी समुदाय से आते हैं और इस समुदाय के लोगों के बीच उनकी बहुत गहरी पकड़ है. उत्तर बंगाल के चुनावों में राजबंशी वोटों ने बीजेपी की जीत में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. बीजेपी निसिथ प्रमाणिक को बंगाल में पार्टी के युवा नेतृत्व के तौर पर देखती है.
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मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारीबीजेपी ने पश्चिम बंगाल में पहला विधानसभा चुनाव साल 1982 में लड़ा था. पार्टी को खाता खोलने में 34 साल लग गए और 2016 में उसने 3 सीटें जीतीं. तब पार्टी का वोट शेयर 10.3% था. 2021 में बीजेपी ने 38.4% वोट शेयर के साथ 77 सीटें हासिल कीं. इस बार पार्टी ने 45.84% वोट शेयर के साथ 207 सीटें हासिल कीं है. इस जीत का सेहरा शुभेंदु अधिकारी के सिर पर सजा है. उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है.
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