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मैंने वॉट्सऐप क्यों छोड़ा?

ये जानकर आप भी अपने फोन से वॉट्सऐप हटा देंगे.

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सभी फ़ोटो सांकेतिक हैं.

यह लेख डेली ओ से लिया गया है जिसे आरुषि चड्ढा ने लिखा है.   दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.

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जब भी मैं लाइफस्टाइल से जुड़ा कोई आर्टिकल लिखती हूं ऐसा लगता है जैसे मैं किसी आध्यात्मिक ज्ञान से गुजर रही हूं. लेकिन ये भी है कि इसी बहाने कम से कम मैं कई चीजों को लेकर जागरुक रह पाती हूं.

चलिए तो फिर आज ये जान लीजिए कि वॉट्सऐप आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं. जानती हूं कि आप यही कहेंगे कि इसमें किसी ऐप की क्या गलती, गलती तो उसे इस्तेमाल करने वालों की है. लेकिन अगर कोई चीज सकारात्मक और अच्छी चीजों पर हावी हो जाए, क्या तब भी उसे ज़रूरी कहा जाएगा? अगर इस तरह की कोई सर्विस या तकनीक इंसान की कमजोरी बन जाए या उसके आम जीवन को बुरी तरह प्रभावित करने लगे, क्या तब भी उसे सामान्य तकनीकी टूल ही समझा जाए?

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इस बारे में मेरे भी कुछ निजी अनुभव हैं. लगभग तीन साल से मेरे पास फोन है और तभी से मैं वॉट्सऐप भी इस्तेमाल कर रही हूं. शुरू के दिनों में मैं इस बात को लेकर बहुत सावधान रहती थी कि कहीं और लोगों की तरह मुझे भी इसकी लत ना लग जाए. लेकिन इतनी सावधानी के बाद भी मेरे साथ कुछ वैसा ही हुआ जैसे फिल्मी सितारों के साथ होता है. जैसे पहले तो वे कोई एक ख़ास सीन करने से मना कर देते हैं लेकिन दूसरी ही फिल्म या सीन में वही करते दिखाई पड़ते हैं.

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असल में हमेशा से मेरा एक ही शौक रहा है- पढ़ना. लेकिन इस ‘मैसेज-सेवा’ के आ जाने से मेरे पढ़ने का शौक धीरे-धीरे ख़तम सा होने लगा. पढ़ाई से मेरा ध्यान भटकने लगा. मैं दिन में कई बार वॉट्सऐप खोलती, उसे देखती. एक घंटे के भीतर न जाने कितनी बार मैं मैसेज चेक किया करती. वॉट्सऐप चेक करने के अलावा अगर किसी दूसरे काम के लिए भी अपना फोन उठाती तब भी मैं वॉट्सऐप के नोटिफिकेशन देख खुद को उसे चेक करने से नहीं रोक पाती थी. मेरे माता-पिता भी मुझे समझाते कि मुझे कुछ घंटों के लिए अपना फोन स्विच ऑफ़ कर देना चाहिए. लेकिन मुझे ऐसी आदत लगी थी कि मैं फोन ऑफ़ करने के ख्याल से भी घबरा उठती. मेरी ये बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन ये सच है कि जैसे ही आप किसी चीज के आदी होते हैं वो चीज आपको सामान्य लगने लगती है. आपको उसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता.

कुछ हफ्ते पहले जब मैं अपना बायो-डाटा अपडेट करने बैठी. रुचियों (हॉबीज़) वाले खाने को देख कर मुझे लगा कि एक स्टूडेंट होकर भी मैं अपनी रुचियों पर बिलकुल ध्यान नहीं दे पा रही. अपना ज्यादातर खाली समय मैं फोन पर बर्बाद कर रही थी. मुझे पहली बार एहसास हुआ कि ये मैं क्या कर रही हूं? मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी सारी रचनात्मकता (क्रिएटीविटी) को जंग लग गया है. मुझे लगा कि ये मैं नहीं कोई और है. जैसे मेरी पहचान ही कहीं खो गई थी.

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अंततः मैंने ये फैसला किया कि मैं अपने फोन से वॉट्सऐप डीएक्टिवेट कर दूंगी. बहुत दिनों तक सोचने समझने के बाद मैं इस फैसले को अंजाम तक पहुंचा पाई. मतलब वॉट्सऐप डीएक्टिवेट कर दिया. लेकिन इसकी इतनी बुरी आदत हो गई है कि अब भी मेरी उंगलियां फोन स्क्रीन पर उस जगह जाकर टिक जाती हैं, जहां पिछले ऐप्प का लोगो हुआ करता था. लेकिन धीरे-धीरे अब इसके बिना भी मैं आराम से रहने लगी हूं. इतना ही नहीं बल्कि अब मैंने अपने पुराने शौक और रुचियों को फिर से शुरू कर रही हूं.

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कहीं मेरे ये अनुभव आपको किसी टेली मार्केटिंग प्रोडक्ट वाले विज्ञापन (बिफ़ोर और आफ़्टर) जैसे ना लगने लगें इसलिए इससे मिलती-जुलती कुछ और घटनाएं भी मैं यहां आपसे शेयर कर रही हूं.  इसी साल यानी 2018 में एक आदमी ने अपनी पत्नी की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी क्योंकि वो हर वक़्त वॉट्सऐप में खोई रहती थी. एक ये भी खबर आई कि एक वॉट्सऐप ग्रुप के एडमिन को उस ग्रुप के सदस्य ने छुरा भोंक कर मार डाला क्योंकि एडमिन ने उसे ग्रुप से निकाल दिया था.

हालांकि ‘बज़फ़ीड’ का एक लेख मेरे अनुभव के ज्यादा करीब है. इसमें लेखक ने बताया है कि नानी के देहांत के बाद उनकी मां एकदम अकेली पड़ गई थीं. वॉट्सऐप के संदेशों ने उनके इस अकेलेपन और खालीपन को दूर करने में बहुत हद तक मदद की.

वो बताते हैं- 'मां दिन के लगभग छः घंटे अपने फोन से ही चिपकी रहतीं. वो लगातार वॉट्सऐप के मैसेज इधर से उधर फॉरवर्ड किया करतीं और लगभग सारे GIF और वीडियोज़ भी देखा करतीं.

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अपने कुछ दूसरे लेखों में भी उन्होंने ऐसे और अनुभव साझा किए हैं. ये सारे लेख ऑनलइन पढ़े जा सकते हैं. लेकिन सवाल ये है कि उनका क्या जिन्हें ये लत बुरी तरह परेशान कर रही है. उनके जीवन पर नकारात्मक असर छोड़ रही है?

फ़रवरी 2017 के एक सर्वे से पता चलता है कि भारत में लगभग 20 करोड़ से भी अधिक लोग इस ऐप्प का इस्तेमाल करते हैं. वॉट्सऐप दिन-ब-दिन अपने पांव पसार रहा है. ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे अपने रोज़मर्रा के जीवन में अपना रहे है. बल्कि ये अब ज़रुरत बन चुका है. और अब इस आदत या ज़रुरत के ख़त्म होने के आसार दूर-दूर तक दिखाई भी नहीं दे रहे. अब हर ऑफिस, हर संस्था के अलग-अलग वॉट्सऐप ग्रुप बने हुए हैं. दफ़्तर से जुड़ी हर सूचना के लिए उनसे आपका जुड़ा होना जरूरी भी है. इस एक वजह से शायद मैं भी अपना अकाउंट फिर से शुरू कर दूं. मुझे इस आदत से बचने का एक ही रास्ता दिखाई पड़ता है. ये कि दफ़्तर से जुड़ी बातों या उससे जुड़े वॉट्सऐप ग्रुप के लिए एक अलग सिम रखा जाए. और सिर्फ उसी एक सिम से वॉट्सऐप से जुड़े रहें.

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इसे डीएक्टिवेट करने की सलाह मैं नहीं दे रही. बस ये कहना चाहूंगी कि सबको थोड़ा ठहरकर इस सर्विस और ऐप्प के बारे में सोचना चाहिए. सबसे जरूरी बात है कि हम सबको अपने-अपने स्तर पर ध्यान देना होगा. सोचना होगा कि मैसेज के आदान-प्रदान के तात्कालिक और क्षणिक खुशी के आकर्षण से और इस चक्र से खुद को कैसे बचाए रखें.


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