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बेरोज़गारी अखिलेश के समय ज़्यादा थी या योगी के समय ज़्यादा है?

रोज़गार के डेटा ने नेताओं की पोल खोल दी

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फाइल फोटो: इंडिया टुडे
चुनाव नज़दीक आते नहीं कि नेता चकरघिन्नी हो जाते हैं. पूरे टाइम घूमते रहते हैं. जहां जहां जाते हैं, एक पत्थर गाड़कर आ जाते हैं. कि यहां कॉलेज बनेगा, यहां फैक्ट्री लगेगी, यहां सड़क बनेगी और यहां ये हवाईजहाज़ हवा में उड़ेगा. बड़े बड़े दावे किए जाते हैं कि फलानी योजन में इतने हज़ार करोड़ लगाकर इतने लाख युवाओं को रोज़गार दे दिया जाएगा. पुराने ज़माने में सिर्फ रोज़गार का वादा होता था, अब रोज़गार के अवसर का भी वादा होता है. लेकिन दिया जाएगा के शोर में ये बात दब जाती है कि बीते पांच सालों में कितना दिया. सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी के आंकड़े बता रहे हैं कि चार चुनावी राज्यों - उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में पिछले पांच सालों के दरमियान रोज़गार घट गया है. आज बात करेंगे कि जिन नौकरियों की बात नेतागण अब कर रहे हैं, वो पिछले पांच सालों में क्यों नहीं दे पाए. ये भी बताएंगे कि स्वमी प्रसाद मौर्य के साथ-साथ योगी सरकार का साथ किन लोगों ने आज छोड़ दिया. स्वामी विवेकानंद कहते थे, कि सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी वो सत्य ही होगा. सत्य यही है कि सरकारें भले ही चुनाव आने पर युवाओं के लिए बुर्ज खलीफा खड़ा कर देने जैसी बड़ी-बड़ी बातें करती हों, मगर 5 साल के अंत में उन्हीं युवाओं को धूल का एक टीला तक नहीं मिल पाता. कल यानि 12 जनवरी को देश स्वामी विवेकानंद की 159वीं जयंती मनाने जा रहा है. सुबह होते ही नेतानगरी से ट्वीट आने शुरू हो जाएंगे. चूंकि साल 1984 से ये परंपरा रही है कि देश में स्वामी विवेकानंद की जयंती पर युवा दिवस भी मनाया जाता है. तो युवा दिवस की बधाई भी आपको खूब दी जाएगी. मगर अब जब 5 राज्यों में आचार सहिंता लग गई है तो युवा दिवस की पूर्व संध्या हमारा सवाल सरकारों और सरकार के नेताओं से  है कि आखिर 5 सालों में उन्होंने युवाओं को युवा दिवस की बधाई के अलावा और क्या दिया. स्वामीजी युवाओं से कहते थे, उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको. और नेताजी लोगों की नीतियां कहती हैं कि उठो, जागो और चप्पल घिसते रहो. पहले वैकेंसी के इंतजार में घिसे, फिर पेपर लीक हो जाने पर घिसो. ना ना इतने से काम नहीं बनेगा. गलती से पेपर हो जाए तो इंटरव्यू में घिसो, वो भी हो जाए तो कचहरी में घिसो. हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट, सिंगल बेंच, डबल बेंच तक घिसते और इतना घिसते घिसते जवानी घिस जाए तो नियति और नौकरी मिल जाए तो किस्मत. जी हाल तो कुछ ऐसा ही हो गया. इससे पहले कि कल नेतानगरी से युवा दिवस की बधाइयों की टोकरी आपकी खोपड़ी से टकराए. CMIE ने 4 चुनावी राज्यों में रोजगार के आंकड़े जारी किए हैं. जिससे खोपड़ी चकरा जाएगी. CMIE यानि सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी के आंकड़े बताते हैं कि चुनाव वाले 4 राज्यों में पिछले 5 सालों में रोजगार बढ़ने के बजाय घट गया है. मणिपुर का डाटा नहीं मिल पाया, मगर यूपी, पंजाब, उत्तराखंड गोवा में नौकरीपेशा लोग कम हो गए. चूंकि सरकारें रोजगार पर डाटा देने से बचती हैं और गाहे-बगाहे CMIE के आंकड़ों से ही जो सच्चाई होती है वो सामने आ पाती है. और सच्चाई ये है कि वादे हुए रोजगार देने के और हुआ उसके ठीक उलट. सबसे पहले बात सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की कर लेते हैं. CMIE के मुताबिक यूपी में नौकरी के योग्य लोगों की संख्या दिसंबर 2017 में 14 करोड़ 95 लाख थी. जो पिछले 5 सालों मे 2.12 करोड़ बढ़कर 17 करोड़ 7 लाख हो चुकी है. नौकरी की योग्यता रखने वाले लोगों में करीब 14% का इजाफा हुआ है. दिंसबर 2016 में यूपी में नौकरी की योग्यता रखने वाले 14 करोड़ 95 लाख लोगों में से 5 करोड़ 75 लाख लोगों के पास नौकरी थी यानि कुल संख्या के 38.5% लोगों के पास ही पक्की तनखैया नौकरी थी. जो पूरे 5 साल बाद दिसंबर 2021 में बढ़ने के बजाय घट गई,CMIE के आंकड़े कहते हैं कि यूपी में दिसंबर 2021 में नौकरी करने वाले करीब 5 करोड़ 59 लाख 76 हजार ही रह गए. अलबत्ता आबादी और नौकरी की योग्यता रखने वालों की संख्या जरूर बढ़ी. तो ऐसे में सूबे के नौकरीपेशा लोगों की हिस्सेदारी में गिरावट हुई जो 38.5% से गिरकर 32.79% ही रह गई. यानी बेरोजगारों की संख्या बढ़ गई. नई नौकरियां मिलना तो दूर की कौड़ी रहा, बल्कि पुराने नौकरीपेशा लोगों के हाथ से भी नौकरी चली गई. एक तरफ योगी सरकार रोजगार देने में नंबर 1 होने का दावा करती है, पोस्टर चस्पा करवाती है और आंकड़े तमाम दावों के पोस्टर उखाड़ फेंकते हैं. लाठियों की चटक से चमड़िया छिलवा लेने वाले प्रदर्शनकारी युवाओं के हाथ 5 साल खाली रह गए. ऐसे में युवाओं के लिए काम करने वाले युवा हल्ला बोल के संस्थापक अनुपम, फैज अहमद फैज के तर्ज कहते हैं, दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तोहै, लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है अनुपम कहते हैं जो युवा हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा. लेकिन सच्चाई ये है कि युवा हित की बात तो सब करते हैं, मगर वो हकीकत में जमीन पर साकार नहीं होती. 2017 के चुनाव में योगी सरकार से युवाओं को बड़ी उम्मीदें थीं. घोषणा पत्र, जिसको संकल्प पत्र नाम दिया गया. उसमें बीजेपी ने वादा किया और 12 नंबर पेज पर अक्षरसह लिखा कि सरकार बनने के 90 दिनों के भीतर प्रदेश के सभी रिक्त सरकारी पदों के लिए पारदर्शी तरीके से भर्ती की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी. 90 दिन के अंदर का वादा था और वादे पर निसार होते हुए पूरे 5 साल निकल गए. आज भी सरकारी आंकड़ों में ही यूपी में करीब 5 लाख पद खाली पड़े हैं. भर्तियों की मांग के लिए युवा लाठियां खाते रहे और आचार संहिता लग गई. तो अब नए वादों का इंतजार करिए. ये तो सिर्फ पहले राज्य की बात थी. बाकियों का हाल भी इससे जुदा नहीं. अब चलिए दूसरे चुनावी राज्य पंजाब की भी बात कर लेते हैं. 2017 का चुनाव याद हो तो पंजाब में एक गाना चला था, चौंदा ए पंजाब, कैप्टन दी सरकार...और कैप्टन के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार प्रचंड बहुमत के साथ बनी. वादे इतने बड़े थे कि पूछिए मत. मगर आंकड़े कहते हैं, सब गुणगोबर हो गया. पंजाब के मामले में CMIE का डाटा कहता है कि दिसंबर 2016 में पंजाब में करीब 2 करोड़ 32 लाख 68 हजार लोग नौकरी की योग्यता रखते थे. जिनमें से 98 लाख 37 हजार लोगों के हाथ में पक्की नौकरी थी. जो योग्यता रखने वालों के करीब 42.28% बैठता था. अब जरा ये भी देख लीजिए कि 5 साल में कितनी प्रगति, कितनी दुर्गति हुई. दिसंबर 2021 में नौकरी की योग्यता रखने वाले लोगों की संख्या 11% बढ़ गई, जो लाजमी थी. दिसंबर 2021 में ये संख्या 2 करोड़ 58 लाख हो गई. तो क्या योग्य लोगों की संख्या बढ़ने के बाद नौकरी बढ़ी. उत्तर प्रदेश की तरह यहां भी जवाब ना में है. नौकरीपेशा लोगों की संख्या 5 साल बाद यहां भी कम होकर 98 लाख से करीब 95 लाख बची. 3 लाख लोग बेरोजगार हो गए, पीछे से नए बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई. तो हुआ ये कि पंजाब में पहले 42.28% योग्य लोगों के हाथ में रोजगार था, अब 36.86% लोगों के पास ही रोजगार है. यानि यहां भी मामला उल्टी दिशा में चला गया. और दिशा इतनी गड़बड़ हुई कि रोजगार के वादे पर पंजाब के सीएम बने कैप्टन अमरिंदर सिंह आखिरी साल खुद बेरोजगार हो गए. मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई. मगर वादे तो कांग्रेस पार्टी ने भी पंजाब के लिए अपने घोषणा पत्र में खूब किए थे. घोषणा पत्र के दूसरे ही पन्ने पर घर-घर रोजगार का वादा किया और वादा कितना पूरा हुआ वो पिछले दिनों चंडीगढ़ में लाठियां खाते युवाओं और नए सीएम चन्नी की रैली में युवाओं का मुंह बंद करती तस्वीरों ने बता ही दिया था. बाकी रही सही कमी CMIE के आंकड़ों ने कर दी. युवाओं के हाथ हर तरफ निराशा ही लगी. क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी की सरकार रही. इसलिए पंजाब के युवा इस बार किस मूड में है. जानिए - अमनदीप सिंह ने कहा
पिछली सरकार घर घर नौकरी के झूठे वादे से हमारे बीच आयी थी. लेकिन वह इस वादे को पूरा नहीं करते हुए जा रही है.
जगदीप सिंह कहते हैं
इस बार चुनाव का मुद्दा शिक्षा स्वास्थ्य और एग्रीकल्चर होना चाहिए. इन तीनों क्षेत्रों में बहुत ज़्यादा सुधार की ज़रूरत है.
यूपी और पंजाब के बाद अब जरा पहाड़ के पानी और जवानी की बात कर लेते हैं. जी उत्तराखंड, जहां बड़े ही कम अंतराल में बीजेपी को 3-3 मुख्यमंत्री बदलने पड़ गए. यहां CMIE का डाटा क्या कहता है. डाटा कहता है कि दिंसबर 2016 में उत्तराखंड में 80 लाख 37 हजार लोग नौकरी  करने के काबिल थे. 5 साल में काबिल लोगों की संख्या बढ़कर 91 लाख 41 हजार हो गई. यानि कुल इजाफा 14% का हुआ.  मगर नौकरी वालों का क्या हुआ. वो आंकड़ा भी आपके सामने हैं. दिसंबर 2016 में उत्तराखंड में 32 लाख 23 हजार लोगों  के हाथ में नौकरी थी. 5 साल बाद दिसंबर 2021 में नौकरी वालों की संख्या बढ़ने के बजाय यहां भी घट गई. और घटी हुई संख्या है. 27 लाख 82 हजार. करीब सवा 4 लाख लोगों के हाथ में अब नौकरी नहीं रही. पहले योग्य आबादी के 40.1% लोगों के हाथ रोजगार था, अब 30.43% लोगों पास ही रोजगार बचा है. सीधे करीब-करीब 10% की गिरावट है. क्योंकि बेरोजगारों की संख्या बढ़ गई. चुनावी वादों और नारों में युवाओं की उम्मीदें यहां भी धूमिल हो गई, पलायन खूब बढ़ा. पानी का पता नहीं लेकिन आंकड़े कहते हैं जवानी का 5 साल में नुकसान हो गया, प्रधानमंत्री के वादे के ठीक उलट....याद है अक्टूबर 2017 में दिया गया. वो पहाड़ का पानी जवानी वाला बयान
एक कहावत है पहाड़ का पानी पहाड़ के काम नहीं आता हम इस कहावत को बदलेंगे. पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आनी चाहिए. हम पहाड़ों में वो रोज़गार पैदा करें कि हमारी जवानी को पहाड़ छोड़ने की ज़रूरत ना आए
तो 5 साल बाद अब भी सवाल वहीं बना हुआ है. जवानी जस की तस रोजगार के लिए तरस रही है.  और रही बात पानी की तो गोवा के समंदर में वो पानी पिछले 5 सालों में खूब बहा. अब गोवा की भी बात कर लेते हैं. जरूरी नहीं है कि हर बार घूमना और दोस्तों के साथ लंबी पार्टी का प्लान बने तभी गोवा को याद किया जाए. वहां के लोगों को भी नौकरी चाहिए. और नौकरी के वादे तो पार्टी ही करती है. गोवा में वाली पार्टी नहीं, गोवा से वाली पार्टी. तो वहां क्या स्थिति है, इस पर CMIE ने अपनी रौशनी डाली है. और आंकड़े कहते हैं. दिसंबर 2016 में गोवा में 12 लाख 29 हजार लोग नौकरी की योग्यता रखते थे र करीब 6 लाख लोगों के हाथ में नौकरी भी थी यानि 49.31% लोगों के पास रोजगार था. मगर बीते 5 साल में बीजेपी की सरकार में हुआ क्या ? नौकरी की योग्यता रखने वालों की संख्या 12.29 हजार से बढ़कर 13 लाख 13 हजार हो गया. मगर रोजगार वाले हाथों में भारी गिरवाट आई और दिंसबर 2021 में 6 लाख की संख्या 4 लाख 20 हजार पहुंच गई. नौकरी वाले लोगों में करीब 8% की बड़ी गिरावट दर्ज हो गई. यहां भी पूरे 5 साल बीजेपी का सरकार रही, मगर रोजगार के वादे पर खरी नहीं उतर पाई. तो फिर सवाल मन में उठता है कि आखिर रोजगार बढ़ने की बजाय चारों राज्यों में घट क्यों गया ? और जाहिर है रोजगार घटा तो इकॉनमी भी घटी. सवाल के जवाब के तौर पर अंग्रेजी अखबर इंडियन एक्सप्रेस से JNU के एसोसिएट प्रोफेसर हिंमाशू कहते हैं. 2016 में हुई नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना. इस गिरावट की वजह है. ऐसे में हम दुआ करते हैं ये कोरोना का कहर जल्द ही दुनिया से समाप्त हो और सरकारों को युवाओं के  प्रति संवेदनशील होने की सदबुद्धि मिले. और इन्हीं कामनाओं के साथ हमारी तरफ से कल मनाए जाने वाले युवा दिवस की सच्ची शुभकामनाएं स्वीकार कीजिए. अब गौर कीजिए सुर्खियों पर पहली सुर्खी का संबंध है कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर से. एक दिन ऐसा नहीं बीतता, जब कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाया जाता. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 24 घंटों के दौरान 1 लाख 68 हज़ार नए मामले सामने आए और 277 मरीज़ों की मृत्यु हुई. 69 हज़ार 959 लोग ठीक भी हुए. एक्टिव केसेस की संख्या बीते 208 दिनों में सार्वाधिक हो गई है. राजधानी दिल्ली में निजी दफ्तरों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं. कंपनियों से कह दिया गया है कि वो चाहें तो वर्क फ्रॉम होम मॉडल के तहत काम कर सकती हैं. बैंक और कुरियर सेवाओं जैसी कुछ सेवाओं को इन प्रतिबंधों से दूर रखा गया है. आज से ही अंतरराष्ट्रीय उड़ानों से भारत आ रहे लोगों के लिए नए नियम भी लागू हो गए हैं. आप लाख माथा पीटते रहें कि ये सब हो रहा है, तो चुनाव कैसे हो रहा है, उससे कुछ होगा नहीं. क्योंकि चुनाव तो हो रहे हैं. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि डेटा पर गौर न किया जाए. याद कीजिए चुनावों के ऐलान वाली केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस. मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने तब कहा था कि सबसे ज़्यादा मामले तो आ रहे हैं महाराष्ट्र, दिल्ली और कर्नाटक में. वहां तो चुनाव नहीं हो रहा. फिर भी मामले बढ़ रहे हैं. तो ये कैसे कहा जा सकता है कि चुनावों के चलते ही मामले बढ़ जाएंगे. चुनाव आयुक्त ने अपनी बात में डेटा को शामिल किया था. लेकिन क्या वो डेटा पूरी तरह सही था? जवाब देती है इंडिया टुडे पर छपी मिलन शर्मा और समराट शर्मा की शानदार रिपोर्ट. Covid in India: Testing rates in poll-bound states much lower than others, shows data नाम से 11 जनवरी को छपी इस रिपोर्ट में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ही आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि कैसे कम से कम तीन चुनावी राज्य - उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड ने टेस्टिंग को रफ्तार ही नहीं दी. दूसरी तरफ महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य टेस्टिंग पर ज़ोर दे रहे हैं. बिना महामारी विशेषज्ञ हुए भी आप समझ सकते हैं कि यहां कौनसा खेल हो रहा है. रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2021 के पहले हफ्ते से लेकर जनवरी 2022 के पहले हफ्ते के बीच डेली टेस्टिंग किस राज्य में कितनी बढ़ी. डेटा ये रहा - पश्चिम बंगाल - 51.7 फीसदी गोआ - 47.8 फीसदी दिल्ली - 46.2 फीसदी महाराष्ट्र - 43.9 फीसदी मणिपुर - 37.8 फीसदी उत्तर प्रदेश - 19.6 फीसदी उत्तराखंड - 17.4 फीसदी पंजाब - (-) 21.7 फीसदी ये बताता है कि न सिर्फ यूपी और उत्तराखंड में टेस्टिंग बहुत धीमी गति से बढ़ रही है, बल्कि पंजाब ने तो टेस्टिंग घटा ही दी है. वो भी 21 फीसद से भी ज़्यादा. तिसपर अब ICMR ने कोविड टेस्टिंग की गाइडलाइन ही बदल दी है. कोविड पॉज़िटिव मरीज़ के कॉन्टैक्ट भी अब टेस्ट नहीं किए जाएंगे अगर उन्हें हाई रिस्क नहीं माना गया. ऐसे में उस तर्क में ज़्यादा दम रह नहीं जाता कि महाराष्ट्र दिल्ली और कर्नाटक में मामले ज़्यादा क्यों आ रहे हैं. डेटा कह रहा है कि वो टेस्ट ज़्यादा कर रहे हैं, इसलिए मामले ज़्यादा हैं. और जब तक चुनावी राज्यों के लोगों को कोई दैवीय शक्ति आकर अमृत नहीं दे देती, वहां भी टेस्टिंग बढ़ने पर मामले ज़्यादा ही आएंगे. उम्मीद ही की जा सकती है कि चुनाव आयोग इस रिपोर्ट को देखकर चुनावी राज्यों में टीकाकरण बढ़ाने के साथ साथ टेस्टिंग भी बढ़ाने पर ज़ोर देगा. ताकि जब तक चुनाव के लिए लोग निकलें, ज़्यादा से ज़्यादा मामलों की पहचान करके इलाज मुहैया करा दिया जाए. हम फिर कहते हैं, कोरोना जीवन मरण का प्रश्न है. चुनाव नहीं है. दूसरी सुर्खी आज का संबंध है उत्तर प्रदेश चुनाव से. योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने आज कैबिनेट और भाजपा से इस्तीफा दे दिया और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. मौर्य के साथ तीन और भाजपा विधायक - तिलहर से रोशन लाल वर्मा, बिलहौर से भगवती प्रसाद सागर और तिंदवारी से बृजेश प्रजापति ने भी पार्टी से इस्तीफा दिया है. ये तीनों भी अब सपाई हो गए हैं. इस बीच एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने कहा है कि कम से कम 13 और विधायक समाजवादी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक ट्वीट करके कहा है कि मौर्य को जल्दबाज़ी में निर्णय से पहले बातचीत करनी चाहिए. वैसे एक वक्त वो भी था, जब मौर्य बसपा में होते थे, मायावती के करीबी थे. 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले वो भाजपा में आ गए थे. तब उन्होंने आरोप लगाया था कि बसपा में टिकटें नीलाम हो रही हैं. अब भाजपा छोड़ने के पीछे उन्होंने वजह बताई है कि दलितों, पिछड़ों, किसानों, बेरोज़गारों और व्यापारियों के प्रति सरकार का रवैया उपेक्षात्मक है. तीसरी सुर्खी हमारे कई दर्शकों के लिए बड़ी काम की हो सकती है. आज सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस CBDT ने साल 2021 -22 के लिए आईटी रिटर्न फाइल करने की तारीख आखिरकार बढ़ा दी है. अब आप 15 मार्च 2022 तक आईटी रिटर्न फाइल कर सकते हैं. दर्शक जानते ही हैं कि इससे पहले डेडलाइन थी 31 मार्च 2021. CBDT की तरफ से एक ट्वीट में बताया गया कि करदाताओं को कोविड के चलते इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग में हुई असुविधा को देखते हुए ये निर्णय लिया गया है.

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