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सेफ्टी के नाम पर बच्चों को पिंजरे का पंछी मत बनाओ

बच्चे बंदिशों से नहीं सीखते.

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रायन इंटरनेशनल स्कूल वाली घटना के बाद बच्चों की सेफ्टी बहुत बड़ी समस्या बन कर उभरी है.
हमारे यहां जब भी कोई आतंकी हमला होता है, हम चौकन्ने हो जाते हैं. सामूहिक सुरक्षा के लिए हम अपनी थोड़ी बहुत आज़ादी कुर्बान करने को भी तैयार हो जाते हैं. किसी भी मॉल में घुसने से पहले गार्ड्स के प्रर्ति पूरी श्रद्दा और समर्पण के साथ अपनी कार से लेकर बैग और अपने शरीर तक की गहन तलाशी करवाते हैं. हालांकि मुझे याद नहीं आता कि आखिरी बार भारत के किस मॉल में आतंकवादियों ने घुसकर लोगों को मारा था.
हम किसी भी मॉल या भीड़ वाली जगह पर जाते हैं, तब हम संदिग्ध आतंकवादी होते हैं. ये नॉर्मल चीज़ है. सेफ्टी के लिए हम अपनी आज़ादी और ईगो से थोड़ा-बहुत समझौता तो कर ही सकते हैं. लेकिन मॉल के गार्ड्स पर कई लोगों की चेकिंग का जिम्मा रहता है, ऐसे में अगर कोई चाहे तो आसानी से अपने बैग में बंदूक या बम लाकर जिसे चाहे मार सकता है. ये गेट पर गार्ड की यूनिफॉर्म पहने लोग आतंकरोधी दस्ते के सदस्य तो होते नहीं हैं, ना ही उनकी ट्रेनिंग उस तरह से होती है. लेकिन हमें चेकिंग करवाते समय ये फील होता है कि चलो हमारे थोड़े-बहुत एडजस्टमेंट से अगर सुरक्षा व्यवस्था में बेहतरी आ सकती है तो क्या दिक्कत है. लेकिन दरअसल वो सुरक्षा नहीं महज सुरक्षा का भाव होता है. क्योंकि उससे आपकी सिक्योरिटी पर कितना असर पड़ेगा वो तो आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.
चेकिंग करवाना हमें सुरक्षा नहीं महज सुरक्षा का भाव देता है.
चेकिंग करवाना हमें सुरक्षा नहीं महज सुरक्षा का भाव देता है.

# हमें बहुत सारे अजीब उपाय सुझाए जाते हैं
रायन इंटरनेशनल स्कूल में जो हुआ, उसने अपने बच्चे को स्कूल भेजने वाले पेरेंट्स को बहुत डरा दिया है. वो अपने बच्चे को इस भरोसे के साथ स्कूल भेजते हैं कि वो सही-सलामत वापस आएगा. इसके बाद अब जो हो रहा है ये एक सामूहिक प्रतिक्रिया है बहुत नेचुरल भी है. सभी स्कूल वाले अब अपने यहां पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा का दोबारा से आंकलन कर रहे हैं. CBSE लगातार काम कर रही है, नए नियम-कानून बना रही है. न्यूज़ चैनल के डिबेट्स में बैठकर बच्चों के माता-पिता चीख-चीख कर अपना गला फाड़ रहे हैं. लेकिन सिक्योरिटी स्पेशलिस्ट और पेरेंट्स ने अबतक जो भी सुझाव या उपाय बताए हैं, वो बड़े अजीब हैं.
रायन इंटरनेशनल में हुए कांड के बाद स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है.
रायन इंटरनेशनल में हुए कांड के बाद स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है.

प्रद्युमन की स्कूल के बाथरूम में चाकू से गला काटकर हत्या कर दी गई थी. लेकिन वहां को CCTV नहीं था. उन स्पेशलिस्ट और कुछ पेरेंट्स की डिमांड ये है कि बाथरूम में भी कैमरे लगने चाहिए. लेकिन ये पहली या एकमात्र ऐसी चीज़ नहीं है.
# बच्चों से उनकी सुरक्षा के नाम पर सारी आज़ादी छीन ली जाती है
शहरों में रहने वाले बच्चों को बहुत ही सीमित आज़ादी दी जाती है. उनकी जिंदगी का रिमोट कंट्रोल या तो उनकी मां के हाथ में होता है या फिर टीचर्स के हाथ में. इस घटना के बाद तो ये चीज़ें और बढ़ेंगी. घरों में कैमरे लगेंगे, बच्चों पर कड़ी नज़र रखी जाएगी, वो किससे मिल रहा है, क्यों मिल रहा है, क्या बात कर रहा है? इन बातों का अब और भी ज़्यादा ख्याल रखा जाएगा. उन्हें अब ये भी सिखाया जाएगा कि आप सबसे डर के रहें, उनसे भी जिन्हें आप जानते तक नहीं.
बच्चों को लोगों से दूर रखा जाने लगता है जिसके चलते उन्हें कई सारी बीमारियां हो जाती हैं.
बच्चों को लोगों से दूर रखा जाने लगता है जिसके चलते उन्हें कई सारी बीमारियां हो जाती हैं.

मेरे साथ सेम यही चीज़ हुई है. मुझे बचपन से लेकर आज तक बचा कर ही रखा गया है. मकसद वही रहता है, बस उम्र के साथ कहने वाली चीज़ें बदल जाती हैं. जैसे बचपन में तो आप 'बच्चे' ही होते हैं. उसके बाद आप स्कूल जाने लगते हैं तो वो आपकी बचपन की जगह आपका बिगड़ना इस्तेमाल किया जाता है. मां को हिदायद दी जाती है कि आपको किस लड़के से दूर रखना है ताकि बिगड़े नहीं. फिर जवानी आती, यहां आपका सबसे ज़्यादा उल्लू खिंचा जाता है. यहां आपको सब कुछ मना करके बोला जाता है कि 'तुम्हें तो सब छूट दी गई है' दिक्कत क्या है. दिक्कत है. अब यहां वो 'प्यार का पंचनामा' वाला पूरा मोनोलॉग उठाकर अपने हिसाब से टेप दीजिये. बस वही दिक्कत है.
# इन सब चीज़ों का बच्चों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है 
स्कूल में टीचर आपका ध्यान रखेंगे, घर पर मम्मी रखेंगी, मतलब बच्चे जिंदगी अकेले ही रहेंगे. आज कल एक नया टर्म बहुत ट्रेंडिंग है 'बच्चों के साथ फ्रेंडली होना'. इसे जितना गलत तरीके से लिया गया उतना शायद ही कोई और कॉन्सेप्ट होगा. इसमें होता ऐसा है कि मम्मी-पापा अचानक से आपके बेस्ट-फ्रेंड बनने की कोशिश करने लगेंगे. कोई क्लास डीसाइडेड नहीं है बस जैसे ही किस आंटी या फॅमिली मेंबर्स से ऐसा कुछ सुन लिया बस उसी दिन से चालू हो जाता है.
इसका साइड इफ़ेक्ट कुछ ऐसा होता है कि आपको इंटरनेट मिलने लगेगा, आपके बाहर जाने का, खेलने का टाइम कम हो जाएगा और आपके दोस्तों के घर आपका आना-जाना बंद कर दिया जाएगा. इससे क्या होगा कि आप थोड़ा अजीब बिहेव करने लगेंगे और फिर आपको साइकिएट्रिस्ट के पास ले जाया जाएगा और फिर आपको कुछ अजीब सी बीमारी होने का पता चलेगा.
# सरकार को कुछ करना पड़ेगा
लेकिन इन सब चीजों और उपायों के बाद आप सेफ हो जाएंगे. 'मतलब कुछ भी' वाली लाइन ऐसी ही किसी भी सिचुएशन से ली गई होगी. अशोक जैसा कोई अजीब सी मानसिकता वाला आदमी अगर स्कूल बाथरूम के पास नहीं तो स्कूल बस के पास भी तो मिल सकता है. निर्भया रेप और मर्डर केस के बाद जनता में जो उबाल आया था उससे रेपिस्टों के खिलाफ मजबूत और कड़े कानून बनाने में मदद मिली थी. लेकिन उससे रेप या मर्डर जैसी कोई भी घटना रुकी नहीं. कड़े कानून, ऊंची दीवारें या गहरी खाइयों से हम सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते. हमें सजा का निर्धारण और उसका कड़ाई से पालन ही सुरक्षा प्रदान कर सकता है. और हमारे देश के केस में ये चीज़ दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आती. अगर कहीं होगी भी, तो समाज का, जनता का उस पर विश्वास नहीं है.
सरकार ने कई कानून बनाए लेकिन वो उसको सही से लोगू करने में सफल नहीं हो सकी है.
सरकार ने इन मुद्दों पर कई कानून बनाए लेकिन वो उसको सही से लागू करने में सफल नहीं हो सकी है.

धार्मिक स्कूलों में जवान लड़कों के साथ शारीरिक संबंधों की पुरानी परंपरा है. पोप आते हैं और चले जाते हैं लेकिन दुनियाभर के कैथोलिक स्कूल के बच्चों की ये शिकायत आज तक ज़ारी है. हमारे यहां भी इस तरह की चीजें ख़बरों में आती रहती हैं. इनके खिलाफ लिया गया कोई भी फैसला आज तक अपने मूर्त रूप तक नहीं पंहुच सका है. ना ही इनके खिलाफ किसी भी तरह के कोई बैन की औपचारिक घोषणा की गई है. लेकिन हमारे यहां इस तरह के बीमार लोग थे, हैं और रहेंगे. इनके शिकारों (हो चुके या होने वालों) को कैद करके बचाने से ज़्यादा जरुरी इन्हें जेल में डालना है. कुछ लोगों की वजह से हमारे बच्चों का सर्वांगीण विकास बाधित हो रहा है. हमें इससे निजात पाना है. और अपने बच्चों को घरों में छुपाकर हम ये नहीं कर सकते.


ये आर्टिकल DailyO के लिए कमलेश सिंह ने लिखा है, श्वेतांक ने इसका हिंदी अनुवाद किया है.


 
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